Agency:एजेंसियां
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अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म होने के बाद अब दुनिया में नई बहस शुरू हो गई है. सवाल पूछा जा रहा है कि क्या इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा चीन को मिला. एक तरफ अमेरिका को समझौता करना पड़ा, दूसरी तरफ चीन ने खुद को शांति का समर्थक दिखाया, ऊर्जा संकट से भी बचा रहा. आइए समझें.
अमेरिका और ईरान के बीच डील हो गई है और अब शांति है. लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि इस पूरे संघर्ष का सबसे ज्यादा फायदा आखिर किसे मिला? इस पूरी लड़ाई में चीन को बड़ फायदा होता दिखा है. अमेरिका और ईरान इस दौरान लड़ते रहे. लेकिन चीन बिना गोली चलाए दुनिया में अपनी ताकत बढ़ाने में जुटा रहा. जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला शुरू किया था, तब चीन को डर था कि कहीं ईरान की सरकार भी वेनेजुएला की तरह गिर न जाए. लेकिन करीब चार महीने बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई. ईरान की सरकार बची रही, अमेरिका को समझौता करना पड़ा और चीन खुद को शांति का समर्थक बताने में सफल रहा.
ट्रंप ने भी की शी जिनपिंग की तारीफ
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ की. जी-7 सम्मेलन में ट्रंप ने कहा कि चीन पूरे युद्ध के दौरान तटस्थ रहा और उसने ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को चुनौती नहीं दी. ट्रंप ने कहा, ‘राष्ट्रपति शी ने मेरी मदद की. उन्होंने कोशिश की और मुझे लगता है कि उन्होंने इस मसले को सुलझाने में मदद भी की.’
चीन ने दोनों तरफ बनाए रखे रिश्ते
युद्ध के दौरान चीन ने एक संतुलित रणनीति अपनाई. उसने अमेरिका और इजरायल के हमलों की आलोचना की, लेकिन ईरान से तेल खरीदना भी जारी रखा. साथ ही अमेरिका, खाड़ी देशों और ईरान सभी से बातचीत के रास्ते खुले रखे. इसी दौरान कई बड़े नेता भी चीन पहुंचे. इनमें खुद डोनाल्ड ट्रंप, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची और पाकिस्तान के नेता भी शामिल रहे. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे चीन ने दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की कि जब दूसरे देश युद्ध में उलझे हैं, तब वह बातचीत और शांति की राजनीति कर रहा है.
होर्मुज संकट में भी चीन को कम नुकसान
युद्ध के दौरान दुनिया भर में तेल संकट की आशंका पैदा हो गई थी, लेकिन चीन पर इसका असर दूसरे देशों की तुलना में कम पड़ा. इसकी वजह उसके बड़े रणनीतिक तेल भंडार और इलेक्ट्रिक वाहनों व ग्रीन एनर्जी पर पहले से किया गया निवेश माना जा रहा है.
क्या अमेरिका की ताकत कमजोर पड़ रही है?
CNN की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में अब इस बात पर भी बहस छिड़ गई है कि क्या यह युद्ध अमेरिका के लिए वैसा ही साबित हुआ, जैसा 1950 के दशक में स्वेज संकट ब्रिटेन के लिए था. स्वेज संकट के बाद दुनिया में ब्रिटेन का दबदबा कमजोर पड़ गया था. चीन के कई विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान युद्ध ने दिखा दिया कि अमेरिका पहले जैसा सर्वशक्तिशाली नहीं रहा. युद्ध के दौरान उसके कई पारंपरिक सहयोगी भी खुलकर साथ नहीं आए. इससे अमेरिका की अगुवाई वाले गठबंधन में दरारें साफ दिखाई दीं.
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Yogendra Mishra holds a degree in Journalism from the University of Allahabad. He has been actively associated with the media industry since 2017 and brings extensive experience across various domains of journa…और पढ़ें




