नई दिल्ली: जियोपॉलिटिक्स की बिसात पर आज एक ऐसा मंजर उभर रहा है जिसे देखकर दुनिया दंग है. कल तक जो अमेरिका ग्लोबल पुलिसमैन बनकर दुनिया को सुरक्षा की गारंटी देता था आज वही सुपरपावर एक कागजी शेर की तरह नजर आ रहा है. दक्षिण कोरिया सहमा हुआ है, जापान अपनी सुरक्षा की नई राहें तलाश रहा है और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की आंखों में वह बेबसी साफ दिख रही है, जिसे वाशिंगटन की इस्तेमाल करो और छोड़ दो वाली नीति ने तोहफे में दिया है. ईरान जंग के बीच ट्रंप की जिद ने उन्हें अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों को उनके हाल पर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है.
ईरान के सस्ते ड्रोन्स के सामने अमेरिका के अरबों डॉलर के THAAD सिस्टम का दम तोड़ना और रूस के तेल के आगे वाशिंगटन का सरेंडर करना इस बात की गवाही है कि अमेरिकी वर्चस्व का सूर्यास्त अब केवल समय की बात है. क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां वाशिंगटन की करीबी दोस्ती दुनिया का सबसे बड़ा जोखिम बन गई है? बीजिंग में बैठे शी जिनपिंग और मॉस्को में पुतिन के चेहरों पर आज मुस्कुराहट होगी. बिना एक भी गोली चलाए उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी खुद अपने ही अहंकार और बोझ तले दबता जा रहा है. यहां, भारत पर रूसी तेल छोड़ने का दबाव बनाने वाले ट्रंप अब खुद हमारे आगे गिड़गिड़ा रहे है कि कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए भारत रूस से तेल खरीद ले.
ईरान का जाल और THAAD की बर्बादी
अमेरिका इस वक्त ईरान और उसके प्रॉक्सी संगठनों के साथ एक बेहद महंगे और घाटे वाले युद्ध में उलझ गया है. ईरान ने अपनी रणनीति से अमेरिका की सैन्य अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है.
· महंगा मिसाइल बनाम सस्ता ड्रोन: अमेरिका के अत्याधुनिक और अरबों डॉलर के थाड (THAAD) और पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम ईरान के कुछ हजार डॉलर वाले सुसाइड ड्रोन्स को गिराने में बर्बाद हो रहे हैं.
· सैन्य संतुलन का बिगड़ना: एक थाड इंटरसेप्टर की कीमत करोड़ों में है जबकि उसे नष्ट करने के लिए भेजा गया ड्रोन ‘कौड़ियों’ के भाव आता है. इस ‘इकोनॉमिक वारफेयर’ में उलझकर अमेरिका अपना कीमती मिलिट्री हार्डवेयर मिडिल ईस्ट में झोंक रहा है. परिणाम यह है कि उसे दक्षिण कोरिया और जापान जैसे रणनीतिक मोर्चों से अपना भारी सैन्य साजो-सामान हटाना पड़ रहा है जिससे इंडो-पैसिफिक में चीन के लिए रास्ता साफ हो गया है.
इस्तेमाल करो और छोड़ दो की नीति
यूक्रेन जंग पर अमेरिका का दोहरा चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया है. कल तक जो अमेरिका भारत और चीन पर रूस से तेल न खरीदने का वैश्विक दबाव बना रहा था, आज वही अमेरिका दुनिया भर में बढ़ते कच्चे तेल के दाम और गैस सप्लाई की कमी को देखते हुए भारत से गिड़गिड़ा रहा है कि वो रूस से तेल खरीदल ले.
· तेल पर यू-टर्न: कल तक मॉस्को पर प्रतिबंधों की दुहाई देने वाला वाशिंगटन अब दबी जुबान में कह रहा है कि रूस से तेल खरीद लो ताकि वैश्विक बाजार में कीमतें न बढ़ें. यह अमेरिका के नैतिक पतन की पराकाष्ठा है.
· जेलेंस्की की बेबसी: यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की रूस से जंग के बीच अब खुद को अकेला पा रहे हैं. ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकता अब यूक्रेन को हथियार देना नहीं बल्कि किसी भी कीमत पर अपनी जान छुड़ाना है.
क्यों कमजोर पड़ रहा है अमेरिका?
· सहयोगियों का भरोसा टूटा: दक्षिण कोरिया और जापान अब समझ चुके हैं कि संकट के समय अमेरिका उनके साथ खड़ा होने के बजाय अपने ‘मिलिट्री हार्डवेयर’ को बचाने को प्राथमिकता देगा.
· रूस के सामने सरेंडर: रूस के तेल पर प्रतिबंध हटाने की मजबूरी यह दिखाती है कि अमेरिका की ‘प्रतिबंध वाली कूटनीति’ पूरी तरह विफल रही है.
· चीन के लिए खुला मैदान: जब अमेरिका ताइवान और दक्षिण चीन सागर से मिलिट्री हार्डवेयर कम कर उन्हें ईरान के ड्रोन्स से निपटने में लगा रहा है, तब शी जिनपिंग को एशिया-पैसिफिक में विस्तार करने का सुनहरा मौका मिल गया है.
· महंगे हथियारों का बोझ: अमेरिका का डिफेंस बजट अब उसके लिए बोझ बन गया है. $35 ट्रिलियन के कर्ज में डूबा देश अब लंबी और महंगी जंग लड़ने की स्थिति में नहीं है. लेकिन मौजूदा स्थिति से चुपचाप बाहर निकलना भी उसके लिए आसान नहीं होगा.
अमेरिका ने खोई विश्वसनीयता
आज का अमेरिका वह सुपरपावर नहीं रहा जो वियतनाम या खाड़ी युद्ध के समय हुआ करता था. वह एक ऐसा देश बन चुका है जो अपनों को ही मझधार में छोड़ रहा है. ईरान के साथ उलझकर उसने अपनी सैन्य शक्ति को कमजोर कर लिया है और यूक्रेन के मुद्दे पर अपनी विश्वसनीयता खो दी है. शी जिनपिंग की मुस्कुराहट वाजिब है, क्योंकि दुनिया अब एक ‘एकध्रुवीय’ (Unipolar) से ‘बहुध्रुवीय’ (Multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां अमेरिका का नेतृत्व अब बीते कल की बात होती जा रही है.
सवाल-जवाब
अमेरिका का ‘थाड’ (THAAD) सिस्टम ईरान के सामने क्यों विफल साबित हो रहा है?
यह तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि आर्थिक विफलता है. ईरान के बेहद सस्ते ड्रोन्स को गिराने के लिए अमेरिका को अपने करोड़ों डॉलर के महंगे इंटरसेप्टर खर्च करने पड़ रहे हैं, जो लंबे समय में अमेरिकी सैन्य खजाने के लिए नुकसानदेह है.
यूक्रेन के मामले में अमेरिका ने अपने रुख में क्या बड़ा बदलाव किया है?
अमेरिका, जो पहले दुनिया पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बना रहा था, अब अपनी ऊर्जा जरूरतों और महंगाई को देखते हुए रूस से तेल खरीदने को लेकर नरम पड़ गया है और जेलेंस्की को सैन्य सहायता देने में आनाकानी कर रहा है.
जापान और दक्षिण कोरिया से सैन्य हार्डवेयर हटाना चीन के लिए कैसे फायदेमंद है?
अमेरिका द्वारा इन देशों से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने से इस क्षेत्र में ‘पॉवर वैक्यूम’ पैदा हो रहा है. इसका सीधा फायदा चीन को मिलेगा, जो दक्षिण चीन सागर और ताइवान पर अपना नियंत्रण और मजबूत कर सकेगा.





