चर्चाओं के अनुसार दूसरी वजह यह रही कि बीजेपी नेतृत्व नहीं चाहता था कि उत्तर प्रदेश में बीएसपी से कोई युवा और ज़्यादा लोकप्रिय दलित नेता उभरे, इसलिए उधर से मायावती पर दबाव था।
दलित राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले कमल जयंत कहते हैं, “उन्हें पार्टी के भावी चेहरे के तौर पर पेश किया गया और एक समय तो उन्हें औपचारिक रूप से मायावती का उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया गया था। युवा समर्थकों के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता और संगठन के भीतर अपनी बात मनवाने की कोशिशों ने उन्हें एक ऐसा कद दिया जो आम पदाधिकारी से कहीं बढ़कर था।”
कमल याद करते हैं कि किस तरह आकाश ने पार्टी के निष्क्रिय पदाधिकारियों की आलोचना की थी और संगठन में पद संभालने वालों से और जवाबदेही की अपेक्षा की थी। उनका ऐसा करना पार्टी के उन स्थापित नेताओं को नाराज़ करने का काम कर गया, जो सालों तक मायावती के साथ काम करते रहे थे।
10 दिसंबर, 2023 को आकाश को मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करते हुए और राष्ट्रीय समन्वयक नियुक्त किया गया। लेकिन चंद महीनों के भीतर ही उनसे न सिर्फ सारी ज़िम्मेदारियां छीन ली गईं, बल्कि अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव प्रचार से भी दूर रखा गया। 23 जून, 2024 को उन्हें फिर से राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया। मार्च 2025 में अपने ससुर के प्रभाव में आकर अहंकार और ज़रूरत से ज़्यादा महत्वाकांक्षा दिखाने का आरोप लगाकर उन्हें पार्टी से निकाला गया, लेकिन 13 अप्रैल को फिर से माफ़ी दे दी गई।




