14 जुलाई 2026 में यूएई-ध्वज वाले तेल टैंकरोंMombasa और Al Bahiyah पर हुए ईरानी क्रूज़ मिसाइल हमले में एक और भारतीय नाविक की जान चली गई. हालांकि इस नाविक की पहचान अभी तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है.
भारतीय नाविक ही बार-बार क्यों बन रहे हैं जंग के शिकार?
कमोडोर श्रीकांत केसनूर के अनुसार, भारतीय नाविकों की बार-बार मौत किसी संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यापार की संरचना और भारत की भूमिका से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है. उनके मुताबिक दुनिया में करीब 18-19 लाख समुद्री कर्मी हैं, जिनमें तीन लाख से अधिक भारतीय हैं. यानी वैश्विक मर्चेंट नेवी में भारत का योगदान सबसे अधिक देने वाले देशों में है. इसी वजह से दुनिया के अलग-अलग समुद्री मार्गों पर चलने वाले हजारों जहाजों पर भारतीय चालक दल मौजूद रहता है और किसी भी क्षेत्र में युद्ध, समुद्री संघर्ष या सुरक्षा संकट पैदा होने पर भारतीय नाविकों के प्रभावित होने की आशंका भी अधिक रहती है.
विदेशी झंडे वाले जहाज भारत के लिए क्यों बन जाते हैं बड़ी चुनौती?
कमोडोर केसनूर बताते हैं कि विडंबना यह है कि भारत दुनिया को बड़ी संख्या में नाविक तो देता है, लेकिन भारत का केवल करीब 5 से 6 प्रतिशत विदेशी व्यापार ही भारतीय-ध्वज (Indian Flag)वाले जहाजों से होता है. अधिकांश भारतीय नाविक विदेशी झंडे वाले जहाजों पर काम करते हैं.
ऐसे जहाज कई बार पालाऊ, लाइबेरिया, पनामा, बहामास जैसे देशों में पंजीकृत होते हैं, जिन्हें समुद्री क्षेत्र में ‘फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस’ Flag of Convenience – FOC कहा जाता है. जिसका मतलब जहाज के मालिक (अपने देश में पंजीकरण कराने के बजाय) अपने पोत को किसी ऐसे विदेशी देश में पंजीकृत कराते हैं, जहाँ कर (Tax), पंजीकरण शुल्क और श्रम कानून काफी ढीले होते हैं.
कई मामलों में जहाज का मालिक किसी और देश का होता है, उसे चार्टर किसी दूसरी कंपनी ने किया होता है, संचालन किसी तीसरी कंपनी के हाथ में होता है और चालक दल कई देशों के लोगों से मिलकर बना होता है. ऐसे में किसी हमले या हादसे की स्थिति में कानूनी अधिकार उस देश के पास होता है, जिसके झंडे के तहत जहाज पंजीकृत है. इसलिए भारतीय नागरिकों के प्रभावित होने के बावजूद भारत के लिए सीधे सैन्य हस्तक्षेप करना आसान नहीं होता.
संघर्ष क्षेत्र में भारतीय नौसेना की भूमिका क्या होती है?
उनका कहना है कि भारतीय नौसेना लगातार अरब सागर, पश्चिमी हिंद महासागर और अन्य संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में तैनात रहती है. जरूरत पड़ने पर वह एस्कॉर्ट, बचाव अभियान, निकासी, चिकित्सा सहायता और मानवीय मदद भी उपलब्ध कराती है. हालांकि किसी सक्रिय युद्ध क्षेत्र में हर विदेशी जहाज को सुरक्षा देना या हर जगह मौजूद रहना संभव नहीं है. यदि भारतीय नौसेना सीधे किसी युद्धग्रस्त क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है, तो उसके स्वयं उस संघर्ष का हिस्सा बनने का खतरा भी पैदा हो सकता है. इसलिए ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय कानून, संबंधित देश की संप्रभुता और समुद्री अधिकार क्षेत्र का पालन करना पड़ता है.
ड्रोन, मिसाइल और समुद्री डकैती… नाविकों के सामने कितने खतरे?
कमोडोर केसनूर यह भी कहते हैं कि समुद्री कर्मियों के सामने सिर्फ युद्ध का खतरा नहीं होता. उन्हें समुद्री डकैती, आतंकवादी संगठनों के हमले, ड्रोन और मिसाइल हमले, खराब मौसम, कानूनी विवाद, हिरासत और अन्य समुद्री सुरक्षा चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. उनका कहना है कि आज के दौर में ड्रोन और प्रिसिजन-गाइडेड मिसाइलों के बढ़ते इस्तेमाल ने व्यापारी जहाजों पर काम करने वाले नाविकों का जोखिम पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है.
भारत को क्या करना होगा ताकि भारतीय नाविक ज्यादा सुरक्षित रहें?
लंबी अवधि के समाधान पर बात करते हुए कमोडोर केसनूर का मानना है कि भारत को अधिक भारतीय-ध्वज वाले जहाज बढ़ाने होंगे, जहाज निर्माण उद्योग को मजबूत करना होगा, समुद्री व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी और वैश्विक समुद्री संस्थाओं में अपनी भूमिका को और प्रभावशाली बनाना होगा.
साथ ही, भारतीय नाविकों की भर्ती करने वाली कंपनियों की सख्त निगरानी, बेहतर बीमा व्यवस्था, सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन और संकट के समय तेज सरकारी प्रतिक्रिया भी उतनी ही जरूरी है. उनके अनुसार भारत को सिर्फ एक मजबूत नौसेना ही नहीं, बल्कि एक मजबूत समुद्री शक्ति (Maritime Power) बनने की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ना होगा.




