चीन और अमेरिका के बीच बवाल बढ़ता जा रहा है. ट्रंप, मई में बीजिंग के दौरे पर जाकर टोह ले आए हैं और अब अमेरिका चीन के खजाने पर सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग कर रहा है. अमेरिका अब चीन के उस घमंड पर अटैक करेगा, जिसके दम पर जिनपिंग दुनिया को आंखें दिखाते आए हैं. अब पेंटागन ने चीन के ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ के पीछे पड़ गया है. सैन्य इतिहास में पहली बार अमेरिकी मिलिट्री बेस के भीतर ही एक ऐसी ‘सीक्रेट फैक्ट्री’ बनाई जा रही है, जो बीजिंग की दादागिरी को पूरी तरह मटियामेट कर देगी. इसकी तगड़ी डेडलाइन भी फाइनल हो चुकी है.
क्या है चीन के खिलाफ अमेरिका का प्लान?
दरअसल, अमेरिका की दिग्गज प्राइवेट कंपनी REalloys को अपने सबसे सुरक्षित ‘टूल आर्मी डिपो’ मिलिट्री बेस के अंदर देश का पहला कमर्शियल रेयर अर्थ प्रोसेसिंग प्लांट लगाने का जिम्मा सौंप दिया गया है. यही अमेरिकी की वो सीक्रेट फैक्ट्री होगी जहां से चीन की गर्दन दबोची जाएगी.
अमेरिका में एक बेहद कड़ा कानून लागू होने जा रहा है, जिसके तहत 1 जनवरी 2027 से अमेरिकी सिक्योरिटी सिस्टम और हथियारों में चीनी रेयर अर्थ मैटेरियल्स के इस्तेमाल पर पूरी तरह से ‘फेडरल प्रोक्योरमेंट बैन’ यानी सरकारी खरीद पर प्रतिबंध लग जाएगा. इस डेडलाइन के साथ यूटा (Utah) के इस मिलिट्री बेस पर कमर्शियल डेवलपमेंट का काम साल 2027 की शुरुआत में शुरू करने का टारगेट रखा गया है और साल 2028 तक यहां पूरी क्षमता के साथ प्रोडक्शन शुरू करने की कड़क प्लानिंग की गई है.
वाशिंगटन इस वक्त इतनी हड़बड़ी में है कि जिस सप्लाई चेन को विकसित करने में आम तौर पर सालों का वक्त लग जाता है, उसे महज कुछ महीनों के भीतर ही तैयार किया जा रहा है. REalloys इस पूरे प्रोजेक्ट को एक खास ‘एन्हांस्ड यूज लीज’ स्ट्रक्चर के तहत फंड और ऑपरेट करेगी, जिसका सीधा मतलब ये है कि येप्रोसेसिंग प्लेटफॉर्म भले ही अमेरिकी सेना की सरकारी और सुरक्षित जमीन पर बनेगा, लेकिन इसका मालिकाना हक, फंडिंग और कामकाज पूरी तरह से प्राइवेट हाथों में रहेगा.
डिस्प्रोशियम और टर्बियम: वो ‘एलिमेंट्स’ जिनके बिना अमेरिका के फाइटर जेट हैं बेकार
अब सवाल उठता है कि आखिर इस मिलिट्री बेस के अंदर ऐसा क्या खास बनने जा रहा है, जिससे चीन को इतनी मिर्ची लगी है? दरअसल, इस प्लांट में डिस्प्रोशियम और टर्बियम जैसे दो सबसे अहम ‘हैवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ को रिफाइन किया जाएगा. ये दोनों तत्व इतने कीमती होते हैं कि इनके बिना बेहद हाई टेंपरेचर पर काम करने वाले वो परमानेंट मैग्नेट्स बनाना असंभव है, यही मैग्नेट्स अमेरिका के आधुनिक हथियारों, रडार और फाइटर जेट्स की जान होते हैं.
अगर आसान शब्दों में कहें तो कच्चे अयस्क (Ore) को पहले खदान से निकालकर साफ किया जाता है, फिर उसे रासायनिक रूप से अलग-अलग एलिमेंट्स में बांटा जाता है. इसके बाद इन्हें हाई-प्यूरिटी मेटल्स में बदला जाता है, और आखिर में इनसे वो परमानेंट मैग्नेट्स बनते हैं जो प्रिसिजन-गाइडेड मिसाइलों, फाइटर जेट्स, नौसैनिक जहाजों और रडार सिस्टम को पावर देते हैं. दशकों से चीन ने इस पूरी चेन के हर एक हिस्से पर अपना कंट्रोल बना रखा था और पश्चिमी देश हाथ पर हाथ धरे बैठे थे, लेकिन अब पासा पूरी तरह पलट चुका है.
लॉकहीड मार्टिन से लेकर बोइंग तक: अमेरिकी डिफेंस कंपनियों के सामने खड़ी है आफत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस में आ रही दिक्कतों, कमजोर सप्लाई चेन और चीन पर बढ़ती निर्भरता को खत्म करने के लिए ‘डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट’ का इस्तेमाल किया था. इतना ही नहीं, उन्होंने खुद लॉकहीड मार्टिन, आरटीएक्स, बोइंग, नॉर्थ्रॉप ग्रुमैन, जनरल डायनेमिक्स और एल3 हैरिस जैसी दुनिया की सबसे बड़ी हथियार बनाने वाली कंपनियों के कप्तानों के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग की थी, जिसमें अमेरिकी हथियारों के स्टॉक को जल्द से जल्द भरने और सप्लाई चैन को दुरुस्त करने का दबाव बनाया गया था. 3 बड़ी कंपनियों का हाल देखकर आप खुद समझ जाएंगे कि 2027 की ये डेडलाइन अमेरिका के लिए इतनी बड़ी आफत क्यों बनी हुई है कि अब उसके पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचा है.
- लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin): ये कंपनी दुनिया का सबसे खतरनाक फाइटर जेट F-35 बनाती है. अकेले F-35 जेट को बनाने में लगभग 408 किलोग्राम से ज्यादा रेयर अर्थ मैटेरियल्स का इस्तेमाल होता है, जिसमें अकेले 50 पाउंड तो समैरियम-कोबाल्ट मैग्नेट्स होते हैं जो अत्यधिक गर्मी में भी काम करते हैं.
- आरटीएक्स (RTX): इस कंपनी का मशहूर पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम और इसके एडवांस्ड रडार पूरी तरह से हाई-प्यूरिटी डिस्प्रोशियम और टर्बियम पर चलते हैं, जो अब तक चीन के प्रोसेसिंग रास्तों से होकर ही अमेरिका पहुंचते थे.
- नॉर्थ्रॉप ग्रुमैन (Northrop Grumman): इनका नया B-21 रेडर बॉम्बर और गहरे अंतरिक्ष की निगरानी करने वाला ‘डीप स्पेस एडवांस्ड रडार कैपेबिलिटी’ (Dsc) प्रोग्राम भी इसी चीनी चोकपॉइंट (रुकावट) में फंसा हुआ है. अगर इन कंपनियों ने 2027 तक अपनी सप्लाई चैन से चीनी मैटेरियल को पूरी तरह बाहर नहीं किया, तो वे अमेरिकी सरकार के बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स खो बैठेंगी.
अमेरिकी सेना ने REalloys पर ही क्यों लगाया इतना बड़ा दांव?
पेंटागन ने REalloys को ऐसे ही नहीं चुना है. पिछले दो सालों में इस कंपनी ने बैकएंड पर इतनी तगड़ी गोटियां फिट की हैं कि चीन के बाहर ये हैवी रेयर अर्थ की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है. REalloys ने सास्काचेवान रिसर्च काउंसिल (SRC) के साथ मिलकर एक बड़ा गठजोड़ किया है और उनकी प्रोसेसिंग फैसिलिटी के अपग्रेड के लिए करीब 172 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश किया है. इस निवेश के बदले REalloys को एसआरसी के बढ़े हुए आउटपुट का पूरे 80% हिस्सा खरीदने का एक्सक्लूसिव राइट मिल गया है. इसके अलावा, कंपनी ने कच्चे माल का जुगाड़ करने के लिए भी दुनिया भर में हाथ मिलाए हैं.
- ग्रीनलैंड में स्थित क्रिटिकल मेटल्स के ‘तंब्रीज प्रोजेक्ट’ से फेज-1 प्रोडक्शन का 15% हिस्सा लेने का पक्का समझौता.
- मोंटाना के ‘शीप क्रीक’ रेयर अर्थ डिपॉजिट के साथ एक रणनीतिक गठबंधन.
- वायोमिंग में रामाको रिसोर्सेज के ‘ब्रुक माइन’ प्लेटफॉर्म से कोयले पर आधारित रेयर अर्थ मैटेरियल की सप्लाई का एक मजबूत फ्रेमवर्क.




