वॉशिंगटन: अमेरिका-ईरान के बीच इस हफ्ते हुए ऐतिहासिक शांति समझौते (MoU) के बाद भले ही दुनिया ने राहत की सांस ली हो और ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को दोबारा खोल दिया गया हो, लेकिन वैश्विक तेल बाजार के लिए शायद अब बहुत देर हो चुकी है. पिछले चार महीनों से पश्चिम एशिया की तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप थी, जिसके कारण दुनिया भर के बाजारों से 1.15 अरब बैरल कच्चा तेल पूरी तरह गायब हो चुका है. एनालिटिक्स फर्म ‘केपलर’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस भयंकर कमी ने वैश्विक तेल बाजार को एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां से चीजें कभी भी कंट्रोल से बाहर हो सकती हैं.
ट्रंप को दिख गया आने वाला तेल संकट
अमेरिका का इमरजेंसी तेल रिजर्व इस वक्त पिछले 43 सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है और दुनिया भर के कमर्शियल गोदाम खाली होने की कगार पर हैं. कच्चे तेल की इस किल्लत ने महाशक्तियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. G7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया है कि तेल का ये संकट असल में कितना भयानक है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘अगर आप असली तबाही और अफरा-तफरी देखना चाहते हैं तो बस थोड़ा इंतजार करिए. हमारे पास मौजूद इमरजेंसी तेल रिजर्व अब मुश्किल से अगले चार हफ्तों में पूरी तरह खत्म होने वाला है’. ट्रंप ने आगाह किया कि अगर होर्मुज स्ट्रेट को खोलने में थोड़ी और देरी हो जाती तो दुनिया को एक ऐसी ‘आर्थिक तबाही’ झेलनी पड़ती, जो साल 1929 की ऐतिहासिक ‘ग्रेड डिप्रेशन’ से भी ज्यादा भयानक होती.
हालांकि कूटनीतिक समझौते की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में जंग के दौरान चढ़ीं क्रूड ऑयल की कीमतें $126.41 से गिरकर फिलहाल $80 प्रति बैरल के नीचे आ गई हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि बाजार का ये उत्साह बेहद अस्थाई है.
कुशिंग हब पर बढ़ा दबाव: जब खाली होने लगे तेल के कुएं
इस तेल संकट का सबसे सीधा और घातक असर अमेरिका के ओक्लाहोमा में स्थित ‘कुशिंग’ ऑयल हब पर देखने को मिल रहा है. ये अमेरिका का वो मुख्य केंद्र है जहां से पूरे देश में ईंधन की पाइपलाइनें दौड़ती हैं. मौजूदा समय में कुशिंग अपने ‘ऑपरेशनल स्ट्रेस लेवल’ यानी उस नाजुक स्तर पर पहुंच चुका है, जहां से आगे तेल की सप्लाई कर पाना तकनीकी रूप से नामुमकिन होने लगता है.
आसान शब्दों में कहें तो ये ठीक वैसा ही है जैसे जब कॉफी की केतली या बर्तन में कॉफी नल की टोंटी से नीचे चली जाती है तो आखिरी बूंदें निकालने के लिए आपको पूरे बर्तन को टेढ़ा करना पड़ता है. तेल के विशाल टैंकों के तलवे में जो कुछ भी बचता है, वो ज्यादातर इस्तेमाल न होने वाला गाढ़ा कचरा होता है. जब तेल का स्तर इतना नीचे गिर जाता है तो पाइपलाइनों में जरूरी प्रेशर बनाए रखना बेहद मुश्किल हो जाता है, जिससे ग्राहकों तक ईंधन पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है.
होर्मुज खुला पर तुरंत नहीं बहने लगेगा तेल
दुनिया भर के निवेशक और आम जनता ये मानकर खुश हो रहे हैं कि होर्मुज का रास्ता साफ होते ही तेल का संकट कल से ही खत्म हो जाएगा लेकिन आरबीसी कैपिटल मार्केट्स की कमोडिटी स्ट्रेटजी हेड हेलिमा क्रॉफ्ट ने इस ‘उत्साह के भ्रम’ को तोड़ते हुए एक कड़वी हकीकत सामने रखी है.
हेलिमा क्रॉफ्ट का कहना है, ‘बाजार जमीनी हकीकत से सात कदम आगे चल रहा है. हर कोई जश्न मना रहा है कि संकट खत्म हो गया लेकिन सच ये है कि पुरानी रफ्तार वापस लौटने के लिए एक बहुत बड़ी लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन की चुनौती हमारे सामने खड़ी है’.
पाइपलाइनों और पेट्रोल पंपों तक दोबारा तेल पहुंचने में महीनों का समय क्यों लगेगा, इसके कई बड़ी वजहें हैं.
- समुद्री बारूद को हटाना : युद्ध के दौरान हॉर्मुज के पानी में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगों को साफ करने में लंबा वक्त लगेगा.
- टैंकरों की वापसी: खाली पड़े तेल के जहाजों को दोबारा इस खाड़ी क्षेत्र में बुलाना और उन्हें कतार में लगाना एक जटिल प्रक्रिया है.
- उत्पादन की धीमी शुरुआत: बंद पड़े कुओं से कच्चे तेल का उत्पादन दोबारा शुरू करने में समय लगता है.
- धीमी समुद्री यात्रा: तेल लोड होने के बाद जहाजों को दुनिया के अलग-अलग कोनों तक पहुंचने में हफ्तों का सफर तय करना पड़ता है.
केपलर के एक्सपर्ट मैट स्मिथ का मानना है कि समझौते ने दुनिया को उम्मीद दी है, जिसकी वजह से फिलहाल कीमतों को दबा रखा है लेकिन अमेरिकी उपभोक्ताओं को इस आने वाले कुछ महीनों में ईंधन के लिए ज्यादा कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के हिसाब से अगर दुनिया अपनी जरूरत से रोजाना 50 लाख बैरल ज्यादा तेल का उत्पादन करने भी लग जा तो भी जंग के दौरान खोए हुए 1.15 अरब बैरल तेल की भरपाई करने में कम से कम एक पूरा साल लग जाएगा. साफ है कि जब तक फिजिकल बैरल यानी असल तेल के डिब्बे रिफाइनरियों तक नहीं पहुंचते, तब तक कागजी समझौतों से दुनिया का ऊर्जा संकट पूरी तरह हल नहीं होने वाला है.




