नई दिल्ली: वैज्ञानिक अब अंतरिक्ष से पृथ्वी की हर एक नदी पर पैनी नजर रखने की तैयारी कर रहे हैं. अमूमन लोग नदियों के बारे में तब सोचते हैं जब बाढ़ आती है या सूखा पड़ता है. लेकिन नदियां हमारे पूरे ईकोसिस्टम को आपस में जोड़ती हैं. दुनिया की एक बड़ी आबादी पीने के पानी के लिए पूरी तरह नदियों पर ही निर्भर है. दिक्कत यह है कि दुनिया की कई नदियां बहुत दूरदराज के इलाकों में हैं. वहां जाकर पानी की जांच करना और नदियों की सेहत का पता लगाना बहुत मुश्किल काम है. इसी समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया रास्ता खोज निकाला है. एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग तकनीक अब बहुत एडवांस हो चुकी है. इस तकनीक की मदद से ग्लोबल स्केल पर नदियों के पानी की क्वालिटी और उनके स्वास्थ्य को आसानी से ट्रैक किया जा सकता है.
वैज्ञानिकों को रिमोट सेंसिंग तकनीक की जरूरत क्यों पड़ी?
नदियों को ट्रैक करना पहली नजर में बहुत आसान काम लगता है. सदियों से इंसानों ने नदियों के नक्शे तैयार किए हैं. लेकिन हकीकत इससे बहुत ज्यादा अलग और जटिल है. यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी में एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर डोंगमी फेंग ने कहा, ‘नदियों और खासकर छोटे झरनों को परिभाषित करना बहुत कठिन काम है. नदियां लगातार बदलती रहती हैं और कई बार गायब भी हो जाती हैं.’
दुनिया में कई ऐसी नदियां हैं जो महीनों या सालों तक सूखी रहती हैं. पानी के कई छोटे रास्ते ऐसे इलाकों में हैं जहां इंसान आसानी से पहुंच ही नहीं सकता है. पुरानी तकनीक में रिसर्चर खुद मौके पर जाकर पानी का सैंपल लेते थे. यह तरीका शहरों के पास की बड़ी नदियों के लिए तो ठीक है. लेकिन दुनिया की सभी नदियों के लिए यह तरीका काम नहीं कर सकता है.
दूरदराज की नदियों में जो कुछ भी होता है वह वहीं तक सीमित नहीं रहता है. नदियां अपने साथ मिट्टी, पोषक तत्व और प्रदूषण बहाकर ले जाती हैं. यह सब आगे जाकर समुद्र में मिल जाता है. इससे समुद्री जीवों और मछलियों के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है. इसलिए वैज्ञानिक हर नदी का अलग से और ग्लोबल लेवल पर स्टडी करने पर जोर दे रहे हैं. हर नदी का अपना एक अलग क्लाइमेट और माहौल होता है. उन पर इंसानी गतिविधियों का असर भी अलग होता है.
सैटेलाइट अंतरिक्ष से नदियों के पानी में क्या देखता है?
- নदियों की निगरानी के लिए वैज्ञानिक अब जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं वह कमाल की है. यह नई तकनीक पानी से रिफ्लेक्ट होने वाली लाइट के स्पेक्ट्रम में बदलाव को पकड़ती है. पानी में मौजूद अलग-अलग पोषक तत्व और प्रदूषक तत्व लाइट को अलग तरीके से एब्जॉर्ब करते हैं. सैटेलाइट अंतरिक्ष की ऑर्बिट में घूमते हुए इस बदलाव को आसानी से पहचान लेते हैं.
- जब इस सैटेलाइट डेटा को कंप्यूटर मॉडलिंग के साथ मिलाया जाता है तो पानी की क्वालिटी का सटीक अंदाजा लग जाता है. इस तरह घर बैठे ही दूरदराज की नदियों के पानी की जांच लगातार की जा सकती है. जमीन पर जाकर की जाने वाली जांच कभी भी इस तकनीक का मुकाबला नहीं कर सकती है. साउदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर श्याओ यांग ने कहा, ‘यह एक बहुत बड़ा लक्ष्य है लेकिन इसके लिए की जाने वाली मेहनत का फल बहुत शानदार होगा.’
- यह तकनीक सिर्फ रिसर्च तक सीमित नहीं रहने वाली है. दुनिया के बड़े शहरों के लिए नदियां ही पीने के पानी का मुख्य जरिया हैं. दुनिया की नब्बे परसेंट आबादी नदियों के सिर्फ छह मील के दायरे में रहती है. इंसानी सभ्यता के विकास में भी नदियों का सबसे बड़ा योगदान रहा है. हर बड़े शहर की पहचान किसी न किसी नदी से जुड़ी हुई है. नदियों ने ही शहरों को आगे बढ़ने के लिए जरूरी रिसोर्सेज दिए हैं. इसलिए उनकी सेहत पर नजर रखना हमारी भलाई के लिए बहुत जरूरी है.
पानी में फैलने वाला एल्गल ब्लूम इंसानों के लिए कितना खतरनाक है?
इस सैटेलाइट मॉनिटरिंग तकनीक का सबसे बड़ा फायदा पानी में फैलने वाले एल्गल ब्लूम को रोकने में होगा. यह एक ऐसी समस्या है जिससे आज दुनिया के कई देश परेशान हैं. खेतों में इस्तेमाल होने वाले फर्टिलाइजर और सीवेज का गंदा पानी जब नदियों में मिलता है तो पानी में पोषक तत्वों की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.
इन पोषक तत्वों की वजह से पानी में एल्गी यानी काई बहुत तेजी से फैलने लगती है. यह एल्गी पानी की ऊपरी सतह पर एक मोटी परत बना लेती है. इसकी वजह से सूरज की रोशनी पानी के नीचे मौजूद पौधों तक नहीं पहुंच पाती है. धूप न मिलने से पानी के अंदर के पौधे मरने लगते हैं.
पानी में घुल रहा है धीमा जहर? सैटेलाइट रखेगा आपकी लाइफलाइन पर पल-पल की नजर. (इंफोग्राफिक्स : AI)
जब यह एल्गी मरती है तो उसे खाने वाले बैक्टीरिया पानी की पूरी ऑक्सीजन को खत्म कर देते हैं. पानी में ऑक्सीजन की कमी होने से मछलियां और दूसरे जीव तड़प-तड़पकर मरने लगते हैं. इस पूरी प्रोसेस को साइंस की भाषा में यूट्रोफिकेशन कहा जाता है. यह प्रोसेस पूरी नदी के ईकोसिस्टम को पूरी तरह से तबाह कर सकती है.
इसका असर इंसानों की सेहत पर भी पड़ता है. एल्गल ब्लूम में पाए जाने वाले जहरीले साइनोबैक्टीरिया इंसानों में स्किन रैशेज और उल्टी की समस्या पैदा कर सकते हैं. कई बार यह जहर इंसानों के लिवर और नर्वस सिस्टम को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है.
नदियों के संकट से जुड़े कुछ मुख्य फैक्ट्स:
- दुनिया की 90% आबादी नदियों के 6 मील (लगभग 10 किलोमीटर) के दायरे में ही बसती है.
- अकेले अमेरिका की 40% से ज्यादा नदियां इस समय न्यूट्रिएंट पॉल्यूशन का सामना कर रही हैं.
- नदियों का दूषित पानी समुद्र में जाकर वहां ‘डेड जोन’ यानी ऑक्सीजन विहीन इलाके बना देता है.
यूट्रोफिकेशन की वजह से मर रही हैं हमारी नदियां
नदियों में बढ़ता प्रदूषण एक ग्लोबल क्राइसिस बन चुका है. जब पानी में जहरीली एल्गी फैल जाती है तो वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट को बंद करना पड़ता है. इसके बाद नदियों का पानी तैरने या किसी अन्य काम के लिए सुरक्षित नहीं रह जाता है. जहरीली एल्गी वाले पानी को साफ करना बहुत खर्चीला और मुश्किल काम होता है. इसके लिए कई स्टेज में वॉटर प्यूरीफिकेशन प्रोसेस को पूरा करना पड़ता है.
नदियों का दम घोट रहा है खतरनाक यूट्रोफिकेशन. (इंफोग्राफिक्स : AI)
प्रोफेसर डोंगमी फेंग ने कहा, ‘न्यूट्रिएंट डायनेमिक्स का स्टडी करके हम बहुत कुछ सीख सकते हैं.’ उनके अनुसार अमेरिका की कम से कम चालीस परसेंट नदियों में न्यूट्रिएंट पॉल्यूशन की गंभीर समस्या है. भारत जैसी विकासशील देशों में यह समस्या और भी ज्यादा बड़ी हो सकती है. फैक्ट्रियों का कचरा और शहरों की गंदगी सीधे नदियों में बहा दी जाती है. इससे नदियों का पानी लगातार जहरीला होता जा रहा है.
अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में पीने के साफ पानी का बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा. अंतरिक्ष से होने वाली मॉनिटरिंग इस समस्या का एक बड़ा समाधान बन सकती है. इससे वैज्ञानिकों को यह पता चल जाएगा कि किस नदी में प्रदूषण का लेवल कितना बढ़ गया है.
पानी के संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिकों का प्लान क्या है?
प्रोफेसर डोंगमी फेंग का बैकग्राउंड दो अलग-अलग फील्ड्स से जुड़ा हुआ है. उन्होंने हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग और रिमोट सेंसिंग में डॉक्टरेट की डिग्री ली है. वह अपने इस नए प्रोजेक्ट को लेकर बहुत उत्साहित हैं. उनका प्लान दुनिया की नदियों के पचास साल के पुराने डेटा का एनालिसिस करने का है.
इस एनालिसिस से यह समझा जाएगा कि पोषक तत्व नदी के सिस्टम में किस तरह आगे बढ़ते हैं. इस स्टडी की मदद से एक ऐसा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विकसित किया जाएगा जो पानी के मैनेजरों को पहले ही अलर्ट कर देगा. किसी भी नदी में एल्गल ब्लूम फैलने से पहले ही प्रशासन को इसकी जानकारी मिल जाएगी. इससे समय रहते पानी को दूषित होने से बचाया जा सकेगा.




