America-Iran Peace Deal: वेस्ट एशिया में शांति बहाल होने की उम्मीद बढ़ गई है. अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर MoU पर सिग्नेचर हो गया है. शांति समझौते के तहत कई ऐसे प्रावधान है, जो इजरायल के लिए किसी झटके से कम नहीं है. पीस डील कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को एक बार फिर से उनकी औकात बता दी है. इससे पहले शांति समझौते पर बातचीत के दौरान जब इजरायल की ओर से लेबनान पर अटैक किया गया था तो ट्रंप ने नेतन्याहू की जबदरस्त क्लास लगाई थी. अब अमेरिका-ईरान के बीच हुए पीस डील में भी कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जो इजरायल के लिए किसी झटके से कम नहीं है. दूसरी तरफ, शांति समझौते से ईरान का रुतबा विजेता देश की तरह हो गया है. तेहरान की कई शर्तों को अमेरिका की ट्रंप सरकार ने मान लिया है, फिर चाहे वह लेबनान में मिलिट्री ऑपरेशन रोकना हो या 300 अरब डॉलर का फाइनेंशियल प्लान की बात, शांति समझौते में उसे जगह दी गई है.
अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी इस समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर करके सभी मोर्चों पर (जिनमें लेबनान भी शामिल है) सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने की घोषणा की है. साथ ही वे यह प्रतिबद्धता जताते हैं कि अब से वे एक-दूसरे के खिलाफ किसी भी युद्ध या सैन्य कार्रवाई की शुरुआत नहीं करेंगे, न ही एक-दूसरे पर बल प्रयोग करेंगे या बल प्रयोग की धमकी देंगे. इसके अलावा इसमें लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता सुनिश्चित करने की बात भी कही गई है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का लेबनान के प्रति रुख बेहद आक्रामक रहता है, ऐसे में यह प्रावधान उन्हें कतई पसंद नहीं आने वाला है. ट्रंप इजरायली पीएम के रुख से भली-भांति अवगत हैं, इसके बावजूद पीस डील में इसे जगह दी गई है.
बेंजामिन नेतन्याहू के लिए झटका
शांति समझौते को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, लेकिन इसके कई प्रावधान ऐसे हैं जिन्हें इजरायल (खासकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू) के लिए झटका माना जा रहा है. दिलचस्प बात यह है कि हालिया संघर्षों में भारी सैन्य और राजनीतिक दबाव झेलने वाला ईरान इस समझौते के बाद खुद को अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में पाता दिखाई दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच हुई इस सहमति का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव को कम करना, परमाणु कार्यक्रम को लेकर आशंकाओं को नियंत्रित करना और पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध की आशंका को टालना है. समझौते के तहत ईरान को आर्थिक राहत देने और उसके पुनर्निर्माण के लिए लगभग 300 अरब डॉलर के वित्तीय पैकेज की व्यवस्था किए जाने पर सहमति बनी है. हालांकि, यह निवेश के तौर पर होगा, जिसके लिए अमेरिका की तरफ से पर्याप्त छूट दी जाएगी. इसके अलावा लेबनान से जुड़े कुछ मुद्दों पर भी अमेरिका ने ईरान की चिंताओं को महत्व दिया है. माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस मामले में इजरायल की हार्ड लाइन को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और कई बिंदुओं पर तेहरान की शर्तों को तरजीह दी.
शांति समझौते में ईरान में पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर के प्लान का उल्लेख है. साथ ही लेबनान में सभी तरह के मिलिट्री ऑपरेशन को तत्काल रोकने पर भी सहमति बनी है. ये दोनों प्रावधान इजरायल केा नागवार गुजरा है. (फाइल फोटो/Reuters
नेतन्याहू को क्यों माना जा रहा है नुकसान में?
इजरायल लंबे समय से ईरान को अपने लिए सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा बताता रहा है. नेतन्याहू सरकार की नीति रही है कि ईरान पर अधिकतम दबाव बनाए रखा जाए और उसे आर्थिक या राजनीतिक राहत न दी जाए. ऐसे में यदि अमेरिका ईरान को बड़े आर्थिक पैकेज, प्रतिबंधों में ढील या क्षेत्रीय मामलों में कुछ रियायतें देता है, तो यह इजरायल की रणनीतिक सोच के विपरीत माना जाएगा. विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप ने इस समझौते में अपने व्यापक भू-राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी. अमेरिका के लिए पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाले तनाव को कम करना, एनर्जी मार्केट को स्थिर रखना और संभावित बड़े युद्ध से बचना अधिक महत्वपूर्ण था. यही कारण है कि अमेरिका ने नेतन्याहू की सभी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया.
ईरान हार कर भी कैसे बन गया बाजीगर?
हालिया घटनाक्रम में ईरान को कई झटके लगे. देश को सैन्य नुकसान उठाना पड़ा, उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए और शीर्ष नेतृत्व को लेकर भी अनिश्चितता बनी रही. यहां तक कि इस संघर्ष में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत टॉप लीडरशिप के कई नेता मारे गए. इसके बावजूद शांति समझौते के बाद ईरान खुद को कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है. इसके पीछे कई कारण हैं. पहला, ईरान को आर्थिक राहत मिलने की संभावना है, जिससे उसकी कमजोर होती अर्थव्यवस्था को सहारा मिल सकता है. दूसरा, अमेरिका ने सीधे संवाद और समझौते का रास्ता अपनाकर यह संकेत दिया है कि वह तेहरान को पूरी तरह अलग-थलग करने की नीति से पीछे हट सकता है. तीसरा, क्षेत्रीय राजनीति में ईरान को एक ऐसे पक्ष के रूप में देखा जा रहा है जिसने दबाव के बावजूद बातचीत की मेज पर अपने कुछ प्रमुख हित सुरक्षित रख लिए.
ट्रंप की रणनीति क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करते रहे हैं जो युद्ध के बजाय सौदेबाजी और समझौतों के जरिए परिणाम हासिल करना चाहते हैं. उनकी राजनीतिक शैली में व्यक्तिगत कूटनीति और बड़े समझौते अहम भूमिका निभाते हैं. ट्रंप के लिए यह डील केवल ईरान या इजरायल का मामला नहीं है, बल्कि ग्लोबल लीडरशिप की छवि से भी जुड़ी हुई है. यदि इस समझौते से क्षेत्रीय तनाव कम होता है तो ट्रंप इसे अपनी बड़ी विदेश नीति उपलब्धि के रूप में पेश कर सकते हैं. यही वजह है कि उन्होंने कुछ मुद्दों पर इजरायल की अपेक्षाओं से अलग रुख अपनाने का जोखिम उठाया.
आगे क्या होगा?
हालांकि, समझौते की रूपरेखा पर सहमति बनने की खबरें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी. इजरायल की प्रतिक्रिया, ईरान के भीतर कट्टरपंथी धड़ों का रुख और लेबनान सहित क्षेत्रीय समूहों की भूमिका आने वाले समय में निर्णायक होगी. फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि इस समझौते ने वेस्ट एशिया की शक्ति-संतुलन की बहस को नई दिशा दे दी है. एक तरफ इजरायल को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक और राजनीतिक दबाव झेलने वाला ईरान खुद को कूटनीतिक तौर पर लाभ की स्थिति में दिखाने में सफल रहा है. यही कारण है कि कई विश्लेषक इस घटनाक्रम को ‘हार के बाद भी ईरान की रणनीतिक जीत’ के रूप में देख रहे हैं.




