ईरान की अमेरिका से डील से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 देशों को अब्राहम समझौते पर साइन करने के लिए कह दिया है. अपने ट्रुथ पोस्ट पर उन्होंने कहा है कि अरब दुनिया के ये पांच देश एक साथ इस समझौते पर साइन कर दें. इन पांच देशों में पाकिस्तान भी शामिल है. मिडिल ईस्ट के ज्यादातर देश इस समझौते से बचते आए हैं लेकिन यहां ट्रंप ने नई चाल चल दी है.
ट्रंप की पोस्ट में क्या है चाल?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ पोस्ट पर लिखा है कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन को ईरान के साथ यह अब्राहम समझौता करें. इसमें संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन इस समझौते में पहले ही शामिल हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप ने आगे लिखा कि अब्राहम समझौते में शामिल देशों जैसे कि संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान में संघर्ष और युद्ध के इस दौर में भी आर्थिक और सामाजिक तरक्की का रास्ता बना है.
क्या है अब्राहम समझौता?
अब्राहम समझौता 2020 में संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता से इजराइल और कई अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने वाला समझौता है. इस समझौते के तहत अरब और मुस्लिम देशों को इजराइल को मान्यता देनी होगी. यह समझौता 15 सितंबर 2020 को वाशिंगटन डीसी में साइन हुआ. इसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन शामिल थे. इसके बाद मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए.
समझौते का नाम पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया. दरअसल, यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों अब्राहमिक धर्मों के साझा पूर्वज माने जाते हैं. इसलिए इस नाम का इस्तेमाल मुस्लिम और यहूदियों में समझौते पर जोर देने के लिए किया जा सके. अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, यह घोषणा मिडिल ईस्ट में शांति को मजबूत बनाएगी. इससे आपस में सहयोग बढ़ेगा.
UAE और बहरीन इजराइल को मान्यता देने वाले पहले अरब देश बने, जो 1994 में जॉर्डन के बाद सबसे बड़ा कदम था. मोरक्को को अमेरिका द्वारा पश्चिमी सहारा पर संप्रभुता की मान्यता मिलने के बदले इसमें शामिल किया गया, जबकि सूडान को आतंकवाद प्रायोजक देशों की सूची से हटाए जाने के एवज में सहमति मिली. कजाकिस्तान ने 2025 में इसमें शामिल होने की घोषणा की.
समझौते से बचता रहा है मुस्लिम वर्ल्ड
ज्यादातर मुस्लिम देश इस समझौते पर साइन करने से बचते रहे हैं. इसमें सबसे बड़ा मुद्दा फिलिस्तीन रहा है. सऊदी अरब जैसे प्रमुख देशों ने फिलिस्तीनी राज्य की मांग को बनाए रखा है. कई अरब देशों की जनता में भी इन समझौतों का विरोध है. उन देशों में इजराइल के साथ संबंध फिलिस्तीनी संघर्ष के प्रति विश्वासघात माना जाता है.
ईरान के बढ़ते प्रभाव और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं ने कुछ देशों को समझौते की ओर आकर्षित किया. फिलिस्तीनी मुद्दा, घरेलू राजनीति और जनमत का दबाव अन्य देशों को दूर रखता है. पाकिस्तान ने भी इससे दूरी बनाई हुई है.





