इजरायल भी नहीं रहा अमेरिका का यार, नेतन्याहू के इस फैसले से रिश्तों में खटपट! – Israel America relation Benjamin Netanyahu want end USA Dependency


Israel-Iran Relation: डोनाल्‍ड ट्रंप की अगुाआई में अमेरिका अपने पुराने सहयोगियों और उनकी चिंताओं को दरकिनार कर रहे हैं? क्‍या अमेरिका अब नए सहयोगी की तलाश में है? क्‍या ट्रंप उन देशों के साथ संबंधों को मजबूत करना चाहते हैं जो कभी अमेरिका के कट्टर दुश्‍मन कहे जाते थे? ये सब सवाल इसलिए उठने लगे हैं, क्‍योंकि डोनाल्‍ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिससे दशकों पुराने सहयोगी अमेरिका से दूर होने लगे हैं. पहले यूरोप और अब इजरायल एवं वियतनाम से इस बात के पुख्‍ता संकेत मिले हैं. डोनाल्‍ड ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू और वियतनाम की तरफ से ऐसे बयान सामने आए हैं, जिससे अमेरिका के साथ खटपट की पुष्‍टि करते हैं. नेतन्‍याहू ने तो अमेरिका पर निर्भरता को लेकर खुलकर टिप्‍पणी की है और भविष्‍य में इसको कम करने की बात कही है.

अमेरिका से दशकों से अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक सहायता पाने वाला इजरायल अब धीरे-धीरे उस मदद पर अपनी निर्भरता कम करने की बात कर रहा है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू (Benjamin Netanyahu) के हालिया बयान ने इस बहस को नई दिशा दे दी है कि क्या इजरायल वास्तव में अमेरिकी सैन्य सहायता के बिना अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा कर सकता है. हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि निकट भविष्य में वॉशिंगटन से पूरी तरह अलग होना इजरायल के लिए संभव नहीं है, लेकिन बदलते वैश्विक और घरेलू राजनीतिक समीकरणों ने तेल अवीव को आत्मनिर्भरता की दिशा में सोचने पर मजबूर किया है. नेतन्याहू ने अमेरिकी चैनल CBS के कार्यक्रम ‘60 Minutes’ में कहा कि अब समय आ गया है कि इजरायल अमेरिकी सैन्य सहायता से धीरे-धीरे बाहर निकले और अपनी सुरक्षा जरूरतों को खुद पूरा करने की क्षमता विकसित करे. उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका अभी भी इजरायल को हर साल 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है. यह सहायता 2016 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा (Barack Obama) के कार्यकाल में हुए 10 वर्षीय समझौते के तहत दी जा रही है. इस फंड का बड़ा हिस्सा अमेरिकी हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने में खर्च करना अनिवार्य है.

राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की चीन यात्रा के बाद इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्‍याहू का अमेरिका पर से निर्भरता कम करने का बयान सामने आया है. (फाइल फोटो/Reuters)

$300 अरब डॉलर की मदद

अमेरिका और इजरायल के रिश्ते लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी पर आधारित रहे हैं. 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से अब तक अमेरिका उसे 300 अरब डॉलर से अधिक की आर्थिक और सैन्य सहायता दे चुका है. विदेशी संबंध परिषद यानी Council on Foreign Relations के आंकड़ों के मुताबिक, 1946 के बाद किसी भी देश को अमेरिका से इतनी अधिक सहायता नहीं मिली. गाजा युद्ध के दौरान यह सहायता और बढ़ गई. साल 2024 में इजरायल को अमेरिकी सैन्य मदद कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. नेतन्याहू के बयान के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका में बदलती जनमत की स्थिति है. हाल के वर्षों में अमेरिकी के भीतर इजरायल के प्रति समर्थन में कमी देखी गई है. मार्च में Pew Research Centre द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में लगभग 60 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने इजरायल के प्रति नकारात्मक राय व्यक्त की. खासतौर पर गाजा युद्ध के बाद अमेरिकी विश्वविद्यालयों, प्रगतिशील समूहों और युवा मतदाताओं के बीच इजराइल विरोधी भावना बढ़ी है.

इजरायल सैन्य इतिहासकार Danny Orbach का कहना है कि नेतन्याहू अमेरिकी राजनीतिक माहौल को अच्छी तरह समझते हैं. उनके मुताबिक यदि अमेरिकी जनता और राजनीति धीरे-धीरे सहायता के खिलाफ जा रही है, तो इजरायल के लिए बेहतर होगा कि वह खुद ही पहले अपनी निर्भरता कम करने की प्रक्रिया शुरू करे, बजाय इसके कि भविष्य में उस पर सहायता बंद होने का दबाव बने. सिर्फ राजनीतिक कारण ही नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान सामने आई सैन्य कमजोरियों ने भी इजरायल की चिंता को बढ़ाया है. हाल ही में इजरायल की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कई सरकारें स्थानीय हथियार निर्माण क्षमता को मजबूत करने और आवश्यक कच्चे माल के भंडार तैयार करने में विफल रहीं. रिपोर्ट के अनुसार, गाजा युद्ध और क्षेत्रीय तनाव के दौरान हथियारों तथा मिसाइल रक्षा प्रणालियों की मांग अचानक बढ़ने से सप्लाई चेन की कमजोरियां उजागर हो गईं.

इजरायल-अमेरिका संबंध बेहद खास

  • Benjamin Netanyahu ने संकेत दिया है कि इजरायल भविष्य में अमेरिकी सैन्य सहायता पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि इजरायल शेष सैन्य समर्थन से धीरे-धीरे बाहर निकले.
  • अमेरिका फिलहाल इजरायल को हर साल 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है. यह सहायता 2016 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Barack Obama के कार्यकाल में हुए 10 वर्षीय समझौते के तहत दी जा रही है.
  • 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से अमेरिका ने उसे आर्थिक और सैन्य सहायता के रूप में 300 अरब डॉलर से अधिक की मदद दी है. यह किसी भी देश को 1946 के बाद मिली सबसे बड़ी अमेरिकी सहायता मानी जाती है.
  • Israel-Hamas War के दौरान अमेरिकी सैन्य सहायता में और तेजी आई. अमेरिकी थिंक टैंक Council on Foreign Relations के अनुसार 2024 में यह सहायता कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई.
  • विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का बयान अमेरिका में बदलती राजनीतिक सोच और इजराइल विरोधी बढ़ती जनभावना से जुड़ा है. Pew Research Center के एक सर्वे में करीब 60 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने इजरायल के प्रति नकारात्मक राय व्यक्त की.
  • इजरायल के सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के दौरान हथियारों और मिसाइल प्रणालियों की कमी ने देश की सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर कर दिया है. हाल ही में जारी सरकारी रिपोर्ट में स्थानीय हथियार निर्माण क्षमता बढ़ाने में विफलता की आलोचना की गई.
  • मार्च में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों के हमले के दौरान David’s Sling इंटरसेप्टर सिस्टम में खराबी आने से दक्षिणी इजरायल में कई लोग घायल हुए. रिपोर्ट्स के अनुसार Arrow Missile Defense System के स्टॉक भी तेजी से घटे हैं.
  • विशेषज्ञों के अनुसार इजरायल फिलहाल पूरी तरह अमेरिकी सहायता छोड़ने की स्थिति में नहीं है. उसकी सेना अब भी अमेरिकी फाइटर जेट, पनडुब्बियों, मिसाइल तकनीक और स्पेयर पार्ट्स पर काफी हद तक निर्भर है.
  • इजरायल की मजबूत होती अर्थव्यवस्था को सहायता घटाने के पक्ष में बड़ा कारण बताया जा रहा है. IMF के अनुमान के मुताबिक 2016 में इजरायल की जीडीपी 320 अरब डॉलर थी, जो 2026 तक बढ़कर लगभग 720 अरब डॉलर हो सकती है.
  • विश्लेषकों का कहना है कि यदि अमेरिकी सहायता धीरे-धीरे कम होती है तो इजरायल को हथियार खरीद में अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है. इससे वह India, Serbia और Greece जैसे देशों से रक्षा सौदे कर सकेगा, हालांकि सुरक्षा मामलों में अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी फिलहाल बेहद अहम बनी रहेगी.

इस वजह से बढ़ी चिंता

मार्च में दो ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों ने दक्षिणी इजरायल को निशाना बनाया. बताया गया कि उस समय David’s Sling इंटरसेप्टर प्रणाली में खराबी आ गई थी, जिसके कारण मिसाइलों को रोकने में दिक्कत हुई और कई लोग घायल हो गए. इसके बाद यह भी सामने आया कि उन्नत Arrow missile defense system इंटरसेप्टर सिस्‍टम का स्टॉक तेजी से घट रहा है. इन घटनाओं ने इजराइल के भीतर यह बहस तेज कर दी कि क्या देश को अपने रक्षा उत्पादन ढांचे को और मजबूत नहीं करना चाहिए. हालांकि, नेतन्याहू आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इजरायल अभी अमेरिकी मदद छोड़ने की स्थिति में नहीं है. अमेरिकी सहायता इजरायल के कुल रक्षा बजट का आठ प्रतिशत से भी कम हिस्सा है, लेकिन उसका रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा है. साल 2026 के लिए इजरायल का रक्षा बजट लगभग 143 अरब शेकेल यानी करीब 49 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इसके बावजूद देश अभी भी अमेरिकी तकनीक पर निर्भर है. इजरायली वायुसेना के लड़ाकू विमान, उन्नत हथियार प्रणाली, मिसाइल तकनीक, पनडुब्बियां और स्पेयर पार्ट्स का बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है. इजरायल के पास घरेलू रक्षा उद्योग मजबूत जरूर है, लेकिन वह अभी अमेरिकी तकनीक का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाया है. विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सैन्य सहयोग सिर्फ फंड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें खुफिया साझेदारी, तकनीकी अनुसंधान और कूटनीतिक समर्थन भी शामिल है.

नेतन्याहू ने अमेरिकी सैन्य सहायता कम करने की बात क्यों कही?
इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu का मानना है कि इजरायल को धीरे-धीरे अमेरिकी सैन्य सहायता पर निर्भरता कम करनी चाहिए और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहिए. उन्होंने कहा कि बदलती अमेरिकी राजनीति, इजराइल के खिलाफ बढ़ती जनमत और युद्ध के दौरान हथियार आपूर्ति में आई कमजोरियों ने इस सोच को मजबूती दी है.

अमेरिका अब तक इजरायल को कितनी सहायता दे चुका है?
1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से अमेरिका उसे आर्थिक और सैन्य मदद के रूप में 300 अरब डॉलर से अधिक की सहायता दे चुका है. मौजूदा समझौते के तहत अमेरिका हर साल 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है, जिसका बड़ा हिस्सा अमेरिकी हथियार खरीदने में खर्च होता है. गाजा युद्ध के दौरान यह सहायता और बढ़ गई.

क्या इजरायल पूरी तरह अमेरिकी सहायता छोड़ सकता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल यह संभव नहीं है. इजरायल अभी भी अमेरिकी फाइटर जेट, मिसाइल सिस्टम, पनडुब्बियों और स्पेयर पार्ट्स पर काफी निर्भर है. हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी अवधि में धीरे-धीरे सहायता कम करना संभव हो सकता है, लेकिन तुरंत पूरी तरह अलग होना इजरायल की सुरक्षा के लिए जोखिम भरा होगा.

इजरायल की अर्थव्यवस्था इस बहस में क्या भूमिका निभा रही है?
इजरायल समर्थकों का तर्क है कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से मजबूत हुई है. 2016 में जहां इजरायल की जीडीपी करीब 320 अरब डॉलर थी, वहीं 2026 तक इसके 720 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. ऐसे में इजरायल अब अपने रक्षा खर्च का बड़ा हिस्सा खुद उठाने की स्थिति में माना जा रहा है.

अमेरिकी सहायता कम होने से इजरायल को क्या फायदा हो सकता है?
विश्लेषकों का कहना है कि सहायता कम होने से इजरायल को हथियार खरीद में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी. अभी अमेरिकी सहायता की शर्तों के कारण उसे अधिकांश हथियार अमेरिका से ही खरीदने पड़ते हैं. भविष्य में वह भारत, ग्रीस या सर्बिया जैसे देशों से भी रक्षा सौदे कर सकता है. साथ ही, मजबूत घरेलू रक्षा उद्योग से इजरायल के हथियार निर्यात को भी बढ़ावा मिल सकता है.

इजरायल को स्‍पार्टा बनाने का लक्ष्‍य

नेतन्याहू पहले भी इजरायल को स्पार्टा जैसा सैन्य रूप से आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की बात कह चुके हैं. लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व जैसे अस्थिर क्षेत्र में इजराइल अमेरिका से दूरी बनाकर अपनी सुरक्षा कमजोर नहीं करना चाहेगा. इजरायल के पूर्व काउंसल जनरल Yaki Dayan का कहना है कि 2016 के बाद से इजरायल की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है और यही आत्मनिर्भरता की सोच को बल दे रही है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के अनुमानों के अनुसार 2016 में इजरायल की जीडीपी लगभग 320 अरब डॉलर थी, जो 2026 तक बढ़कर करीब 720 अरब डॉलर हो सकती है. उनका तर्क है कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण अब अमेरिका पर वित्तीय निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है. डेयान का यह भी कहना है कि अमेरिका को भी इस साझेदारी से बड़ा लाभ मिलता है. इजरायल युद्धक्षेत्र में अमेरिकी हथियार प्रणालियों का वास्तविक परीक्षण करता है, जिससे अमेरिकी रक्षा कंपनियों को अपनी तकनीक सुधारने में मदद मिलती है. कई अमेरिकी हथियार प्रणालियों में किए गए सुधारों के पीछे इजरायली अनुभव अहम रहे हैं.

इजरायल को क्‍या फायदा?

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि इजराइल धीरे-धीरे अमेरिकी सहायता कम करता है, तो उसे हथियार खरीद में अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है. मौजूदा समझौते के तहत सहायता राशि का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी उत्पादों पर ही खर्च करना होता है. सहायता कम होने पर इजरायल अन्य देशों से भी रक्षा उपकरण खरीद सकेगा. डैनी ऑरबाख का मानना है कि इजरायल चीन या रूस जैसे देशों की ओर शायद न जाए, लेकिन भारत, सर्बिया और ग्रीस जैसे देशों के साथ रक्षा खरीद और तकनीकी सहयोग बढ़ा सकता है. इससे उसका घरेलू रक्षा उद्योग भी मजबूत होगा और हथियार निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी. इजरायल पहले ही अपनी मिसाइल रक्षा प्रणाली ‘एरो’ के निर्यात में सफलता हासिल कर चुका है. जर्मनी ने अरबों डॉलर के समझौते के तहत इस प्रणाली को खरीदने पर सहमति जताई है और अन्य देशों के साथ भी बातचीत जारी है. इससे इजरायल को वैश्विक हथियार बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल रहा है.



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