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Prateek Yadav Depression : सपा मुखिया अखिलेश यादव के भाई प्रतीक यादव की दुखद मृत्यु ने एक बार फिर मेंटल हेल्थ और डिप्रेशन जैसे गंभीर मुद्दों पर बहस छेड़ दी है. हमारे समाज में अक्सर डिप्रेशन जैसा मुद्दा चर्चा का विषय नहीं बनता. अधिकांश लोग सोचते हैं ये कोई बीमारी नहीं है. लेकिन जो लोग डिप्रेशन में होते हैं उन्हें पता है कि यह कितनी खतरनाक बीमारी है. ऐसा कहा जा रहा है कि प्रतीक यादव घोर डिप्रेशन के शिकार थे. इसकी वजह से मौत हुई या नहीं, इसकी रिपोर्ट तो बाद में आएगी लेकिन हमने इस मुद्दे पर डॉ. से जानना चाहा कि क्या डिप्रेशन सिर्फ उदासी है या मौत का रास्ता.
डिप्रेशन से मौत का कितना कनेक्शन कितना.
Prateek Yadav Depression : प्रतीक यादव फिटनेस फ्रीक थे. इस कारण वे सोशल मीडिया पर अक्सर इंफ्लुएंसर की तरह छाए रहते थे. उनकी बॉडी और फिटनेस को देखते हुए कोई यह नहीं कह सकता था कि उन्हें कोई बीमारी है. हालांकि शुरुआती चर्चाओं में ऐसा कहा जा रहा है कि प्रतीक यादव डिप्रेशन से जूझ रहे थे. सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा है कि कभी-कभी कारोबार में आर्थिक नुकसान होने पर लोग बहुत दुखी हो जाते हैं. तो क्या कारोबार में घाटा ही डिप्रेशन की वजह थी. या कुछ और. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या डिप्रेशन इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि वह इंसान की जान ले ले? इस विषय पर हमने फोर्टिस अस्पताल, गुरुग्राम में सीनियर साइकेट्रिस्ट डॉ. नेहा अग्रवाल से बात की.
क्या कारोबार में नुकसान बनी डिप्रेशन की वजह
डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया कि डिप्रेशन के कई कारण होते है. कारोबार में घाटा भी इसकी वजह हो सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं. वास्तव में डिप्रेशन खतरनाक बीमारी है जो अगर गंभीर हो जाए तो उसमें इंसान अपना सुध-बुध खो बैठता है और उसके मन में बार-बार मरने के विचार आते हैं. उसे लगता है कि मौत ही उसके दुख को खत्म करने का आखिरी रास्ता है. इस केस में अक्सर डिप्रेशन से जूझ रहे लोग सुसाइड कर लेते हैं. लेकिन इससे पहले काफी लंबा समय वह डिप्रेशन में बिताता है. वह हमेशा उदास रहता है, निराश रहता है और धीरे-धीरे वह सबसे अलगाव महसूस करने लगता है. इस तरह देखा जाए तो डिप्रेशन से लोगों की मौत भी हो सकती है लेकिन इसमें अधिकांश केस सुसाइड के ही होते हैं. मतलब इंसान बहुत ज्यादा डिप्रेशन में हो और उसमें चीजों को समझने की क्षमता कम होने लगे तो एक्सट्रीम कंडीशन में वह सुसाइड कर सकता है लेकिन अगर किसी की मौत सुसाइड से नहीं होती है और मौत हो जाती है तो उसमें बहुत लंबा वक्त लगेगा. इससे पहले शरीर के अधिकांश महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचेगा.
डिप्रेशन है क्या
वैज्ञानिक भाषा में कहें तो डिप्रेशन केवल उदासी या निराशा भर नहीं है. यह एक न्यूरोलॉजिकल और मूड डिसऑर्डर है. डॉ. नेहा अग्रवाल बताती हैं कि इसका मतलब यह हुआ कि जब व्यक्ति गहरी उदासी में चला जाता है तो उसके ब्रेन में कई तरह की रासायनिक हलचलें घट-बढ़ जाती है. इसका मुख्य कारण मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमिटर्स का असंतुलन है. सेरोटोनिन, डोपामाइन और नोरपेनेफ्रिन जैसे हार्मोन न्यूरोट्रांसमीटर है. ये व्यक्ति की भावनाओं और ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं. जब कोई व्यक्ति डिप्रेशन में होता है तो उसके ब्रेन की संरचना में हिप्पोकैम्पस और एमिग्डाला के बीच संचार तंत्र धीमा हो जाता है. ब्रेन का हिप्पोकैम्पस वाला हिस्सा हमारे याददाश्त का केंद्र है जबकि एमिग्डाला वाला हिस्सा डर और भावनाओं का केंद्र है. इसमें संतुलन होना आवश्यक है. इन सबके साथ ही शरीर में तनाव वाला हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है जो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क को बाधित करता है. इस अवस्था में व्यक्ति की सोच में गहराई कम हो जाती है, तार्किकता का अभाव होने लगता है, नींद में कमी या ज्यादा नींद आने लगती है, सामान्य शारीरिक गतिविधियां भी प्रभावित होने लगती है. इससे मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर- MDD कहा जाता है.
डिप्रेशन का लक्षण क्या है
डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि जब व्यक्ति डिप्रेशन में होता है तो वह बहुत उदास रहने लगता है. वह होपलेसनेस होने लगता है. उसे लगता है कि उसका जीवन बेकार है. उसका तार्किकता वाला हिस्सा कम करने लगता है. इससे आत्महत्या केे ख्याल आते हैं. जब इसका इलाज न किया जाए तो यह सीवर हो जाता है. इसमें ब्रेन के अंदर ऑवऑल न्यूरोट्रांसमीटर का लेवल चेंज होने लगता है. कई बार इंसान डिसीजन मेकिंग नहीं कर पाते है. सीवर डिप्रेशन का भी इलाज नकिया जाए तो यह साइकोटिक डिप्रेशन में बदल जाता है. यह एक्सट्रीम कंडीशन है. इसमें डिसीजन लेने की क्षमता बहुत कम हो जाती है. इसमें व्यक्ति रिएलिटी से टच खो देता. वह सही-गलत से अवगत नहीं रह पाते, उसका जजमेंट खराब होने लगता है. उसे लगता है कि हर कोई हमारे बारे में गलत सोच रहा है या गलत करने वाला है. ऐसे में बार-बार अपना जीवन बेकार लगने लगता है और खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने लगता है. कई बार ऐसा लगता है कि मर जाउंगा तो सब ठीक हो जाएगा. कुछ मामलों में दूसरों को भी नुकसान पहुंचा सकता है.
तो क्या डिप्रेशन में बिना सुसाइड भी मौत हो सकती है
अब असली सवाल यही है कि अगर डिप्रेशन में इंसान सुसाइड नहीं करता है तो क्या अपने आप मौत हो सकती है. डॉ. नेहा अग्रवाल बताती हैं कि इस केस में आमतौर पर सुसाइड ही सबसे बड़ा कारण है लेकिन अगर सुसाइड कारण नहीं है तो डिप्रेशन से मौत होने में सालों समय लगता है और इससे पहले शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों का खराब होना इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है. अगर आत्महत्या नहीं हो तो डिप्रेशन वाले व्यक्ति दो अन्य बड़े कारण होते हैं. पहला है कि इस उदासी भरे जीवन में वह खाना-पीना छोड़ दें. खाना-पीना छोड़ने से शरीर में कई तरह की प्रक्रियाएं होंगी जो अंततः मौत की ओर ले जाएंगी. दूसरा कारण है कि जब व्यक्ति डिप्रेशन में होता है तो उसमें कॉर्टिसोल हार्मोन बहुत बढ़ जाता है और इम्युनिटी बहुत कमजोर होने लगती है. इससे पूरे शरीर में इंफ्लामेशन बढ़ जाता है. इंफ्लामेशन बढ़ने से शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंग जैसे कि हार्ट, किडनी, लिवर आदि में तरह-तरह की दिक्कतें होने लगती है और व्यक्ति मौत की ओर जाने लगता है.
क्या इसकी दवाई नहीं है
बिल्कुल इसकी दवाई है. डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि हमारे देश में यही समस्या है. लोगों के पास मेंटल हेल्थ को लेकर जागरुकता नहीं है. असली बात यह है कि मेंटल हेल्थ या डिप्रेशन की दवा हमारे पास मौजूद है. अगर कोई व्यक्ति डिप्रेशन में है या बहुत ज्यादा एंग्जाइटी में रहता है, बहुत ज्यादा स्ट्रेस में रहता है तो उसे मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए. जो लोग इसके बारे में जानते हैं, उसे भी ऐसे लोगों को भेजना चाहिए. इन बीमारियों का पूरी तरह से इलाज है. दवाई खाने के बाद वे पूरी तरह ठीक हो सकते हैं.
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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें





