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ईरान के साथ चले भीषण युद्ध ने सुपरपावर अमेरिका के सैन्य दबदबे की पोल खोल दी है, क्योंकि हफ्तों तक चले इस संघर्ष में अमेरिका ने अपने सबसे घातक हथियारों का भंडार लगभग खाली कर दिया है. ‘सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज’ (CSIS) की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन ने अपने ‘पैट्रियट’ और ‘थाड’ (THAAD) जैसे उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम का करीब आधा स्टॉक और चीन के लिए बचाकर रखी गई 1,100 लंबी दूरी की स्टील्थ मिसाइलें ईरान के खिलाफ जंग में झोंक दी हैं.
अमेरिका के हथियार खत्म
वॉशिंगटन: क्या दुनिया के ‘सुपरपावर’ अमेरिका का दबदबा अब खत्म होने वाला है? ईरान के साथ हफ्तों तक चले भीषण युद्ध के बाद अमेरिका ने अपनी ‘सोने की लंका’ यानी अपने सबसे घातक हथियारों का भंडार लगभग खाली कर दिया है. हालात ये हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब एक तरफा किनारे लग गए हैं और दुनिया के सामने अमेरिका की पोल खुल गई है. ये वो हथियार थे जो अमेरिका ने भविष्य में चीन और रूस जैसी महाशक्तियों से निपटने के लिए सहेज कर रखा था.
ईरान युद्ध में कितना ‘बारूद’ फूंक चुका है अमेरिका?
- पैट्रियट और थाड (THAAD): अमेरिका ने अपने ‘पैट्रियट’ एयर डिफेंस इंटरसेप्टर का करीब 50% और ‘थाड’ मिसाइलों का लगभग आधा स्टॉक खत्म कर दिया है.
- टॉमहॉक क्रूज मिसाइल: अमेरिका ने करीब 1,000 टोमहॉक मिसाइलें दागी हैं, जो उसके पूरे साल की खरीद से दस गुना ज्यादा है.
- चीन के लिए रखी मिसाइलें: सबसे चिंताजनक बात ये है कि चीन के साथ संभावित युद्ध के लिए बचाकर रखी गई 1,100 लंबी दूरी की ‘स्टील्थ क्रूज मिसाइलें’ भी इस जंग में इस्तेमाल हो चुकी हैं.
इसे US की ‘मैथ प्रॉब्लम’ क्यों कह रहे हैं विशेषज्ञ?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल हथियारों के खत्म होने का सवाल नहीं है, बल्कि उन्हें दोबारा बनाने का है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, जितना बारूद अमेरिका ने कुछ हफ्तों में फूंक दिया, उसे दोबारा बनाने में 1 से 4 साल का समय लग सकता है.
अमेरिकी कारखाने उतनी तेजी से मिसाइलें नहीं बना पा रहे हैं, जितनी तेजी से युद्ध के मैदान में उनकी खपत हो रही है. सीनेटर मार्क केली ने चेतावनी दी है कि ईरान के पास ड्रोन और मिसाइलों का विशाल भंडार है, और एक समय ऐसा आएगा जब अमेरिका के पास उन्हें रोकने के लिए मिसाइलें ही नहीं बचेंगी.
एशिया और यूरोप की सुरक्षा दांव पर
ईरान के मोर्चे को संभालने के लिए पेंटागन को एशिया और यूरोप में तैनात हथियारों को वहां से हटाना पड़ा है. दक्षिण कोरिया में तैनात मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भी ईरान के खिलाफ युद्ध में झोंक दिया गया है. इससे चीन और रूस जैसे देशों के खिलाफ अमेरिका की ‘तैयारी’ कमजोर हुई है.
कितना महंगा पड़ रहा है ये युद्ध
ये जंग अमेरिका की जेब पर भी बहुत भारी पड़ रही है. इस युद्ध का खर्च हर दिन करीब 1 बिलियन डॉलर है. एक पैट्रियट मिसाइल की कीमत $4 मिलियन यानी करीब 33 करोड़ रुपये और एक टोमहॉक की कीमत $3.6 मिलियन यानी करीब 30 करोड़ रुपये है. दुश्मन के सस्ते ड्रोन्स को गिराने के लिए इतनी महंगी मिसाइलें चलाना अमेरिका के लिए ‘घाटे का सौदा’ साबित हो रहा है.
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Utkarsha Srivastava is seasoned digital journalist specializing in geo-politics issues, currently writing for World section of News18 Hindi. With over a decade of extensive experience in hindi digital media, sh…और पढ़ें





