पेट-जोड़ों का दर्द लेकर गंगाराम अस्पताल आई मरीज,जांच में निकल आए दो-दो कैंसर, फिर क्या हुआ, पढ़ें


Gangaram Hospital news: राजधानी के सर गंगाराम अस्पताल में कैंसर का एक काफी कॉम्प्लिकेटेड मामला सामने आया. यहां सामान्य पेट दर्द, कमर और जोड़ों के दर्द की शिकायत लेकर आई एक महिला की जांच में एक नहीं बल्कि दो-दो कैंसर निकल आए. महिला को मल्टीपल मायलोमा के साथ ही पैनक्रियाटिक ट्यूमर निकला. ऐसे में डॉक्टरों के सामने किस कैंसर का इलाज पहले करें यह दुविधा पैदा हो गई.

हालांकि गंगाराम के डॉक्टरों ने इस दुर्लभ और जटिल चिकित्सा मामले को बहुत ही संजीदगी से सुलझाया और ज्यादा गंभीर कैंसर का इलाज सबसे पहले किया. डॉक्टरों ने बताया कि ऐसा मामला वैश्विक स्तर पर 0.5% से भी कम मरीजों में देखने को मिलता है.

पेट और जोड़ों के दर्द की थी शिकायत
जानकारी के मुताबिक मरीज पिछले एक वर्ष से जोड़ों के दर्द, कमर दर्द, उलझन, मतली और पेट फूलने जैसी समस्याओं से जूझ रही थी. शुरुआती जांच में उसका हीमोग्लोबिन स्तर बेहद कम, मात्र 5.9 g/dL पाया गया, जो गंभीर एनीमिया की ओर इशारा करता है. इसके बाद डॉक्टरों ने गहराई से जांच की, जिसमें कई जटिल असामान्यताएं जैसे हाइपरग्लोबुलिनेमिया, बीटा-2 माइक्रोग्लोबुलिन का बढ़ा स्तर और मोनोक्लोनल IgG स्पाइक सामने आईं.

पहले निकला मल्टीपल मायलोमा
बोन मैरो जांच में हाई-रिस्क मल्टीपल मायलोमा (Multiple Myeloma) की पुष्टि हुई, जिसमें 39% प्लाज्मा सेल्स की भागीदारी और प्रतिकूल साइटोजेनेटिक संकेत पाए गए. वहीं, एफडीजी पैट स्कैन (FDG PET-CT) स्कैन में हड्डियों में कई घावों के साथ-साथ अग्न्याशय (पैंक्रियास) में एक गांठ भी दिखाई दी. बायोप्सी के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (Neuroendocrine Tumor) (ग्रेड-1) है.

दो कैंसर का इलाज बेहद कठिन
इस जटिल स्थिति पर गंगाराम के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरपर्सन डॉ. श्याम अग्रवाल ने कहा, ‘एक ही समय पर दो अलग-अलग कैंसर का मिलना बेहद दुर्लभ और चुनौतीपूर्ण होता है. सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह था कि किस उपचार को प्राथमिकता दी जाए, ताकि मरीज को अधिकतम लाभ मिल सके.’

‘डॉक्टरों की टीम ने आक्रामक प्रकृति वाले मल्टीपल मायलोमा के इलाज को प्राथमिकता देते हुए VRd रेजिमेन (लेनालिडोमाइड, बोर्टेजोमिब और डेक्सामेथासोन) से इलाज शुरू किया. आर्थिक कारणों से डाराटुमुमैब का उपयोग संभव नहीं था. साथ ही, पैंक्रियाटिक ट्यूमर को नियंत्रित करने के लिए लंबे समय तक असर करने वाले ऑक्ट्रीओटाइड इंजेक्शन दिए गए. मरीज को रक्त चढ़ाने और हड्डियों को मजबूत करने वाली सहायक चिकित्सा भी दी गई.

3 महीने में सुधर गई स्थिति
इलाज का असर तेजी से दिखा. कुछ ही हफ्तों में मरीज के लक्षणों में सुधार हुआ और तीन महीनों के भीतर वह पूर्ण हेमेटोलॉजिकल रेमिशन में पहुंच गई, जहां बोन मैरो की स्थिति सामान्य हो गई.

स्थिति स्थिर होने के बाद, मरीज की सफल सर्जरी की गई. इस बारे में लिवर ट्रांसप्लांट विभाग के सह-निदेशकडॉ. सुरेश सिंघवी ने डिस्टल पैंक्रियाटो-स्प्लेनेक्टॉमी प्रक्रिया को अंजाम दिया. अंतिम पैथोलॉजी रिपोर्ट में कम ग्रेड का न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर पाया गया, जिसमें वृद्धि की दर बेहद कम थी.

अभी कैसा है हाल?
वर्तमान में मरीज मेंटेनेंस थेरेपी पर है और आगे ऑटोलॉगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की योजना बनाई गई है. डॉक्टरों के अनुसार, दोनों कैंसर अब प्रभावी रूप से नियंत्रित हैं और मरीज का भविष्य सकारात्मक दिख रहा है.

डॉ. अग्रवाल ने कहा, ‘यह मामला दर्शाता है कि जटिल कैंसर स्थितियों में समग्र जांच और मल्टी-डिसिप्लिनरी अप्रोच कितनी महत्वपूर्ण होती है. सही समय पर सही इलाज से दुर्लभ और चुनौतीपूर्ण मामलों में भी बेहतरीन परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.’

यह सफलता न केवल आधुनिक चिकित्सा तकनीक की क्षमता को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि सही रणनीति और विशेषज्ञों के समन्वय से असंभव लगने वाले इलाज भी संभव हो सकते हैं.



Source link

Latest articles

spot_imgspot_img

Related articles

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

spot_imgspot_img