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अगर एनर्जी ड्रिंक पीकर आप खुद को हेल्दी और तंदुरुस्त मान रहे हैं तो अपनी इस विचारधारा को बदल दीजिए, क्योंकि डॉक्टरों की मानें तो एनर्जी ड्रिंक एल्कोहॉल से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रही हैं. इनमें मौजूद कैफीन चीनी और कैमिकल्स से युवाओं में लिवर डैमेज और एनएएफएलडी के केस तेजी से बढ़ रहे हैं. लिवर की हेल्थ के लिए डॉक्टरों ने ड्रिंक का सेवन सीमित करने और जागरूकता की अपील की है.
अभी तक आपने शराब के नुकसानों के बारे में सुना होगा लेकिन जिस ड्रिंक को आप बेहद फायदेमंद समझकर पीते हैं, वह चीज रम और टकीला शॉट से कहीं ज्यादा खराब है. डॉक्टरों की मानें तो बाजार में मिलने वाले एनर्जी ड्रिंक आपके शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग को नुकसान पहुंचा रहे हैं और यह नुकसान इतना ज्यादा है कि इससे शरीर के करीब 500 काम रुक सकते हैं.

भारत भर के प्रमुख लिवर विशेषज्ञों ने एनर्जी ड्रिंक को लेकर गंभीर जन स्वास्थ्य चिंता जताई है. उनकी मानें तो एनर्जी ड्रिंक्स का ज्यादा सेवन देश के युवाओं में लिवर की क्षति का एक महत्वपूर्ण कारण बन गया है. ग्लोबल वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है और युवा रोगियों में लिवर रोग के शुरुआती लक्षण तेजी से दिखाई दे रहे हैं.

बीएमजे केस रिपोर्ट्स पत्रिका में प्रकाशित एक केस में बताया गया कि एनर्जी ड्र्रिंक के बहुत ज्यादा इस्तेमाल से स्वस्थ व्यक्ति में तीव्र हेपेटाइटिस का पता चला था. उसके शरीर में मुख्य रूप से नियासिन (विटामिन बी3) की उच्च मात्रा मिली थी जिसकी ज्यादा लिवर के लिए जहरीली मानी जाती है. इसके अलावा शोध से पता चलता है कि इन पेय पदार्थों में मौजूद उच्च शर्करा, कैफीन और रासायनिक योजकों का संयोजन लिवर कोशिकाओं में वसा संचय, ऑक्सीडेटिव तनाव और सूजन को बढ़ा सकता है.
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विशेषज्ञों का कहना है कि जब इन पेय पदार्थों का बार-बार सेवन किया जाता है, खासकर शराब या अनहेल्दी आहार के साथ, तो ये पेय पदार्थ गैर-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग (एनएएफएलडी) विकसित होने के जोखिम को काफी हद तक बढ़ा देते हैं. लिवर ट्रांसप्लांटेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया (एलटीएसआई) के अध्यक्ष डॉ. अभिदीप चौधरी कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में, लिवर की खराबी से पीड़ित युवा रोगियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है.

डॉ. चौधरी ने कहा कि एनर्जी ड्रिंक्स, शराब और उच्च शर्करा वाले पेय पदार्थ. एनर्जी ड्रिंक्स, जिन्हें अक्सर हानिरहित माना जाता है, उनमें कैफीन, चीनी और कैमिकल्स की उच्च मात्रा होती है जो लिवर पर अत्यधिक दबाव डालती है. शराब के साथ लेने या अत्यधिक सेवन करने पर ये लिवर के डैमेज को और बढ़ा देते हैं. शराब लिवर रोग का एक प्रमुख कारण बनी हुई है, और शर्करायुक्त पेय पदार्थ फैटी लिवर रोग में योगदान करते हैं. ये तीनों मिलकर एक गंभीर स्थिति पैदा कर रहे हैं. ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अगर लिवर की क्षति एक निश्चित सीमा से आगे बढ़ जाती है, तो अक्सर लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र जीवनरक्षक विकल्प बचता है.

हेल्थ एक्सपर्ट ने कहा कि एनर्जी ड्रिंक्स को युवाओं को क्षमता बढ़ाने और थकान दूर करने वाले पेय पदार्थों के रूप में आक्रामक रूप से बेचा जा रहा है. हालांकि, इन पेय पदार्थों में अक्सर कैफीन की मात्रा अनुशंसित दैनिक सीमा से कहीं ज्यादा होती है, साथ ही इनमें टॉरिन और हर्बल उत्तेजक जैसे पदार्थ भी होते हैं, जिन्हें लिवर को पचाना पड़ता है. समय के साथ, यह जैव-रासायनिक अतिभार लिवर के कार्य को बाधित कर सकता है.

भारत में गैर-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर रोग में चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है. अध्ययनों से पता चलता है कि शहरी आबादी का लगभग 25-30% हिस्सा इससे प्रभावित हो सकता है, जिसमें किशोरों और युवा वयस्कों की बढ़ती संख्या भी शामिल है. मीठे पेय पदार्थों का अधिक सेवन इसका एक प्रमुख कारण है, जो इंसुलिन प्रतिरोध और लिवर में वसा जमाव को बढ़ावा देता है. एनर्जी ड्रिंक्स और शराब के सेवन के साथ मिलकर यह नुकसान और भी गंभीर और तेजी से बढ़ता है.

लिवर ट्रांसप्लांटेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया (एलटीएसआई) के सचिव डॉ. चार्ल्स पैनाकल कहते हैं कि चिकित्सकीय दृष्टिकोण से, हम स्पष्ट रूप से एक ऐसा पैटर्न देख रहे हैं जहां जीवनशैली के विकल्प कम उम्र में ही लिवर के स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित कर रहे हैं. एनर्जी ड्रिंक्स, शराब और मीठे पेय पदार्थ इसके मुख्य कारण हैं. लिवर एक लचीला अंग है, लेकिन इन हानिकारक पदार्थों के लगातार संपर्क में रहने से धीरे-धीरे क्षति होती है. फैटी लिवर से लेकर सूजन, फाइब्रोसिस और यहां तक कि सिरोसिस तक.

जागरूकता अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि समय रहते उपचार किए जाने पर प्रारंभिक चरण के लिवर रोग को अक्सर ठीक किया जा सकता है. विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि एनर्जी ड्रिंक्स को सुरक्षित मानने की धारणा को तुरंत बदलने की जरूरत है. ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों के विपरीत, ये पेय पदार्थ केवल अस्थायी उत्तेजना देते हैं जबकि शरीर पर दीर्घकालिक मेटाबॉलिक तनाव डालते हैं. नियमित और अत्यधिक सेवन लक्षणों के प्रकट होने से पहले ही लिवर को चुपचाप नुकसान पहुंचा सकता है.

डॉ. अभिदीप चौधरी ने आगे कहा कि अगर लिवर की रक्षा करती है तो संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और प्रोसेस्ड पेय पदार्थों का सीमित सेवन जैसी सरल आदतें अपनाना जरूरी है. प्रारंभिक जांच और जीवनशैली में सुधार गंभीर लिवर रोग को रोकने में बहुत सहायक हो सकते हैं. माता-पिता, स्कूल और नीति निर्माताओं को भी इन पेय पदार्थों के छिपे खतरों के बारे में युवाओं को शिक्षित करने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. लिवर रोग से युवा आबादी तेजी से प्रभावित हो रही है, इसलिए प्रारंभिक जागरूकता और हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण हैं.





