30,000 फीट की ऊंचाई, 19,958 किलो और 375 PSI का दबाव…, लड़ाकू विमानों के टायरों में हवा क्यों नहीं भरता अमेरिका?


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फाइटर जेट्स के टायरों में हवा क्यों नहीं भरता US? क्या है नाइट्रोजन का सीक्रेट

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USS Abraham Lincoln Fighter Jets-nitrogen Gas Tyres: अमेरिकी नौसेना के सबसे प्रमुख और विशालकाय विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन पर तैनात अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों के टायरों में सामान्य हवा की जगह खास नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल किया जाता है. इसके पीछे गहरा विज्ञान और सुरक्षा के कड़े मानक हैं. जब 44,000 पाउंड के भारी वजन के साथ विमान लैंड करते हैं, तो टायरों पर अकल्पनीय दबाव पड़ता है. नाइट्रोजन गैस टायरों को भीषण आग से बचाने, अंदर की नमी को पूरी तरह से खत्म करने और 375 पीएसआई जैसे अत्यधिक दबाव को स्थिर रखने में सबसे अहम भूमिका निभाती है. इस गैस को -196 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जाता है, जो उड़ान भरने वाले जेट्स के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनता है.

विमानवाहक पोत पर एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमानों की लैंडिंग बेहद जटिल प्रक्रिया है. इन विमानों के लिए लैंडिंग के समय का अधिकतम वजन 19,958 किलो तय किया गया है. जब इतने भारी वजन के साथ कोई जेट सीधे जहाज के डेक पर उतरता है, तो उसके पहियों पर अत्यधिक दबाव और भारी शारीरिक तनाव पैदा होता है. इस भयंकर तनाव को सफलतापूर्वक सहने के लिए यूएसएस अब्राहम लिंकन पर तैनात फाइटर जेट्स संपीड़ित नाइट्रोजन गैस पर निर्भर रहता है. हवा की तुलना में नाइट्रोजन दबाव को स्थिर रखती है.

सैन्य विमानों को भारी ईंधन और हथियारों का पेलोड लेकर उड़ान भरनी होती है. इसके लिए टायरों में अत्यधिक दबाव का होना बिल्कुल अनिवार्य है. विमानवाहक पोत पर तैनात एफ/ए-18 जेट के आगे वाले टायरों में दबाव आश्चर्यजनक रूप से 375 पीएसआई तक रखा जाता है. इतने भारी दबाव को बनाए रखने में नाइट्रोजन के अणु बहुत मददगार साबित होते हैं. ये अणु टायरों से होने वाले प्राकृतिक रिसाव को कम कर देते हैं. इससे लंबी तैनाती के दौरान विमान के टायर पूरी तरह गैस से भरे रहते हैं.

जब भारी लड़ाकू जेट डेक पर उतरता है, तो ब्रेक लगाने से जबरदस्त घर्षण पैदा होता है. इस घर्षण के कारण विमान के पहियों का तापमान 260 डिग्री सेल्सियस के चरम स्तर तक पहुंच जाता है. अगर इतनी गर्मी में टायर फट जाए और उसमें हवा हो, तो वह तुरंत आग पकड़ सकता है. वायुमंडलीय हवा में मौजूद 21 प्रतिशत ऑक्सीजन आग को तेजी से भड़काने वाले एक घातक उत्प्रेरक का काम करती है. इसी खतरे से बचने के लिए टायरों में हवा का प्रयोग नहीं होता है.

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ऑक्सीजन की घातक प्रकृति से निपटने के लिए नौसेना खास नाइट्रोजन गैस का सहारा लेती है. नाइट्रोजन मूल रूप से एक अक्रिय गैस है, जो आग को फैलने से रोकती है. जब टायरों में नाइट्रोजन गैस भरी जाती है, तो यह चिंगारी को पनपने के लिए जरूरी ऑक्सीजन को पूरी तरह से खत्म कर देती है. ऑक्सीजन बिल्कुल न मिलने के कारण चिंगारी तुरंत वहीं दम तोड़ देती है. इस वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से फ्लाइट डेक पर होने वाले जानलेवा अग्निकांड को रोका जाता है.

विमान के टायरों में सामान्य हवा न भरने का एक और बड़ा वैज्ञानिक कारण भी मौजूद है. हवा में पाई जाने वाली 21 प्रतिशत ऑक्सीजन समय के साथ धीरे-धीरे रबर को ऑक्सीकृत करके भारी नुकसान पहुंचाती है. यह प्रक्रिया इतनी खतरनाक है कि ऑक्सीजन पहियों के धातु वाले रिम को अंदर से जंग लगाकर खराब कर देती है. इस लगातार होने वाली रासायनिक गिरावट से टायरों और रिम की मजबूती कम होती है, जिससे लैंडिंग गियर के फेल होने का भारी खतरा बढ़ जाता है.

ऑक्सीजन से होने वाले इस रासायनिक क्षरण को रोकने के लिए लड़ाकू जेट के टायरों में 100 प्रतिशत शुद्ध नाइट्रोजन गैस भरी जाती है. ऑक्सीजन के न होने से यह हानिकारक रासायनिक गिरावट पूरी तरह से रुक जाती है. इससे न केवल नौसेना के महंगे उपकरणों और टायरों का सेवा जीवन काफी लंबा हो जाता है, बल्कि अन्य बड़े लाभ भी मिलते हैं. यह तकनीक विमानों को बार-बार मरम्मत करने के झंझट से पूरी तरह बचाती है, जिससे रखरखाव चक्रों में भारी कमी आती है.

विमानों के टायरों में कंप्रेस्ड गैस का इस्तेमाल होता है, लेकिन विमानवाहक पोत पर इसे गैस के रूप में बिल्कुल स्टोर नहीं किया जाता है. यूएसएस अब्राहम लिंकन अपने खास प्लांट में इसे तरल नाइट्रोजन के रूप में बनाता है. इस तरल गैस को माइनस 196 डिग्री सेल्सियस के बेहद ठंडे तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है. ऐसा मुख्य रूप से इसलिए किया जाता है ताकि जहाज पर सीमित जगह की भारी बचत हो सके. ऑपरेशंस से पहले इसे सावधानीपूर्वक प्रबंधित किया जाता है.

जब विमानों की उड़ान का संचालन शुरू होता है, तो सबसे पहले स्टोर की गई तरल नाइट्रोजन को गैस में बदला जाता है. इसके बाद, इस तैयार गैस को 3,500 पीएसआई की उच्च क्षमता वाली विशेष बोतलों में पंप किया जाता है. इन बोतलों को मोबाइल सर्विसिंग कार्ट पर लादकर विमानों तक तेजी से पहुंचाया जाता है. यह अनूठी प्रणाली विमानन मैकेनिकों को बहुत सुविधा देती है. इसकी मदद से वे सक्रिय फ्लाइट डेक पर ही टायरों में गैस का भारी दबाव आसानी से भरते हैं.

आसमान में 30,000 फीट की ऊंचाई पर मिशन के दौरान विमानों को भयानक ठंड का सामना करना पड़ता है. सामान्य हवा में हमेशा जल वाष्प मौजूद होता है, जो ज्यादा ऊंचाई पर पहुंचकर आसानी से बर्फ बन जाता है. यह बर्फ टायरों के दबाव में अनियंत्रित उतार-चढ़ाव पैदा करती है और नाजुक वाल्व सील को नुकसान पहुंचाती है. इसके विपरीत, शुद्ध नाइट्रोजन गैस में नमी बिल्कुल शून्य होती है. नमी न होने के कारण अत्यधिक ऊंचाई पर भी टायरों का दबाव एकदम स्थिर रहता है.



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