अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी बयानबाजी और पंगे लेने के लिए मशहूर हैं. कई बार तो ऐसा लगता है कि वह देश-दुनिया की सभी नीतियों से ऊपर उठ चुके हैं. वह बीते दिनों वेटिकन से सीधे मोर्चे की नौबत में आ गए, जब ईसाईयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप लियो XIV से भिड़ गए. ईरान के साथ जारी युद्ध और पाकिस्तान में हुई बातचीत के फेल होने पर पोप ने ट्रंप की आलोचना कर दी. अब इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने मोर्चा ही खोल दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से पोप लियो XIV पर किए गए तीखे हमलों ने वाशिंगटन और वेटिकन के बीच एक असामान्य और सीधा टकराव पैदा कर दिया है. ट्रंप ने उन्हें ‘अपराध के मुद्दे पर कमजोर’ और ‘विदेश नीति के लिए भयानक’ करार दिया है. यहां तक कि उन्होंने यह सवाल भी उठा दिया कि उन्हें आखिर पोप क्यों चुना गया? ईरान मुद्दे पर शुरू हुआ विवाद अब ट्रंप के घर यानी अमेरिका में ही गहराता दिख रहा है. इन दोनों नेता और धर्मगुरु की वजह से ईसाईयों के अंदर ही प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक में विवाद गहरा रहा है.
यह विवाद तब और गहरा गया जब ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ईसा मसीह के रूप में अपनी एक एआई जनरेटेड फोटो साझा की, जिसमें वह एक बूढ़े बीमार शख्स के सिर पर हाथ रखकर स्वस्थ करने का चमत्कार करते नजर आ रहे हैं. हालांकि बाद में उन्होंने इसे डिलीट कर दिया, लेकिन वेटिकन ने इसे ‘गहरा अपमानजनक’ बताते हुए सार्वजनिक रूप से कड़ी फटकार लगाई. शिकागो से ताल्लुक रखने वाले पोप लियो ईरान पर अमेरिकी और इजरायली सैन्य ऐक्शन के कड़े आलोचक रहे हैं. उन्होंने युद्ध को ‘पागलपन’ करार दिया है.
ट्रंप-पोप लियो टकराव की शुरुआत कैसे हुई?
इस विवाद की जड़ें ईरान युद्ध पर दोनों नेताओं की बिल्कुल अलग-अलग राय में छिपी हैं. पोप लियो XIV ने लगातार संयम, युद्धविराम और संवाद की अपील की है. उन्होंने युद्ध को बढ़ावा देने वाली ‘सर्वशक्तिमान होने के भ्रम’ के खिलाफ चेतावनी दी और सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के लिए धर्म के इस्तेमाल की आलोचना की.
जैसे-जैसे अमेरिकी हमले तेज हुए, पोप की टिप्पणियां और भी तीखी होती गईं, जिससे ट्रंप भड़क उठे. ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि पोप ‘अपराध पर कमजोर और विदेश नीति के मामले में भयानक’ हैं. उन्होंने यहां तक दावा किया कि लियो को पोप इसलिए चुना गया क्योंकि वे अमेरिकी थे और वेटिकन को लगा कि राष्ट्रपति ट्रंप से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका होगा. ट्रंप ने आगे कहा कि पोप को एक राजनेता के बजाय एक महान पोप बनने पर ध्यान देना चाहिए.
पोप लियो ने भी इस बार कड़ा रवैया अपनाया. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने रुख से पीछे नहीं हटेंगे. पोप ने कहा, ‘मुझे ट्रंप प्रशासन का कोई डर नहीं है. मैं युद्ध के खिलाफ अपनी आवाज उठाना जारी रखूंगा और शांति, संवाद तथा न्यायपूर्ण समाधानों को बढ़ावा दूंगा. आज दुनिया में बहुत से निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं. किसी को तो खड़े होकर कहना होगा कि इससे बेहतर रास्ता भी मौजूद है.’
‘ईशनिंदा’ विवाद और एआई वाली तस्वीर
यह विवाद तब ‘ईशनिंदा’ के आरोपों में बदल गया जब ट्रंप ने खुद को ईसा मसीह के जैसा दिखाने वाली एक तस्वीर साझा की. वेटिकन के साथ-साथ रूढ़िवादी ईसाई हलकों में भी इसकी भारी आलोचना हुई. सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग से लेकर पादरियों की तरफ से ईशनिंदा तक करार दिए जाने पर ट्रंप ने बाद में सफाई देते हुए कहा- वह तस्वीर मुझे एक डॉक्टर के रूप में दिखा रही थी जो लोगों को ठीक कर रहा है. फेक न्यूज ने इसका गलत मतलब निकाला.
क्या यह पिछले विवादों से अलग है?
ऐसा पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने वेटिकन से सीधा मोर्चा लिया हो. इससे पहले साल 2016 में भी इमिग्रेशन के मामले में पोप फ्रांसिस के साथ विवाद हुआ था. उस समय फ्रांसिस ने ट्रंप की तरफ से बॉर्डर पर दीवार बनाए जाने का विरोध किया और इसे क्रिश्चन मूल्यों के खिलाफ बताया था. ट्रंप ने इस टिप्पणी पर पहले तो नाराजगी जताई लेकिन विवाद जल्द ही सुलझ गया तो बाद में पोप की प्रशंसा भी की.
हालांकि मौजूदा विवाद कुछ अलग और गंभीर है. पिछले कई दिनों से जारी यह विवाद सार्वजनिक होने के बाद अब पर्सनल हो गया है. अमेरिका की आलोचना के मामले में पोप लियो तो पोप फ्रांसिस से भी अधिक सख्त रवैया अपना रहे हैं और वो भी खासकर ईरान के साथ जारी मौजूदा जंग की स्थिति को लेकर. ट्रंप अभी तक इस मोर्चे पर पीछे हटने की स्थिति में नजर नहीं आ रहे हैं. उन्होंने पोप लियो की बातों को गलत करार देते हुए माफी मांगने से भी साफ इनकार कर लिया.
कैथोलिक समूह के सर्वोच्च नेता हैं पोप
यह विवाद राजनीति को भी प्रभावित करने वाला साबित होगा. पोप लियो की बात करें तो वह अमेरिकी मूल के पहले पोप बने हैं. अमेरिका के रहने वाले कार्डिनल रॉबर्ट फ्रांसिस प्रीवोस्ट को वेटिकन में सर्वोच्च धर्मगुरू के पद पर पहुंचने के बाद पोप लियो 14वें के नाम से जाना जाता है. वो अब दुनियाभर में मौजूद तकरीबन 140 करोड़ कैथोलिक्स के नेता हैं.
अमेरिकी जनता के साथ उन्हीं की अंग्रेजी में और बिना विदेशी लहजे के बात कर पाने की उनकी क्षमता ने देश के अंदर ही प्रभाव को बढ़ाने का काम किया है. कई सर्वे और न्यूज पोल में पोप को सबसे प्रसिद्ध नैशनल फीगर में जगह भी मिली हुई है.
वहीं दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप की बात करें तो उनकी रेटिंग में बहुत गिरावट दर्ज की गई है. वह राजनीतिक लिहाज से अधिक चैलेंजिंग समय का सामना कर रहे हैं. इसमें भी गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप के समर्थकों के बेस में ही डिबेट शुरू हो गई है. कई समर्थक लॉयल बने हुए हैं तो कई ने आलोचना शुरू कर दी है.
अमेरिका में ईसाई धर्म प्रमुख धर्म है, जिसमें लगभग 45 प्रतिशत आबादी प्रोटेस्टेंट और लगभग 20 से 22 प्रतिशत कैथोलिक हैं. ऐतिहासिक रूप से प्रोटेस्टेंट बहुल देश होने के बावजूद अमेरिका में कैथोलिक एकल सबसे बड़ा संप्रदाय है. प्रोटेस्टेंट्स में इवेंजेलिकल और मेनलाइन समूह शामिल हैं, जबकि कैथोलिकों में हिस्पैनिक ग्रुप सबसे बड़ा है. डोनाल्ड ट्रंप प्रोटेस्टेंट बैकग्राउंड से आते हैं, जबकि कैथोलिक समुदाय पोप के नेतृत्व को स्वीकार करते हैं.
ट्रंप को राजनीतिक जोखिम!
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का ऐसा मानना है कि ट्रंप के लिए यह विवाद जोखिम भरा हो सकता है. 2024 के चुनाव में ट्रंप को 55 प्रतिशत से लेकर 59 प्रतिशत तक कैथोलिक वोट मिले थे. यदि पोप के साथ यह टकराव लंबा खिंचता है, तो कई सारे कैथोलिक मतदाता ट्रंप से छिटक सकते हैं. फिलहाल दोनों में से कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है.
अब आगे क्या होगा?
ट्रंप और पोप के इस मौजूदा विवाद में दोनों में से कोई भी पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है. ट्रंप अपने बयान को लगातार डिफेंड कर रहे हैं और यह साफ कर दिया है कि किसी भी शर्त पर माफी नहीं मांगेंगे. वहीं पोप लियो ने भी कह दिया है कि वह शांति के पक्ष में और युद्ध के खिलाफ बोलते रहेंगे. ईरान में विवाद थमने की बजाय बड़ा रूप लेता दिख रहा है तो ऐसे में ट्रंप बनाम पोप की इस लड़ाई में ब्रेक लगने की संभावना भी धूमिल ही नजर आ रही है.





