Tourist News : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में बस्तर की तर्ज पर अब राज्य सरकार ने होम-स्टे योजना की शुरुआत कर दी है. इस योजना के तहत होम-स्टे निर्माण करने वाले लोगों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जा रही है. पहाड़ी और ग्रामीण आदिवासी इलाकों में बनाए जा रहे ये होम-स्टे पर्यटकों को आदिवासी जीवनशैली से रूबरू कराएंगे.
यहां ठहरने वाले पर्यटक आदिवासियों की पारंपरिक खान-पान, रहन-सहन, खेती-बाड़ी और संस्कृति को नज़दीक से समझ सकेंगे. सरगुजा में बन रहे इन होम-स्टे का निर्माण बिहार के कारीगरों द्वारा किया जा रहा है, जिन्हें मिट्टी के पारंपरिक ढांचे में तैयार किया जा रहा है. होम-स्टे की दीवारों और डिज़ाइन में आदिवासी संस्कृति की झलक साफ देखने को मिलती है. तो किस तरह तैयार किया जा रहा है यह होम-स्टे, इसमें क्या-क्या विशेषताएं हैं और कारीगर किस तकनीक से इसे आकार दे रहे हैं देखिए ग्राउंड रिपोर्ट के साथ कारीगर से बातचीत.
डिजाइन पर सहमति, आदिवासी लुक का फैसला
बिहार के कारीगर अहमद सैफी ने लोकल 18 को बताया कि वह जिस होम-स्टे का निर्माण कर रहे हैं, उसके लिए पहले मालिक से विस्तार से डिजाइन पर चर्चा की गई. मालिक ने अपनी जरूरत और कल्पना साझा की, वहीं अहमद सैफी ने अपने अनुभव के आधार पर कई व्यावहारिक सुझाव दिए. दोनों की सहमति से यह तय हुआ कि होम-स्टे को पूरी तरह आदिवासी लुक में तैयार किया जाएगा.
मिट्टी से ढांचा, खपड़ा स्टाइल में निर्माण
कारीगर ने बताया कि सबसे पहले पूरे एरिया को तैयार कर मिट्टी से घर का ढांचा बनाना शुरू किया गया. यह घर खपड़ा (छप्पर) स्टाइल में बनाया जा रहा है, जिसमें कंडी, मयार और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है. पूरा निर्माण पारंपरिक तरीके से हाथों से किया गया है, जिससे इसकी मजबूती के साथ-साथ सुंदरता भी बनी रहे.
अहमद सैफी ने बताया कि निर्माण में इस्तेमाल की गई लकड़ियों को उन्होंने और उनकी टीम ने खुद छीलकर और तराशकर तैयार किया है. इससे घर को एक खास देसी और पारंपरिक पहचान मिली है. उनका कहना है कि मशीन से बने काम की तुलना में हाथ से किया गया काम ज्यादा टिकाऊ और आकर्षक होता है.
15 से 30 दिन में हो जाता है तैयार
कारीगर ने बताया कि इस तरह का मिट्टी और लकड़ी से बना होम-स्टे लगभग 15–20 दिन से लेकर एक महीने के भीतर पूरी तरह तैयार हो जाता है. घर के अंदर दीवारों पर पूरी तरह मिट्टी की लिपाई-पुताई की गई है और फर्श भी मिट्टी का ही रखा गया है. वहीं बाहर का डिजाइन भी पूरी तरह आदिवासी शैली पर आधारित है.
दीवारों पर आदिवासी संस्कृति की झलक
होम-स्टे की बाहरी दीवारों पर आदिवासी सांस्कृतिक वाद्य यंत्र ‘मादर’ से जुड़ी आकृतियों की पेंटिंग की गई है. हालांकि पेंटिंग का काम किसी अन्य कलाकार ने किया है, लेकिन इसके अलावा पूरा निर्माण कार्य अहमद सैफी और उनकी टीम ने खुद किया है.
खपड़े के नीचे मिट्टी डालने को लेकर पूछे गए सवाल पर अहमद सैफी ने बताया कि खपड़े के नीचे सीधे मिट्टी नहीं डाली जाती. पहले मयार लगाया जाता है और उसके ऊपर मिट्टी डाली जाती है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि खपड़ा मजबूती से अपनी जगह पर टिका रहे और बाहर न गिरे.
पर्यटकों से उम्मीद, आगे और निर्माण की योजना
कारीगर ने कहा कि देखने में यह होम-स्टे उन्हें काफी सुंदर लग रहा है. अब उम्मीद है कि जब पर्यटक यहां आएंगे और इस देसी माहौल को पसंद करेंगे, तो आगे और भी ऐसे पारंपरिक निर्माण किए जा सकेंगे.
अहमद सैफी ने बताया कि वह मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं, लेकिन पिछले 15 वर्षों से यहीं रह रहे हैं. आसपास घूमते-देखते और काम करते हुए उन्होंने यह हुनर सीखा है. वह कारपेंटर का काम भी करते हैं और खुद को एक ऑल-राउंडर बताते हैं. पढ़ाई के बारे में उन्होंने बताया कि वह आठवीं पास हैं.





