शायद दिल्ली और भारत के दूसरे हिस्सों में आम लोगों का गुस्सा इतना ज़बरदस्त नहीं होता, अगर जून में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेताओं पर राम मंदिर को लेकर ‘डकैती’ का आरोप अंदर से ही न लगाया गया होता। इसके चलते बीजेपी कार्यकर्ताओं में अपने उम्मीदवार के लिए ज़ोर-शोर से प्रचार करने का नैतिक साहस नहीं रहा।
आखिर क्यों बांकीपुर चुनाव अलग था?
मध्य प्रदेश के दतिया और गुजरात के मंज़लपुर में हुए उपचुनावों के नतीजों पर मीडिया का ध्यान अपेक्षाकृत कम रहा। हालांकि, दतिया में बीजेपी के एक धड़े ने खुली बग़ावत की थी क्योंकि पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया गया था।
इसके बरअक्स, सबकी नज़रें बांकीपुर पर टिकी थीं, क्योंकि यहां बीजेपी के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा था। पार्टी के मौजूदा प्रमुख अप्रैल में राज्यसभा के लिए चुने जाने से पहले 2006 से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इससे पहले, उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा 1995 से 2005 तक, यानी अपनी मृत्यु तक, यहां के विधायक थे। वहीं दूसरी ओर, दतिया में मौजूदा कांग्रेस विधायक के अयोग्य घोषित होने के बाद चुनाव हुए, जबकि बीजेपी विधायक की मृत्यु के बाद मांजलपुर सीट खाली हुई थी।




