ट्रंप जब चीन में थे, ईरान ने अमेरिका में चुपके से लगाई सेंध, पेट्रोल पंप बने निशाना, पूरे देश को हिलाने की थी साजिश


अमेरिकी राष्ट्रपति जब डोनाल्ड ट्रंप जब चीन का दौरा कर रहे थे. उनके साथ बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ थे उस समय ईरान में पूरे अमेरिका को झटका दिया है. अमेरिकी अधिकारियों ने कई राज्यों में गैस स्टेशनों के फ्यूल स्टोरेज टैंकों की निगरानी करने वाले सिस्टम में सेंधमारी के शक जताया है. इसके पीछे ईरानी हैकर्स का हाथ बताया है. सीएएन की एक रिपोर्ट में बताया है कि हैकर्स ने ऑटोमैटिक टैंक गेज (ATG) सिस्टम का फायदा उठाया. उन्हें निशाना बनाया गया है जिनके पासवर्ड से सुरक्षित नहीं थे.

अमेरिका में आखिर हुआ क्या है?

अमेरिकी अधिकारियों को शक है कि ईरान के हैकर्स ने कई राज्यों में गैस स्टेशनों के ‘ऑटोमैटिक टैंक गेज’ (ATG) सिस्टम में सेंध लगाई है. हैकर्स ने उन सिस्टम का फायदा उठाया जो ऑनलाइन थीं और पासवर्ड से सुरक्षित नहीं थे. उन्होंने टैंकों के ईंधन के साथ कोई बदलाव नहीं किया है. केवल डिस्प्ले रीडिंग के साथ छेड़छाड़ की. हालांकि इससे फ्यूल को कोई नुकसान नहीं हुआ है.

अमेरिका का क्या नुकसान हो सकता है?

इसे लेकर एक्सपर्ट्स का मानना है कि एटीजी तक पहुंच होने से हैकर्स गैस रिसाव का पता चलने से रोक सकते हैं. सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है. फोरेंसिक सबूतों की कमी के कारण इसके जिम्मेदार तत्वों का निश्चित पता लगाना मुश्किल हो रहा है.

अमेरिका के लिए क्यों है चिंता?

यदि इस हैकिंग में ईरान का हाथ साबित होता है, तो यह मौजूदा अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी बुनियादी ढांचे को डराने का नया मामला होगा. यह मामला ट्रंप प्रशासन को भी चिंता में डालने वाला है. यह युद्ध के कारण बढ़ी हुई गैस की कीमतों पर जनता का ध्यान खींचेगा. पहले से ही अमेरिकी नागरिकों के बजट को प्रभावित कर रही है. यह हमला उन बुनियादी ढांचा ऑपरेटरों के लिए भी चेतावनी है जो सिस्टम को सुरक्षित नहीं कर पाए हैं.

कैसे ईरानी हैक्सर्स बना रहे हैं सिस्टम को निशाना?

ईरानी हैकिंग समूह अक्सर ऑनलाइन मौजूद कमजोर और असुरक्षित सिस्टम को अपना निशाना बनाते हैं. युद्ध की शुरुआत के बाद से तेहरान से जुड़े हैकर्स ने अमेरिकी तेल, गैस और वॉटर साइटों में बाधाएं डाली हैं. इससे मेडिकल टूल बनाने वाली कंपनी ‘स्ट्राइकर’ की शिपिंग में देरी की है. एफबीआई निदेशक काश पटेल के पुराने निजी ईमेल लीक किए हैं. इसके साथ ही उन्होंने इजरायली संगठनों और नागरिकों को भी बड़े पैमाने पर निशाना बनाया है.

काश पटेल का ईमेल हो चुका है हैक?

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले 18 महीनों में ईरान की साइबर गतिविधियां अधिक आक्रामक और एआई बेस्ड हुई हैं. इसमें डेटा लीक करने के साथ-साथ साइकोलॉजिकल दबाव भी शामिल हैं. ‘हंडाला’ नाम के समूह ने एफबीआई के अभेद्य सिस्टम को हैक करने का दावा किया था. इसके कोई सबूत नहीं मिल पाए थे. उन्होंने  काश पटेल के सालों पुराने जीमेल अकाउंट में सेंध लगाई थी.

क्या अमेरिकी चुनावों पर हो सकता है असर?

अमेरिकी अधिकारियों को डर है कि ईरान की यह आक्रामक साइबर नीति आने वाले मध्यावधि चुनावों को प्रभावित कर सकती है. अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान इससे पहले 2020 और 2024 के अमेरिकी चुनावों में भी दखल देने की कोशिश कर चुका है. इस बार अमेरिकी अधिकारियों ने चुनावों को विदेशी खतरों से बचाने के लिए अभी तक अपनी विशेष टीम को सक्रिय नहीं किया है. इसे विशेषज्ञ एक बड़ी चूक मान रहे हैं.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि ईरान चुनाव प्रणालियों पर सीधे हमले करने के बजाय एआई की मदद से बड़े पैमाने पर फर्जी सूचनाएं फैलाने का रास्ता चुन सकता है. यह ईरान के लिए सस्ता और आसान है.



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