वॉशिंगटन: जंग के मैदान में कौन ‘हीरो’ बनेगा और कौन ‘विलेन’, ये सब हथियारों से ज्यादा प्रोपेगेंडा और नैरेटिव के दम पर तय होता है और इस खेल में अमेरिका हमेशा से नंबर-1 रहा है. ईरान जंग दुनिया के इस सबसे ताकतवर देश ने एक और खाड़ी मुल्क को अपना शिकार बनाया था. वो जंग झूठ और प्रोपेगेंडा के दम पर लड़ी गई थी. अमेरिका ने अपनी जनता और दुनिया का समर्थन पाने के लिए एक 15 साल की लड़की का इस्तेमाल किया, जिसने कैमरे के सामने फूट-फूटकर रोते हुए ऐसा झूठ बोला कि पूरी दुनिया का खून खौल उठा. जब तक सच सामने आया, तब तक अमेरिका एक देश पर कब्जा कर चुका था.
US ने तैयार किया झूठा प्रोपेगेंडा
बात 10 अक्टूबर 1990 की है, जब अमेरिकी कांग्रेस के सामने एक 15 साल की कुवैती लड़की पेश हुई, जिसका नाम बताया गया ‘नायरा’. उसने रोते हुए जो कहानी सुनाई, उसने अमेरिकी सांसदों की आंखों में आंसू ला दिए.
पूरी दुनिया के कैमरे उस पर टिके थे. नायरा ने सिसकते हुए बताया कि उसने कुवैत के अल-अदान अस्पताल में वो नर्स के तौर पर काम करती है. इस अस्पताल में उसने अपनी आंखों से इराकी सैनिकों की दरिंदगी देखी है. उसने दावा किया कि इराकी सैनिक वार्ड में घुसे, उन्होंने समय से पहले जन्मे बच्चों को इनक्यूबेटर्स से बाहर निकाला और उन्हें ‘ठंडे फर्श पर मरने के लिए छोड़ दिया’.
US आर्मी ने खाड़ी देश को बना दिया खंडहर
ये कहानी इतनी वीभत्स थी कि इसने रातों-रात सद्दाम हुसैन और इराकी आर्मी को एक ‘हैवान’ घोषित कर दिया गया. आम अमेरिकी नागरिक, जो पहले खाड़ी युद्ध में शामिल होने के खिलाफ थे, अब बदला लेने की मांग करने लगे. उस वक्त के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इस कहानी का इस्तेमाल कम से कम 10 बार अपने भाषणों में किया. नतीजा ये हुआ कि अमेरिका को इराक पर हमला करने का वो नैतिक आधार मिल गया, जिसकी उसे सख्त जरूरत थी.
बस फिर क्या था, अमेरिकियों ने इराक पर मौत बरसा दी. सद्दाम हुसैन को चूहों तरह पकड़ा और मौत की सजा देदी. जंग खत्म हुई, इराक खंडहर बन गया, लेकिन जब सच की परतों को उधेड़ा गया, तो दुनिया सन्न रह गई. जांच में पता चला कि ‘नायरा’ कोई साधारण कुवैती लड़की या अस्पताल की वॉलंटियर नर्स नहीं थी. वो अमेरिका में कुवैत के राजदूत ‘सऊद नासिर अल-सबाह’ की बेटी थी.
सच सामने आया तो फटी रह गईं आखें
हैरानी की बात यह थी कि उसने कभी अस्पताल में कदम तक नहीं रखा था. उसे यह ‘परफॉर्मेंस’ देने के लिए अमेरिका की एक बड़ी पब्लिक रिलेशंस फर्म ‘हिल एंड नोल्टन’ ने तैयार किया था. इस फर्म को कुवैती सरकार ने करोड़ों डॉलर दिए थे ताकि वो अमेरिका में युद्ध के पक्ष में जनमत तैयार कर सकें. नायरा को बाकायदा एक्टिंग और बोलने की ट्रेनिंग दी गई थी ताकि उसके आंसू असली लगें. एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने भी बाद में माना कि ऐसी कोई घटना कभी हुई ही नहीं थी.
अमेरिका इस प्रोपेगेंडा के दम पर हीरो तो बन गया, लेकिन इसकी कीमत इराक के मासूम नागरिकों ने चुकाई. ऑपरेशन ‘डेजर्ट स्टॉर्म’ के दौरान हुई भीषण बमबारी में डेढ़ लाख से ज्यादा लोग मारे गए. इराक का इंफ्रास्ट्रक्चर मिट्टी में मिल गया और वहां की अर्थव्यवस्था दशकों पीछे चली गई. 1991 की यह छोटी सी जंग खत्म होने के बजाय दशकों तक खिंचती गई. 2003 में बुश के बेटे ने एक और झूठ बोलकर इराक पर दोबारा हमला किया. ये झूठ परमाणु हथियारों का दावा था.
‘नायरा’ तक खत्म नहीं हुआ किस्सा
आज के दौर में जब हम सोशल मीडिया और डिजिटल युद्ध के बीच जी रहे हैं, ‘नायरा’ की कहानी एक बड़ी चेतावनी है. ये हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी जो अमेरिका जैसे देश स्क्रीम पर दिखाने की कोशिश करते हैं वो हकीकत नहीं बल्कि किसी बड़ी पावर द्वारा तैयार किया गया ‘प्लांटेड ड्रामा’ होता है. इराक की दुर्दशा इस बात का सबूत है कि सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई में सबसे पहले ‘सच’ की हत्या की जाती है.
अमेरिका ने उस दिन सिर्फ इराक को नहीं, बल्कि दुनिया के भरोसे को भी चकनाचूर कर दिया था. आज भी खाड़ी देशों में जो अस्थिरता है, उसकी जड़ें कहीं न कहीं इन्हीं पुराने प्रोपेगेंडा और झूठ की जमीन पर टिकी हैं.





