वो इकलौता देश जिस पर अमेरिका ने कभी नहीं किया अटैक, 34 US सैनिकों की मौत का आज तक नहीं लिया गया बदला


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इतिहास के पन्नों में USS Liberty की कहानी एक ऐसी अनसुलझी पहेली है जो आज भी दुनिया को हैरान कर देती है. 8 जून 1967 को भूमध्य सागर में अमेरिका के इस जासूसी जहाज पर एक देश ने अचानक भीषण हवाई और टॉरपीडो हमला कर दिया था, जिसमें 34 अमेरिकी सैनिक मारे गए और 170 से ज्यादा घायल हुए. चौंकाने वाली बात ये है कि दुनिया भर में अपनी धाक जमाने वाला सुपरपावर अमेरिका, जिसने परमाणु बम तक का इस्तेमाल किया है, उसने इस हमले के बदले में एक गोली तक नहीं चलाई यहां तक की अटैक की फाइलें तक बंद कर दीं.

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US सैनिकों की जान जाने के बाद अमेरिका ने कभी नहीं किया इस देश पर अटैक

वॉशिंगटन: जियो पॉलिटिक्स में कई ऐसी कहानियां दबी हैं, जिसमें दिमाग घुमा देने वाली राजनीति और कूटनीति देखने को मिली है. ऐसा ही एक किस्सा USS लिबर्टी से जुड़ा है. जरा सोचिए, एक तरफ अमेरिका जैसा सुपरपावर है, दूसरी तरफ एक ऐसा देश जिसने अमेरिका के 34 जांबाज सैनिक सरेआम मौत के घाट उतार दिए गए. इस अटैक के बदले में सुपरपावर US की तरफ से एक गोली तक नहीं चली. ये वही अमेरिका था जिसने अपने सैनिकों पर आंच आने पर न्यूक्लियर बम तक गिरा दिया था. आखिर उस खास देश के सामने अमेरिका की ऐसी क्या मजबूरी थी? इस रहस्यमयी चुप्पी ने दशकों से पूरी दुनिया को सोच में डाल रखा है.

जब US सैनिकों के खून से लाल हुआ समंदर

8 जून 1967 की वो तारीख आज भी अमेरिकी नौसेना के इतिहास का काला दिन मानी जाती है. भूमध्य सागर के नीले पानी में अमेरिका का जासूसी जहाज, USS लिबर्टी, अपनी ड्यूटी पर तैनात था. सब कुछ शांत था लेकिन दोपहर के वक्त अचानक आसमान में इजरायली फाइटर जेट्स की गूंज सुनाई दी. किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल मौत बरसने वाली है. उन विमानों ने बिना किसी चेतावनी के अमेरिकी जहाज पर गोलियां और नेपाम बम बरसाने शुरू कर दिए. जहाज पर मौजूद अमेरिकी झंडा साफ लहरा रहा था, फिर भी हमला नहीं रुका.

टॉरपीडो अटैक और US सैनिकों की चीख-पुकार

हवाई हमले के बाद इजरायली टॉरपीडो जहाजों ने मोर्चा संभाला. एक के बाद एक धमाकों से जहाज दहल उठा. एक विशालकाय टॉरपीडो सीधे जहाज के बीचों-बीच जा लगा, जिससे एक बड़ा छेद हो गया और पानी अंदर भरने लगा. इस खौफनाक हमले में 34 अमेरिकी सैनिकों ने अपनी जान गंवा दी और 170 से ज्यादा बुरी तरह घायल हो गए. आलम यह था कि मदद के लिए भेजे जाने वाले सिग्नल तक जाम कर दिए गए थे.

इजरायल का दावा: ‘हमसे गलती हो गई’

जब धुंआ छंटा और दुनिया के सामने सच आया तो पता चला कि हमलावर कोई दुश्मन देश नहीं, बल्कि अमेरिका का सबसे खास दोस्त इजरायल निकला. इजरायल ने तुरंत सफाई दी कि यह ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ का मामला था. उनका कहना था कि उन्होंने गलती से लिबर्टी को मिस्र का जहाज समझ लिया था लेकिन जहाज पर मौजूद चश्मदीदों की कहानी कुछ और ही बयां करती है. उनका कहना था कि हमलावरों ने इतनी करीब से उड़ान भरी थी कि वे पायलटों के चेहरे तक देख सकते थे, फिर उन्हें अमेरिकी झंडा क्यों नहीं दिखा?

अमेरिका की मजबूरी?

हैरानी की बात ये है कि वियतनाम युद्ध जैसे मोर्चों पर आक्रामक रहने वाला अमेरिका इस मुद्दे पर बिल्कुल नर्म पड़ गया. तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने इजरायल की माफी स्वीकार कर ली और मामले को रफा-दफा कर दिया गया. किसी भी अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. आज भी लोग सवाल पूछते हैं कि क्या इजरायल के पास कोई ऐसा राज था जिसे छिपाने के लिए अमेरिका ने अपने ही सैनिकों की मौत पर पर्दा डाल दिया?

आज भी अधूरा है इंसाफ

दशकों बीत चुके हैं लेकिन USS लिबर्टी के सर्वाइवर्स आज भी इंसाफ मांग रहे हैं. उनके लिए ये सिर्फ एक सैन्य हादसा नहीं, बल्कि पीठ में छुरा घोंपने जैसा था. आधिकारिक तौर पर फाइलें बंद हो चुकी हैं लेकिन समंदर की लहरों में दफन वो चीखें आज भी पूछती हैं कि आखिर उस दिन सच में क्या हुआ था? क्या वाकई अमेरिका अपने इस दोस्त से इतना डरता था कि उसने बदला लेने के बजाय चुप रहना ही बेहतर समझा?

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Utkarsha Srivastava

Utkarsha Srivastava is seasoned digital journalist specializing in geo-politics issues, currently writing for World section of News18 Hindi. With over a decade of extensive experience in hindi digital media, sh…और पढ़ें





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