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डोनाल्ड ट्रंप ने अनजाने में ही यह स्वीकार कर लिया कि पाकिस्तान की विदेश नीति अब भी पूरी तरह अमेरिकी इशारों पर निर्भर है. एक तरफ ट्रंप पाकिस्तान की तारीफ करते दिखे, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने यह भी जता दिया कि अंतिम फैसले की ताकत केवल वॉशिंगटन के पास है.
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उसने पाकिस्तान का अनुरोध मानकर उसपर एहसान किया.
नई दिल्ली. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बयान में पाकिस्तान की उस तथाकथित ‘मध्यस्थ’ छवि की परतें उधेड़ दीं, जिसके सहारे इस्लामाबाद खुद को पश्चिम एशिया में शांति दूत साबित करने की कोशिश करता रहा है. एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान के अनुरोध पर उन्होंने ईरान के खिलाफ आगे की सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला लिया.
ट्रंप की भाषा में बार-बार ‘फेवर’, ‘एहसान’ और ‘कृपा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल इस बात का संकेत था कि वॉशिंगटन की नजर में पाकिस्तान कोई बराबरी का साझेदार नहीं, बल्कि मदद मांगने वाला देश है. ट्रंप ने कहा कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आग्रह पर उन्होंने ईरान के साथ संघर्ष विराम पर सहमति दी और फारस की खाड़ी में आगे बमबारी से इनकार किया.
ट्रंप के इस बयान ने पाकिस्तान के उस नैरेटिव को बड़ा झटका दिया है, जिसमें वह खुद को ‘ईमानदार मध्यस्थ’ और ‘क्षेत्रीय स्थिरता का केंद्र’ बताने की कोशिश कर रहा था. अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्दों से साफ हो गया कि पर्दे के पीछे पाकिस्तान लगातार अमेरिका से ‘राहत’ और ‘सुरक्षा गारंटी’ मांग रहा था.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के उस नकाब को उतार दिया है जिसके बूते वो दावा करता है कि वो सुघड़ मध्यस्थ की भूमिका पूरी ईमानदारी से निभा रहा है. एयरफोर्स वन में पत्रकारों की ओर से पूछे गए सवाल पर खरी बात ट्रंप ने कही. ट्रंप ने पत्रकारों के ईरान संघर्ष विराम को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए बार-बार कुछ खास शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने ‘एहसान’, ‘किसी पर कृपा करने की शर्तें’ और ‘पाकिस्तान पर उपकार’ करने की बात स्वीकारी.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो कहा उससे साफ होता है कि वो एक ओर पाकिस्तान के कायल होते हैं उसकी तारीफ करते हैं तो दूसरी ओर बिना कहे अपनी नजरों में उसकी स्थिति का खुलासा करते हैं. ट्रंप ने कहा, “मैं किसी पर उपकार करने में विश्वास नहीं करता. मानता हूं कि फेवर के बदले लोग फेवर (एहसान के बदले एहसान) की ही इच्छा रखते हैं. लेकिन पाकिस्तान की ओर से मुझसे अनुरोध किया गया तो मैंने ये ‘एहसान’ कर दिया. फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आग्रह पर ईरान के साथ सीजफायर पर सहमति जताई और फारस की खाड़ी में स्थित इस देश पर किसी भी तरह की और बमबारी से इनकार किया.”
अमेरिका के राष्ट्रपति के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया ताकि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक भूमिका को मान्यता मिल सके. उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी. वो बोले, “ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की इजाजत नहीं देंगे और तेहरान को यूरेनियम को छोड़ देना चाहिए. उन्होंने ईरान के शांति प्रस्ताव को पहला वाक्य पढ़ते ही खारिज कर दिया क्योंकि तेहरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के संबंध में पर्याप्त गारंटी नहीं दी थी.”
हफ्ता भर भी नहीं बीता जब लगातार दूसरी बार अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने के पाकिस्तान के दावों की पोल खुल रही है. हाल ही अमेरिकी मीडिया की ओर से दावा किया गया कि पाकिस्तान चुपके से ईरानी सैन्य विमानों को अपने नूर खान एयरबेस पर पनाह दे रहा था, हालांकि इसका पाकिस्तान की ओर से खंडन भी किया गया. अमेरिकी मीडिया ने विश्वस्त सूत्रों के आधार पर दावा किया कि इस्लामाबाद शांति का ढोंग कर रहा है.
हाल ही में ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी कहा था कि पाकिस्तान में हुई कुछ विदेशी बैठकों का ईरान से कोई लेना-देना नहीं है. आखिर पाकिस्तान ऐसा कर क्यों रहा है? इसका सीधा जवाब उसकी चरमराती अर्थव्यवस्था है. पाकिस्तान अपनी गिरती साख और अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में लगा है. वो खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की एक कूटनीतिक मजबूरी के तहत ऐसा कर रहा है. दुनिया जानती है कि वो आतंकवाद को पनाह देने वाला है, गंभीर आर्थिक संकट और दिवालिएपन से गुजर रहा है, और ऐसी स्थिति में ऐसे दिखावे वाले कदम से खुद को बचा सकता है. अपने आर्थिक हालात को कुछ हद तक दूसरों के एहसान पर बेहतर करने की कोशिश कर सकता है.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें





