न खुदा मिला न विसाल-ए-सनम: ईरान में बुरी तरह फंसे ट्रंप, तेल की कीमतों ने छुड़ाए पसीने, अब सत्ता जाने का डर!


वाशिंगटन/तेहरान: ईरान के साथ युद्ध शुरू हुए दो महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस मकसद के साथ यह सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, वह अब भी कोसों दूर नजर आ रहा है. न तो अमेरिका को कोई निर्णायक सैन्य जीत मिली है और न ही ईरान कूटनीतिक रूप से झुकने को तैयार है. हालात ऐसे बन गए हैं कि यह गतिरोध अनिश्चित काल तक खिंच सकता है. यह स्थिति न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मुसीबत बनती जा रही है. ट्रंप के लिए अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान के साथ यह टकराव उनकी विरासत को दागदार न कर दे.

दोनों पक्ष इस समय अपनी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं. ट्रंप और ईरानी नेतृत्व दोनों को ही लग रहा है कि उनका पलड़ा भारी है. ईरान ने बातचीत शुरू करने के लिए एक नया प्रस्ताव भेजा था. लेकिन ट्रंप ने शुक्रवार को इसे सिरे से खारिज कर दिया. इसके बाद गतिरोध खत्म होने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह अनसुलझा संघर्ष बेहद डरावना साबित हो सकता है. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे आम जनता में गुस्सा बढ़ रहा है.

क्या ट्रंप के सभी सैन्य लक्ष्य पूरी तरह फेल हो गए हैं?

ट्रंप प्रशासन ने जब ईरान पर हमला किया था, तो उनके लक्ष्य बहुत बड़े थे. वे ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहते थे और उसके परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते थे. अमेरिकी और इजरायली हमलों ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी नुकसान जरूर पहुंचाया है. लेकिन ट्रंप के मुख्य उद्देश्य अभी भी अधूरे हैं. न तो वहां की सरकार बदली और न ही ईरान ने अपने परमाणु हथियारों की राह छोड़ी है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है, इस गतिरोध के और गहराने का डर बढ़ता जा रहा है.

1. तेल की बढ़ती कीमतों ने ट्रंप की नींद क्यों उड़ा दी है?

ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद कर रखा है. दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है. इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति को बड़ा झटका लगा है.

शुक्रवार को जब ईरानी समाचार एजेंसी इरना (IRNA) ने संशोधित प्रस्ताव की खबर दी, तो तेल की कीमतों में थोड़ी गिरावट आई थी. लेकिन ट्रंप ने जैसे ही कहा कि वे इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हैं, बाजार में फिर से बेचैनी फैल गई.

तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर अमेरिकी नागरिकों की जेब पर असर डाल रही हैं.

अमेरिका में नवंबर में मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं. इतिहास गवाह है कि जब भी तेल की कीमतें बढ़ती हैं, सत्ताधारी दल को नुकसान होता है. ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 34 प्रतिशत पर आ गई है, जो उनके कार्यकाल का सबसे निचला स्तर है.

पेट्रोल की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन के पार जा चुकी हैं. अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बचाना मुश्किल हो जाएगा. व्हाइट हाउस भले ही कह रहा हो कि ट्रंप के पास पूरा समय है, लेकिन हकीकत में घड़ी उनके खिलाफ चल रही है.

न ईरान झुका न एटम बम रुका; अब दांव पर लगी ट्रंप की साख! (File Photo : Reuters)

अमेरिका पर ईरान युद्ध का असर

सेक्टर कितना असर अभी क्या हाल है?
तेल की कीमतें बहुत ज्यादा इजाफा 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने का अंदेशा
शिपिंग रूट होर्मुज बंद वैश्विक सप्लाई चेन में भारी देरी
शेयर बाजार अस्थिरता ऊर्जा कंपनियों के शेयरों में उछाल, बाकी में गिरावट
अमेरिकी घरेलू बाजार महंगाई पेट्रोल की कीमतें ऐतिहासिक स्तर पर

2. क्या ईरान पहले से ज्यादा ताकतवर होकर उभरा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध ने ईरान को अपनी ताकत का एहसास करा दिया है. भले ही उसकी सैन्य शक्ति कमजोर हुई हो, लेकिन उसके पास ‘तेल का हथियार’ है.

  • सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के विश्लेषकों का कहना है कि ईरान ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह जब चाहे होर्मुज की जलधारा को रोक सकता है.
  • यह एक ऐसा हथियार है जो युद्ध खत्म होने के बाद भी ईरान के पास रहेगा. इस वजह से ईरान भविष्य में और भी ज्यादा आक्रामक और आत्मविश्वासी हो सकता है.
  • दूसरी ओर, ट्रंप ने वादा किया था कि वे अमेरिका को विदेशी युद्धों में नहीं फंसाएंगे. लेकिन 28 फरवरी को ईरान पर हमला करके उन्होंने खुद को एक अंतहीन संघर्ष में डाल लिया है.
  • पिछले साल जून में हुए हमलों के बाद भी ईरान के पास उच्च संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) का भंडार सुरक्षित माना जा रहा है. ईरान का कहना है कि उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन का अधिकार है.

ट्रंप की टीम भले ही दावा करे कि उन्होंने सभी सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.

3. क्या मिडिल ईस्ट में फिर से शुरू होगी भीषण बमबारी?

सफेद घर (White House) के सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप अब ईरान की पूरी तरह से नौसैनिक घेराबंदी करने पर विचार कर रहे हैं. इसका मकसद ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह ठप करना है ताकि वह परमाणु समझौते के लिए मजबूर हो जाए. लेकिन यह रणनीति जोखिम भरी है.

साथ ही ट्रंप ने फिर से सैन्य कार्रवाई शुरू करने के विकल्प भी खुले रखे हैं. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ‘शॉर्ट और पावरफुल’ हमलों की योजना तैयार कर ली है. इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने की योजना भी शामिल है ताकि शिपिंग फिर से शुरू हो सके.

यूरोपीय देशों के साथ भी ट्रंप के रिश्ते बिगड़ चुके हैं. यूरोपीय राजनयिकों का मानना है कि यह संघर्ष जल्द खत्म होने वाला नहीं है. नाटो सहयोगियों ने इस जंग में अमेरिका का साथ देने के लिए अपनी नौसेना नहीं भेजी, जिससे ट्रंप काफी नाराज हैं.

ईरान में भी अब कट्टरपंथी नेतृत्व और ज्यादा मजबूत हो गया है, जो अमेरिका के प्रति और भी सख्त रुख अपनाए हुए है.

आसमान छूती तेल की कीमतों ने ट्रंप के छुड़ाए पसीने! (File Photo : Reuters)

4. क्या ट्रंप एक ‘फ्लॉड डील’ के जरिए बाहर निकलना चाहते हैं?

जब कोई युद्ध योजना के मुताबिक नहीं चलता, तो नेता अक्सर सम्मानजनक निकास की तलाश करते हैं. खबर है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस बात का अध्ययन कर रही हैं कि अगर ट्रंप एकतरफा जीत की घोषणा कर दें और पीछे हट जाएं, तो ईरान की क्या प्रतिक्रिया होगी.

  • जानकारों का कहना है कि तेहरान इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में देखेगा. उन्होंने अमेरिकी हमले को झेल लिया और सत्ता में बने रहे, यह उनके लिए बड़ी बात होगी.
  • खाड़ी देशों और यूरोपीय मित्रों को डर है कि ट्रंप अंत में किसी कमजोर या त्रुटिपूर्ण समझौते (Flawed Deal) पर हस्ताक्षर कर सकते हैं. ऐसा समझौता ईरान को भविष्य में फिर से खतरा बनने का मौका दे सकता है.

रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने हालांकि इसे दलदल (Quagmire) मानने से इनकार किया है, लेकिन 4 से 6 हफ्ते में खत्म होने वाला युद्ध अब महीनों तक खिंचता दिख रहा है.

ईरान इस समय ‘वेट एंड वॉच’ की पॉलिसी अपना रहा है. उसे पता है कि ट्रंप घरेलू मोर्चे पर कमजोर पड़ रहे हैं और वे जल्द ही किसी न किसी तरह का समझौता करने के लिए मजबूर होंगे.

5. क्या यह एक ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ की शुरुआत है?

अगर बातचीत ऐसे ही बेनतीजा रही, तो यह जंग एक ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ में बदल सकती है. इसका मतलब है कि न तो पूरी तरह युद्ध होगा और न ही पूरी तरह शांति. ऐसी स्थिति में ट्रंप मिडिल ईस्ट से अपनी सेनाएं कभी कम नहीं कर पाएंगे. अमेरिका को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है.

न केवल आर्थिक रूप से बल्कि रणनीतिक रूप से भी अमेरिका अलग-थलग पड़ता जा रहा है. ईरान की जनता ने भी ट्रंप की उस अपील पर ध्यान नहीं दिया जिसमें उन्होंने सरकार उखाड़ फेंकने की बात कही थी.

अब सवाल यह है कि ईरान की अर्थव्यवस्था कब तक इस दबाव को झेल पाएगी? तेहरान समय काट रहा है और उसे उम्मीद है कि अमेरिकी चुनाव ट्रंप के लिए मुश्किलें पैदा करेंगे. लेकिन ईरान के लिए भी आर्थिक तबाही से बचना एक बड़ी चुनौती है.

कुल मिलाकर, ट्रंप एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां उनके सामने ‘न खुदा मिला न विसाल-ए-सनम’ वाली स्थिति है. उन्होंने जो युद्ध शुरू किया था, वह अब उनके अपने राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है.

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युग में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि बाजारों और बैलेट बॉक्स पर भी लड़े जाते हैं. ट्रंप के लिए ईरान की यह चुनौती अब उनके करियर की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. अगर वे जल्द ही कोई ठोस समाधान नहीं ढूंढ पाए, तो हो सकता है कि उन्हें इसकी कीमत व्हाइट हाउस की कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़े.



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