अगर दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना का फैसला सिर्फ जहाजों की संख्या से होता, तो चीन आज पहले स्थान पर होता. उसके पास 405 सक्रिय युद्धपोत हैं, जबकि अमेरिका के पास 232. इसके बावजूद World Directory of Modern Military Warships (WDMMA) Naval Power Ranking 2026 में अमेरिका पहले और चीन दूसरे स्थान पर है. सवाल यह है कि आखिर कम जहाज होने के बाद भी अमेरिका नंबर-1 कैसे बना? WDMMA की रैंकिंग का पूरा गणित यही समझाता है.
जहाजों की संख्या में चीन सबसे आगे
WDMMA के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक चीन की People’s Liberation Army Navy (PLAN) के पास कुल 405 सक्रिय युद्धपोत (Fleet Units) हैं. दूसरी ओर United States Navy (USN) के पास 232 सक्रिय युद्धपोत हैं.
हालांकि WDMMA साफ कहता है कि उसकी रैंकिंग केवल जहाजों की संख्या के आधार पर तय नहीं होती. हर नौसेना की ताकत, कमजोरियां और विभिन्न श्रेणियों के युद्धपोतों का संतुलन भी इसमें शामिल किया जाता है.
फिर भी अमेरिका क्यों बना नंबर-1?
WDMMA ने अमेरिका को 323.9 TrueValue Rating (TvR) के साथ दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना माना है. चीन का TvR 319.8 है। यही वजह है कि अमेरिका पहले और चीन दूसरे स्थान पर है.
WDMMA के अनुसार अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसका परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ा है. पुराने Nimitz-class विमानवाहक पोतों की जगह धीरे-धीरे नए Ford-class सुपरकैरियर शामिल किए जा रहे हैं.
इसके अलावा अमेरिकी नौसेना में बड़ी संख्या में Destroyers और Submarines हैं. WDMMA के मुताबिक डेस्ट्रॉयर बेड़ा कुल ताकत का लगभग 30 प्रतिशत और पनडुब्बियां करीब एक चौथाई हिस्सा बनाती हैं. इनके अलावा क्रूजर, लिटोरल कॉम्बैट शिप (Corvette श्रेणी), Amphibious Assault Ship, OPV और Mine Warfare जहाज भी अमेरिकी नौसेना को कई तरह के सैन्य अभियानों के लिए तैयार रखते हैं.
चीन की ताकत क्या है?
WDMMA के मुताबिक चीन ने पिछले कुछ दशकों में अपनी नौसेना का तेजी से विस्तार किया है. उसके बेड़े में आधुनिक Aircraft Carrier, Submarines, Destroyers, Frigates, Corvettes और Amphibious Assault जहाज शामिल हैं.
चीन के पास दो विमानवाहक पोत हैं और भविष्य में दो स्वदेशी विमानवाहक पोत भी शामिल होने वाले हैं. उसकी पनडुब्बियों की संख्या 70 से अधिक बताई गई है. इसके अलावा आधुनिक डेस्ट्रॉयर, 40 से ज्यादा फ्रिगेट और लगभग 70 कॉर्वेट उसके बेड़े का हिस्सा हैं.
WDMMA का कहना है कि चीन हर साल लगभग ब्रिटेन की पूरी रॉयल नेवी के बराबर नौसैनिक क्षमता जोड़ रहा है और उसका लक्ष्य भविष्य में अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना बनना है.
दोनों देशों के जहाजों की बनावट भी अलग
अमेरिका के 232 जहाजों में सबसे बड़ा हिस्सा Destroyers और Submarines का है. इसके अलावा उसके पास 11 Aircraft Carriers, 68 Submarines, 119 Fleet Core Ships और 34 Amphibious Assault Ships हैं. WDMMA के अनुसार अमेरिकी नौसेना का Force Balance “Good” है, यानी उसके पास लगभग सभी महत्वपूर्ण श्रेणियों में संतुलित क्षमता मौजूद है.
वहीं चीन के 405 जहाजों में बड़ी संख्या Offshore Patrol Vessels (OPVs), Frigates, Corvettes और Destroyers की है. उसके पास 3 Aircraft Carriers, 73 Submarines, 316 Fleet Core Ships और 13 Amphibious Assault Ships हैं. WDMMA ने चीन के Force Balance को भी “Good” माना है.
जहाजों की उम्र में भी बड़ा अंतर
WDMMA के अनुसार अमेरिकी नौसेना के जहाजों की औसत उम्र 31.1 वर्ष है, जबकि चीन के जहाजों की औसत उम्र 19.2 वर्ष है. यानी चीन का बेड़ा अपेक्षाकृत नया है.
आने वाले वर्षों में और बढ़ेगी ताकत
WDMMA के मुताबिक अमेरिका के 65 से अधिक युद्धपोत निर्माणाधीन या ऑर्डर पर हैं. इनमें नए Destroyers, Submarines, Aircraft Carriers, Frigates और Amphibious Assault Ships शामिल हैं. इसका उद्देश्य चीन की तेजी से बढ़ती नौसैनिक ताकत के बराबर बने रहना है.
दूसरी ओर चीन के 24 युद्धपोत निर्माणाधीन हैं. इनमें Aircraft Carriers, Submarines, Destroyers और Landing Helicopter Dock (LHD) श्रेणी के जहाज शामिल हैं.
रैंकिंग का असली गणित क्या है?
WDMMA की रैंकिंग यह दिखाती है कि किसी नौसेना की ताकत केवल उसके जहाजों की संख्या से तय नहीं होती. जहाज किस श्रेणी के हैं, उनका संतुलन कैसा है, कौन-सी क्षमताएं मौजूद हैं और पूरी नौसेना का सामरिक ढांचा कितना मजबूत है, इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर रैंकिंग तैयार की जाती है. यही वजह है कि 405 जहाजों वाला चीन दूसरे स्थान पर है, जबकि 232 जहाजों के बावजूद अमेरिका 2026 की WDMMA Naval Power Ranking में पहले स्थान पर बना हुआ है.




