Plane Crash: एविएशन वर्ल्ड में 30 जून की गिनती ऐसी तारीखों में होती है, जिसने अगल-अलग सालों में कई बड़े देखे. हर हादसे के साथ एविएशन वर्ल्ड को एक ऐसी खामी मिली, जिसने एविएशन सेफ्टी को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए. 1951 से लेकर 2009 के बीच 30 जून को हुए इन हादसों ने कभी नेविगेशन से जुड़ी खामियों पर से पर्दा उठाया, तो कभी दुनिया को यह बता दिया कि पायलट की धकान कितनी खतरनाक हो सकती है.
इसके अलावा, 30 जून को ही खराब मौसम, ह्यूमन एरर, एयर ट्रैफिक कंट्रोल की गलतियों के चलते हुए क्रैश ने रेगुलेटर्स को एविएशन सेफ्ट रूल्स को नए सिरे से तैयार करने के लिए मजबूर कर दिया. वहीं इन्हीं हादसों के बाद मिलिट्री एक्सरसाइज से सिविलियन फ्लाइट्स को लेकर रेखाएं खींच दी गईं. इन हादसों में सबसे भीषण हादसा 1956 का ग्रैंड कैन्यन मिड-एयर कोलिजन था, जिसमें दो पैसेंजर एयरक्राफ्ट के आपस में टकराने से 128 लोगों की मौत हो गई थी.
इसी हादसे के बाद, अमेरिका में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) को बनाने का फैसला लिया गया. इसी फैसले के साथ मॉडर्न एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम की तरफ पहला कदम बढ़ाया गया था. वहीं, 1962 में सोवियत संघ में एक पैसेंजर एयरक्राफ्ट को मिलिटरी मिसाइल से मार गिराया गया, जिसमें फ्लाइट क्रू सहित 84 पैसेंजर मारेग थे. यह घटना सिविलियन एविएशन और मिलिट्री एक्टिविटीज के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी का जीता-जागता उदाहरण बनी थी.
30 जून को हुए छह बड़े एयर क्रैश
- पहाड़ी से जा टकराई यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 610
30 जून 1951 को यूनाइटेड एयर लाइंस की फ्लाइट 610 कोलोराडो के लैरीमर काउंटी के पास एक पहाड़ से टकरा गई थी. इस फ्लाइट ने सैन फ्रांसिस्को से शिकागो के लिए उड़ान भरी थी. इस क्रैश में फ्लाइट में सवाल सभी 50 पैसेंजर और क्रू मेंबर्स की मौत हो गई थी. जांच में पता चला कि यह हादसा नेविगेशन में गलती के कारण हुआ था. पायलट ने गलत दिशा में उड़ान भरी थी और घने अंधेरे में पहाड़ी इलाके में जा घुसा था. एक्सीडेंट की जांच से पता चला कि अंधेरे कॉकपिट में पायलट ने शायद गलत रेडियो फ्रीक्वेंसी सेलेक्ट कर ली थी, जिससे उसे सही नेविगेशन सिग्नल नहीं मिल पाए थे. - ग्रैंड कैन्यन मिड-एयर कोलिजन में 128 पैसेंजर की गई जान
30 जून 1956 को हुआ मिड-एयर कोलिजन एविएशन हिस्ट्री का सबसे भीषण हादसा माना जाता है. इस हादसे में यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 718 और ट्रांस वर्ल्ड एयरलाइंस की फ्लाइट 2 ग्रैंड कैन्यन के ऊपर आपस में टकरा गईं थीं. दोनों एयरक्राफ्ट लॉस एंजिल्स से कुछ मिनटों के अंतराल पर उड़े थे. इस हादसे में दोनों एयरक्राफ्ट के सवाल कुल 128 पैसेंजर्स और क्रू मेंबर्स की जान गई थी. दोनों एयरक्राफ्ट विजुअल फ्लाइट रूल्स (VFR) के तहत उड़ रहे थे. फ्लाइट पाथ पर दोनों एक-दूसरे को देखने में नाकाम रहे. इस ट्रेजेडी ने एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम की खामियां सामने आने के बाद 1958 में एफएए का गठन किया गया था. - मिसाइल से मार गिराई एरोफ्लोट की मास्को जा रही फ्लाइट 902
30 जून 1962 को सोवियत संघ की एरोफ्लोट फ्लाइट 902 को क्रास्नोयार्स्क क्राय के पास एक मिसाइल द्वारा मार गिराया गया था. खबरोव्स्क से मास्को जा रही इस उड़ान में सवार सभी 84 पैसेंजर और क्रू-मेंबर्स की मौत हो गई थी. ऑफिशियली इसे स्टॉल और कंट्रोल खोने का मामला बताया गया था. हालांकि, फ्यूजलेज में मिले छेद और फायर मार्क से पता चला कि यह प्लेन एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल की चपेट में आया था. बाद में यह बात सामने आई कि पास में ही चल रहे एक मिलिट्री एक्सरसाइज के दौरान छोड़ी गई मिसाइल भटककर इस पैसेंजर एयरक्राफ्ट से टकरा गई थी. - समुद्र में जा गिरी थाई एयरवेज इंटरनेशनल की फ्लाइट 601
30 जून 1967 को थाई एयरवेज इंटरनेशनल की फ्लाइट 601 भीषण तूफान की चपेट में आ गई. जिस समय यह प्लेन तूफान की चपेट में आया, उस समय वह काई ताक एयरपोर्ट के बेहद करीब था. इस प्लेन को इसी काई ताक एयरपोर्ट पर ही लैंडिंग करनी थी. रिपोर्ट्स के अनुसार, तूफान में फंसा यह एयरक्राफ्ट एयरपोर्ट से करीब 28 किमी दूर स्थित समुद्र में जा गिरा था. इस हादसे में फ्लाइट में सवार 80 में से 24 पैसेंजर की मौत हो गई थी. जांच के बाद, इस हादसे के लिए पायलट एयरर को क्रैश की वजह बताया गया था. - पायलट की थकान बनी एयरबस प्लेन के क्रैश की वजह
30 जून 1994 को एयरबस इंडस्ट्री की टेस्ट फ्लाइट 129 टेकऑफ के तुरंत बाद क्रैश हो गई, जिसमें सवार सभी 7 लोग मारे गए. यह एयरबस A330 मॉडल का पहली फैटल एक्सीडेंट थी. जांच में पता चला कि पायलट फटीग हादसे की अहम वजह थी. थकान के कारण पायलट ने एयरक्राफ्ट को मिनिमम स्पीड से कम पर बहुत तेजी से ऊपर चढ़ा दिया, जिससे एयरक्राफ्ट स्टॉल हो गया और टेकऑफ के तुरंत बाद क्रैश हो गया था. - पायलट की छोटी सी गलती ने ले ली 153 पैसेंजर्स की जान
30 जून 2009 को यमेनिया की फ्लाइट 626 कोमोरोस द्वीपसमूह के प्रिंस सईद इब्राहिम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लैंडिंग के दौरान हिंद महासागर में क्रैश हो गई. एयरक्राफ्ट में सवार 153 पैसेंजर्स और क्रू-मेंबर्स में से 12 साल की एक बच्ची को छोड़कर सभी की मौत हो गई. जांच में पायलट एरर को हादसे की वजह बताया गया. खराब वेदर और पायलट की गलतियों के कारण एयरक्राफ्ट समुद्र में जा गिरा. इस हादसे ने छोटी एयरलाइनों में सेफ्टी स्टैंडर्ड्स पर गंभीर सवाल खड़े किए थे.
जांच में पाई गई प्लेन क्रैश की ये बड़ी वजहें
- 1951 में यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 610 नेविगेशनल एरर का शिकार हो गई. अंधेरे में पायलट ने गलत रेडियो फ्रीक्वेंसी सेलेक्ट कर ली, जिससे एयरक्राफ्ट सही रूट से भटक गया. जब तक पायलट अपनी गलती को सुधारता, इससे पहले प्लेन पहाडि़यों से जाकर टकरा गई. हस हादसे में प्लेन में सवार सभी पैसेंजर्स और क्रू मेंबर्स की मौत हो गई थी. आपको बता दें कि एविएशन इंडस्ट्री का वह दौर था, जब पायलटों को पूरी तरह से रेडियो सिग्नल पर निर्भर रहना पड़ता था.
- 1956 के ग्रैंड कैन्यन हादसे में दोनों एयरक्राफ्ट VFR के तहत उड़ रहे थे, जहां पायलटों को एक-दूसरे को देखकर दूरी बनाए रखनी थी. बादलों और कॉकपिट की लिमिटेड विजिबिलिटी के कारण वे एक-दूसरे को देख नहीं पाए. इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों प्लेन हवा में आपस में टकरा गए. इस हादसे में दोनों प्लेन में सवार करीब 128 पैसेंजर्स और क्रू मेंबर्स की जान चली गई थी. इसी हादसे के बाद अमेरिका के एफएए के गठन को लेकर फैसला लिया गया था.
- 1962 में एरोफ्लोट की फ्लाइट 902 मिसाइल की दपेट में आ गई थी. यह मिसाइल एक मिलिट्री एक्सरसाइज का हिस्सा थी. यह हादसा सिविलियन फ्लाइट और मिलिट्री एक्सरसाइज के बीच कोऑर्डिनेशन ना होने की वजह से हुआ था. सोवियत संघ ने ऑफिशियली इसे स्वीकार नहीं किया, लेकिन मलबे में मिले सबूतों ने मिसाइल अटैक की पुष्टि की थी.
- 1967 में थाई एयरवेज की फ्लाइट 601 और 2009 में यमेनिया की फ्लाइट 626 पायलट एरर के कारण हादसे का शिकार हुईं थी. दोनों ही मामलों में खराब वेदर के बीच लैंडिंग की कोशिश के दौरान पायलटों से गलतियां हुईं. वहीं, 1994 में एयरबस इंडस्ट्री की टेस्ट फ्लाइट 129 पायलट फटीग का शिकार हुई. लंबे समय तक काम करने और आराम की कमी के कारण पायलट ने एयरक्राफ्ट की स्पीड और एंगल का सही आकलन नहीं कर पाया था.
- 1956 के ग्रैंड कैन्यन हादसे से पहले एयर ट्रैफिक कंट्रोल का सिस्टम बहुत ही बेसिक था. पायलटों को आपस में दूरी बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी थी. कंट्रोलर के पास उन्हें ट्रैक करने के लिए पर्याप्त रिसोर्सेज नहीं थे. इस हादसे ने मॉडर्न एटीसी सिस्टम के डेवलपमेंट की नींव रखी, जिससे आसमान को सेक्टरों में बांटा गया और रडार ट्रैकिंग को अनिवार्य किया गया.
इन हादसों से एविएशन इंडस्ट्री को सबसे बड़ा सबक क्या मिला?
इन हादसों के बाद मॉडर्न एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) सिस्टम की जरूरत महसूस की गई. वहीं, 1956 के ग्रैंड कैन्यन हादसे के बाद यह महसूस किया गया कि बढ़ते एयर ट्रैफिक के साथ ‘देखो और बचो’ का नियम पर्याप्त नहीं है. इसके अलावा, पायलटों की थकान, ह्यूमन एरर और मिलिट्री एक्सरसाइज से होने वाले जोखिम को भी गंभीरता से लेने हुए नए एविएशन रूल्स तैयार किए गए.
ग्रैंड कैन्यन हादसे के बाद क्या बदलाव हुए?
इस भीषण हादसे के बाद अमेरिका में 1958 में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफएए) का गठन किया गया. एफएए ने पूरे देश में एयर ट्रैफिक को कंट्रोल करने, सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को सख्त बनाने और पायलटों व एयरक्राफ्ट के लिए नए नियम बनाने की जिम्मेदारी ली. इसके अलावा, एयरस्पेस को अलग-अलग सेक्टरों में बांटा गया, रडार ट्रैकिंग को अनिवार्य किया गया. साथ ही, फ्लाइट रिकॉर्डर (ब्लैक बॉक्स) को डेवलप करने की दिशा में काम शुरू किया गया.
पायलट की थकान से जुड़े मामले में क्या सुधार हुए?
1994 के एयरबस A330 के हादसे के बाद पायलटों के ड्यूटी आवर्स और रेस्ट पीरियड्स को लेकर दुनिया भर में सख्त नियम बनाए गए. FAA और EASA नेशनल और इंटरनेशनल एविएशन रेगुलेटर्स ने यह सुनिश्चित किया कि पायलटों को पर्याप्त आराम मिले और वे थके हुए पायलट्स एयरक्राफ्ट न उड़ाएं. एयरलाइनों को भी क्रू शेड्यूलिंग में अधिक सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए थे.
क्या मिलिट्री एक्सरसाइज और सिविलियन उड़ानों के बीच कोऑर्डिनेशन में सुधार हुआ है?
1962 के एरोफ्लोट हादसे के बाद दुनिया भर में मिलिट्री एक्सरसाइज और सिविलियन उड़ानों के बीच बेहतर कोऑर्डिनेशन पर जोर दिया गया. अब अधिकांश देशों में सिविल एविएशन अथॉरिटी और डिफेंस फोर्सेज के बीच रेगुलर कम्युनिकेशन होता है और मिलिट्री एक्सरसाइज के दौरान स्पेशल नो-फ्लाई जोन बनाया जाता है.
पायलट एरर को कम करने के लिए क्या कदम उठाए गए?
पायलट एरर को कम करने के लिए मॉडर्न एयरक्राफ्ट में एडवांस ऑटोमेशन सिस्टम और अपग्रेडेड एवियोनिक्स लगाए गए हैं. साथ ही, पायलटों को रेगुलरली सिम्युलेटर ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें वे खराब वेदर, इंजन फेलियर और अन्य इमरजेंसी सिचुएशन का सामना करना सीखते हैं. कॉकपिट में क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट (CRM) पर भी स्पेशल जोर दिया जाता है, जिसमें क्रू मेंबर्स के बीच बेहतर कम्युनिकेशन और डिसीजन मेकिंग क्षमता डेवलप की जाती है.
क्या इन हादसों के बाद एयरक्राफ्ट के डिजाइन में भी बदलाव हुए?
हां, हर हादसे ने एयरक्राफ्ट के डिजाइन में भी बदलाव किए गए. ग्रैंड कैन्यन हादसे के बाद फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) को अनिवार्य कर दिया गया, ताकि हादसे के बाद उसके सही कारणों का पता लगाया जा सके. एयरबस A330 के हादसे ने एयरक्राफ्ट के स्टॉल वार्निंग सिस्टम और फ्लाइट कंट्रोल लॉजिक को बेहतर बनाने की कवायद तभी शुरू की थी.




