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देवेश नांदल हार्वर्ड और स्मिथसोनियन में एस्ट्रोफिजिसिस्ट हैं. हाल ही में उन्हें अमेरिका की यूएपी का सदस्य बनाया गया है. यह विशेषज्ञों की एक टीम है, जो रहस्यमयी उड़ने वाली वस्तुओं से जुड़े मामलों पर वैज्ञानिक तरीके से जांच करती है. ये व्हाइट हाउस, पेंटागन, FBI और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को सलाह देती है.
पिता भारत के सबसे बेहतरीन जूडो कोचों में से एक, जिन्होंने ओलंपिक और एशियाई खेलों के मेडल विजेता तैयार किए. मां भी नेशनल लेवल की हॉकी खिलाड़ी रहीं. लेकिन बेटे का दिल मैदान में नहीं अंतरिक्ष में लगा. ये कहानी हरियाणा के हिसार के रहने वाले 37 साल के डॉ. देवेश नांदल की है. जिसका नाम दुनियाभर के बड़े एस्ट्रोफिजिसिस्ट में गिना जा रहा है.
हरियाणा के इस के एस्ट्रोफिजिसिस्ट देवेश को अमेरिका की एक बेहद खास और हाई-प्रोफाइल कमेटी अनआइडेंटिफाइड एनोमैलस फेनोमेना साइंस एडवाइजरी काउंसिल में शामिल किया गया है. यह कमेटी मशहूर प्रोफेसर एवी लोएब की अगुवाई में काम करती है. अमेरिकी सरकार की सबसे बड़ी एजेंसियों जैसे व्हाइट हाउस, पेंटागन, एफबीआई (FBI) और खुफिया विभागों को उन उड़ने वाले यूएफओ पर वैज्ञानिक सलाह देती है, जिन्हें सामान्य तौर पर समझा नहीं जा सकता.
देवेश बताते हैं कि बचपन में गांव की खुली और अंधेरी रातों में आसमान के अनगिनत तारों को देखकर उनके मन में कई सवाल उठते थे. आइजैक न्यूटन और अल्बर्ट आइंस्टीन से प्रेरित होने वाले देवेश को नोबेल पुरस्कार विजेता सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर के काम ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया. इसलिए उन्होंने एस्ट्रोफिजिक्स को ही अपना करियर चुन लिया. उन्होंने विदेश जाकर लीड्स यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री ली. स्टॉकहोम और ज्यूरिख से मास्टर की और स्विट्जरलैंड की जिनेवा यूनिवर्सिटी से अपनी पीएचडी पूरी की. उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी की तैयारी कभी नहीं की. इसकी वजह उनका रुझान थ्योरी और ब्रह्मांड के बुनियादी नियमों को समझने में ज्यादा था.
इस अमेरिकी काउंसिल में अपनी भूमिका को लेकर डॉ. देवेश ने साफ किया कि उनका काम केवल एलियंस या परग्रहियों को ढूंढना नहीं है, बल्कि पूरी तरह से विज्ञान और डेटा पर आधारित है. हाल के सालों में यूएफओ को लेकर लोगों के बीच दिलचस्पी काफी बढ़ी है. लेकिन देवेश का कहना है कि वे बिना किसी पूर्वाग्रह या पहले से तय सोच के काम करेंगे. वे फिजिक्स और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करके यह पता लगाएंगे कि आसमान में दिखने वाली ये अजीब चीजें धरती की ही हैं या इनका कोई बाहरी कनेक्शन है.
भारतीय छात्रों को संदेश देते हुए डॉ. देवेश कहते हैं कि हमारे देश में इंजीनियरिंग और मेडिकल को तो बहुत तवज्जो दी जाती है. लेकिन बुनियादी विज्ञान को लोग भूल जाते हैं. उनका मानना है कि भारत का खगोल विज्ञान में बहुत पुराना और समृद्ध इतिहास रहा है. इसे फिर से जिंदा करने की जरूरत है. अपनी सोच को एक लाइन में समेटते हुए वे कहते हैं कि किसी चीज के कैसे होने का जवाब ढूंढने से पहले हमें यह समझना होगा कि वह क्यों हो रही है. जब क्यों का पता चल जाएगा, तो कैसे पर काम करना आसान हो जाता है.
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