अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने महत्वाकांक्षी मून मिशन आर्टेमिस-3 के क्रू की घोषणा के बाद से ही चौतरफा आलोचनाओं और जनता के भारी आक्रोश का सामना कर रही है. नासा ने इस ऐतिहासिक टेस्ट मिशन के लिए मुख्य और बैकअप क्रू में केवल पुरुष अंतरिक्ष यात्रियों को जगह दी है जिसमें एक भी महिला शामिल नहीं है. इस फैसले ने अंतरिक्ष जगत के विशेषज्ञों और आम जनता को हैरान कर दिया है क्योंकि ग्रीक पौराणिक कथाओं में आर्टेमिस को चंद्रमा की देवी माना जाता है. सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि नासा ने खुद इस पूरे मून प्रोग्राम की शुरुआत करते समय दुनिया से वादा किया था कि वे इस मिशन के जरिए चंद्रमा की सतह पर पहली महिला को उतारेंगे.
विशेषज्ञों का मानना है कि नासा के सक्रिय अंतरिक्ष यात्री दल में लगभग 40% महिलाएं हैं जो बेहद योग्य और अनुभवी हैं. इसके बावजूद सभी चार मुख्य स्थानों और बैकअप रोल पर पुरुषों को चुनना एक बड़े नीतिगत बदलाव की ओर इशारा करता है. राजनीतिक विश्लेषकों ने इस फैसले को मौजूदा डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के तहत नासा की बदलती प्राथमिकताओं से जोड़ा है जहां डायवर्सिटी, इक्विटी एंड इंक्लूजन (DEI) के जनादेशों को किनारे कर दिया गया है. यहां तक कि नासा की वेबसाइट से पहली महिला वाले आधिकारिक बयानों को भी हटा दिया गया है, जिसने इस विवाद को और हवा दे दी है.
आर्टेमिस-3 क्रू चयन पर विवाद की 5 मुख्य बातें
• पूरी तरह पुरुष क्रू का चयन: नासा ने आर्टेमिस-3 मिशन के लिए रैंडी ब्रेसनिक (कमांडर), फ्रैंक रुबियो, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के लुका परमितानो (पायलट) और आंद्रे डगलस को मुख्य टीम में चुना है, जबकि बॉब हाइन्स को बैकअप मेंबर बनाया है.
• देवी के नाम पर मिशन, पर महिलाएं बाहर: आलोचकों ने इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि चंद्रमा की देवी आर्टेमिस के नाम पर रखे गए मिशन में किसी भी महिला को प्रतिनिधित्व नहीं मिला.
• आर्टेमिस II के रिकॉर्ड से उलट फैसला: यह फैसला पिछले आर्टेमिस II मिशन के बिल्कुल विपरीत है जिसने अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना कोच को चंद्रमा के चक्कर लगाने के लिए भेजकर एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया था.
• राजनीतिक बदलाव का असर: स्पेस इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन के तहत नासा ने विविधता (DEI) से जुड़े नियमों को कमजोर किया है जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई.
• नासा का बचाव: नासा के प्रशासक जेरेड इसाकमैन ने आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा कि चयन पूरी तरह से योग्यता और उड़ान के अनुभव के आधार पर हुआ है, न कि किसी राजनीतिक प्रभाव में.
क्या यह नासा की सिस्टमेटिक चूक है?
अंतरिक्ष क्षेत्र के नीतिगत विश्लेषकों का मानना है कि नासा का यह कदम केवल एक सामान्य चयन नहीं है बल्कि यह अंतरिक्ष नीति में एक बड़े वैचारिक बदलाव का संकेत देता है. पूर्व नासा उप-प्रशासक लोरी गार्वर के अनुसार, अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक विशिष्ट क्रू का चयन करना जितना विज्ञान है, उतना ही कला भी है. इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रतिष्ठित मिशनों में प्रतिनिधित्व को जानबूझकर प्राथमिकता दी जाती रही है.
नासा का यह तर्क कि कई योग्य महिला अंतरिक्ष यात्री पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) या भविष्य के अन्य मिशनों के प्रशिक्षण में व्यस्त हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरता. विज्ञान लेखिका एमिली कैलेंड्रेली ने स्पष्ट किया कि भले ही यह फैसला दुर्भावनापूर्ण न हो लेकिन यह निर्णय लेने वालों के भीतर छिपे प्रणालीगत पूर्वाग्रह (Systemic Bias) को उजागर करता है जो सार्वजनिक घोषणा से पहले विविधता की कमी को भांपने में पूरी तरह विफल रहे.
सवाल-जवाब
क्या नासा ने आर्टेमिस मिशन से महिलाओं को पूरी तरह से बाहर कर दिया है?
नहीं, नासा ने स्पष्ट किया है कि महिलाएं भविष्य के आर्टेमिस मिशनों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रमुख नेतृत्वकारी भूमिकाओं में बनी हुई हैं. नासा का दावा है कि आने वाले समय में महिलाओं को चंद्रमा की सतह पर भेजने का लक्ष्य अभी भी खत्म नहीं हुआ है.
आर्टेमिस-3 मिशन के क्रू चयन पर नासा के प्रशासक ने क्या सफाई दी?
नासा प्रशासक जेरेड इसाकमैन ने सोशल मीडिया पर कहा कि क्रू का चयन एस्ट्रोनॉट ऑफिस द्वारा पूरी तरह से विशिष्ट तकनीकी योग्यताओं, मिशन की आवश्यकताओं और उड़ान के अनुभवों के आधार पर किया गया है, इसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है.
इस मिशन के क्रू चयन को लेकर अमेरिका में राजनीतिक विवाद क्यों खड़ा हो रहा है?
आलोचकों का आरोप है कि मौजूदा ट्रंप प्रशासन के तहत नासा ने अपनी पिछली डायवर्सिटी (DEI) नीतियों को बदल दिया है. यहाँ तक कि नासा ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट से “पहली महिला को चांद पर भेजने” से जुड़ी प्रतिबद्धता वाली भाषा को भी हटा दिया है, जिससे यह विवाद राजनीतिक रूप ले चुका है.




