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ईरान के खिलाफ अमेरिका का ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू हुए दो हफ्ते से ज्यादा हो चुके हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जीत का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी ने ग्लोबल ऑयल सप्लाई को संकट में डाल दिया है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है. रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि युद्ध के शुरुआती सैन्य लाभ के बावजूद अमेरिका अभी निर्णायक जीत से काफी दूर है. आइए समझते हैं कि कैसे ट्रंप की सैन्य ताकत के बावजूद ईरान को झुकाना नामुमकिन साबित हो रहा है. (फोटोज : रॉयटर्स)
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में एक बेहद पेचीदा चौराहे पर खड़े हैं. वह दुनिया के सामने ईमानदारी से जीत की घोषणा नहीं कर पा रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि उनके हाथ से इस फैलती जंग का कंट्रोल निकलता जा रहा है. अगर अमेरिका अब इस युद्ध से पीछे हटता है, तो इसके रणनीतिक और आर्थिक परिणाम रुकने से भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं. हालांकि ट्रंप अभी वियतनाम या इराक जैसे हालात में नहीं फंसे हैं, लेकिन खतरे के संकेत चारों ओर नजर आ रहे हैं.

करीब दो हफ्तों से चल रही इस जंग में सबसे बड़ी चुनौती ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ की नाकाबंदी है. ईरान ने तेल निर्यात के इस अहम रास्ते को बंद कर दिया है. अमेरिका की जबरदस्त सैन्य शक्ति भी इस मसले का समाधान नहीं निकाल पा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक हॉर्मुज का रास्ता अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए नहीं खुलता, तब तक अमेरिका अपनी जीत का दावा नहीं कर सकता. ट्रंप की ‘स्कॉर्च्ड अर्थ’ यानी सब कुछ तबाह कर देने वाली बयानबाजी भी यहां काम नहीं आ रही है.

रणनीतिकारों का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को सैन्य बल के जरिए खोलना लगभग नामुमकिन है. ईरान के पास बहुत ही सस्ते लेकिन घातक ड्रोन्स और एंटी-शिप मिसाइलें हैं. इनके जरिए वह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी तेल आपूर्ति को रोक कर बैठा है. अमेरिकी नौसेना इन हथियारों के जोखिम की वजह से इस संकरे रास्ते में घुसने से कतरा रही है. अगर अमेरिका वहां सुरक्षा मिशन शुरू भी करता है, तो उसे हर जहाज के लिए एस्कॉर्ट देना होगा. यह थकी हुई पश्चिमी नौसेनाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है.
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जंग की शुरुआत में अमेरिका और इजरायल ने अयातुल्ला अली खामेनेई को खत्म कर दिया था. ट्रंप को लगा था कि इससे शासन का तख्तापलट हो जाएगा. लेकिन ईरान ने तुरंत उनके बेटे मोजतबा को नया सर्वोच्च नेता घोषित कर दिया. इससे ट्रंप का ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन वाला नैरेटिव कमजोर पड़ गया है. डेमोक्रेट्स का कहना है कि नया नेता अपने पिता से भी ज्यादा कट्टरपंथी और सख्त है. यानी सैन्य सफलता मिलने के बावजूद अमेरिका को वह राजनीतिक बदलाव नहीं मिला जिसकी उसने उम्मीद की थी.

ट्रंप चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द जीत का ऐलान कर इस युद्ध को खत्म करें. लेकिन इजरायल का नजरिया अलग है. इजरायल के लिए ईरान का खतरा भौगोलिक और अस्तित्व से जुड़ा है. हाल ही में इजरायल ने ईरान के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बमबारी की, जो अमेरिका की योजना में शामिल नहीं था. इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या एक विदेशी राष्ट्र अमेरिकी कमांडर-इन-चीफ के फैसलों को प्रभावित कर रहा है? बेंजामिन नेतन्याहू इस युद्ध को लंबे समय तक खींचने के पक्ष में दिख रहे हैं.

ट्रंप का दावा है कि उन्होंने ईरान के परमाणु केंद्रों को मिट्टी में मिला दिया है. लेकिन हकीकत यह है कि ईरान के पास अब भी समृद्ध यूरेनियम का भंडार सुरक्षित हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी के मुताबिक, इस्फहान प्लांट में अभी भी करीब 200 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है. जब तक वाशिंगटन इस स्टॉक को पूरी तरह खत्म नहीं करता, वह ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं के प्रति निश्चिंत नहीं हो सकता. इसे बाहर निकालने के लिए एक बड़े ग्राउंड ऑपरेशन की जरूरत होगी, जो बहुत जोखिम भरा है.

ट्रंप ने युद्ध शुरू करते समय ईरानियों से कहा था कि उनकी आजादी का समय आ गया है. उन्होंने लोगों से विद्रोह करने की अपील की थी. लेकिन अभी तक ईरान की सड़कों पर ऐसा कोई बड़ा विद्रोह नहीं देखा गया है. उलटा, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि बमबारी रुकते ही ईरानी शासन और भी क्रूरता से अपने विरोधियों को कुचलेगा. अगर ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव कम नहीं होता, तो ट्रंप की ‘आजादी’ वाली बातें सिर्फ खोखले शब्द बनकर रह जाएंगी.

अमेरिका में तेल की बढ़ती कीमतों ने ट्रंप की मुश्किल बढ़ा दी है. आम जनता को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि ईरान में कौन सी मिसाइलें तबाह हुईं. उन्हें फर्क पड़ता है गैस स्टेशन पर बढ़ती कीमतों से. जैसे-जैसे अमेरिकी सैनिकों के शव घर लौटेंगे और घर का बजट बिगड़ेगा, जनता का समर्थन कम होता जाएगा. ट्रंप एक सेल्समैन की तरह जीत का विज्ञापन तो कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में वह एक ऐसे दुश्मन से लड़ रहे हैं जो हार मानकर झुकने को तैयार नहीं है.





