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ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब गिरती हुई अमेरिकी बादशाहत को बचाने की छटपटाहट लग रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने जो नियम बनाए थे, वे अब खुद उसके खिलाफ जा रहे हैं. ऐसे में भारत एक ऐसी ‘एक्स फैक्टर’ शक्ति बनकर उभरा है, जो बिना किसी औपनिवेशिक क्रूरता के दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है.
ईरान की जंग अमेरिकी आधिपत्य के खात्मे की शुरुआत! (AI Photo)
ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव आज पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है. लेकिन अगर हम गहराई से देखें, तो यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है. यह असल में उस पुरानी व्यवस्था को बचाने की कोशिश है, जिसे अमेरिका ने सालों से अपने फायदे के लिए बना रखा था. आज एशिया और खासकर भारत का जिस तरह से उदय हो रहा है, उसने वाशिंगटन की नींद उड़ा दी है. जब अमेरिका घबराता है, तो उसका असर यूरोप के देशों में भी साफ दिखने लगता है. ईरान युद्ध को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए कि अमेरिका अब दुनिया को उस पुराने दौर में ले जाना चाहता है जहां उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था.
साल 1945 के बाद अमेरिका ने दुनिया को लोकतंत्र और उदारवाद का पाठ पढ़ाया. लेकिन असल में उसने ऐसी संस्थाएं बनाईं जो सिर्फ उसके हितों की रक्षा करती थीं. डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी वापसी के साथ इस सच को स्वीकार किया है कि ये संस्थाएं अब अमेरिका को वैसा फायदा नहीं दे रही हैं. इसलिए अब अमेरिका फिर से वही पुरानी ‘शिकारी’ नीतियां अपना रहा है, जिसने कभी पश्चिम को अमीर बनाया था. इतिहास गवाह है कि पश्चिम का विकास सिर्फ आइडियाज पर नहीं, बल्कि विज्ञान और गुलामी के दम पर हुआ था. अफ्रीका और एशिया जैसे महाद्वीपों को सिर्फ कच्चा माल निकालने की खदान बना दिया गया था. ट्रंप की ‘मागा’ (MAGA) पॉलिसी भी इसी पुराने रसूख को वापस पाने की एक कोशिश मात्र है.
21वीं सदी अब पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक रही है. इसमें भारत की भूमिका सबसे अहम है. भारत का उत्थान इसलिए खास नहीं है कि वह ताकतवर हो रहा है, बल्कि इसलिए है कि वह कैसे ताकतवर हो रहा है. भारत ने किसी देश को गुलाम नहीं बनाया और न ही अपनी संस्कृति किसी पर थोपी है. जहां चीन ने भी पश्चिमी देशों की तरह आर्थिक दबाव और दादागिरी का रास्ता चुना, वहीं भारत अपनी सभ्यता और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ रहा है. भारत दुनिया को यह दिखा रहा है कि बिना क्रूरता के भी एक महाशक्ति बना जा सकता है. यह भारत की उस प्राचीन परंपरा का हिस्सा है जहां राजा भी धर्म और नियमों के अधीन होता था.
आंकड़े बताते हैं कि साल 2030 तक दुनिया की टॉप तीन अर्थव्यवस्थाओं में एक भी यूरोपीय देश नहीं होगा. चीन और भारत इस लिस्ट में सबसे ऊपर होंगे. यह कोई मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल पावर का स्ट्रक्चरल शिफ्ट है. अब अटलांटिक महासागर की जगह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र दुनिया की राजनीति तय करेगा. भारत आज ग्लोबल पॉलिटिक्स का वह ‘एक्स फैक्टर’ है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है. भारत न तो किसी के दबाव में आता है और न ही पुराने नियमों के हिसाब से चलता है. अमेरिका के लिए भी अब मजबूरी है कि वह भारत को एक छोटे पार्टनर के बजाय एक बराबर की शक्ति के रूप में देखे.
यूक्रेन युद्ध की तरह ईरान का मुद्दा भी अमेरिका के लिए खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. अमेरिका को अब अपनी ‘रैम्बो’ वाली इमेज छोड़कर एक समझदार स्टेट्समैन की तरह व्यवहार करना होगा. उसे यह समझना होगा कि दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही. सत्ता अब कई केंद्रों में बंट चुकी है. जब तक अमेरिका इस बदली हुई हकीकत को नहीं स्वीकारता, वह अपनी गलतियों से दुनिया को संकट में डालता रहेगा. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत के सामने भी चुनौतियां आएंगी, लेकिन भारत अपनी स्वतंत्र नीति से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाने के लिए तैयार है. यह समय अब पश्चिम के वर्चस्व का नहीं, बल्कि भारत के नेतृत्व वाली नई वैश्विक व्यवस्था का है.
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दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़…और पढ़ें





