ईरान के साथ जारी युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा डालने की वजह से दुनिया के तेल बाजारों में उथल-पुथल मची हुई है. इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में 100 साल से भी अधिक पुराने ‘जोन्स एक्ट’ में 60 दिनों की छूट देने का ऐलान किया है. इस कदम का मकसद गहराते हुए ऊर्जा संकट के बीच ईंधन की कीमतों को कम करना और घरेलू आपूर्ति को मजबूत करना है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया में तेजी से बढ़ते संकट के परिणामों को संभालने के लिए एक सदी पुराने समुद्री कानून का सहारा लिया है. यह ऐक्ट असल में पहले वर्ल्ड वॉर के बाद लाया गया था.
इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष और हमलों के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आई है और सप्लाई चेन पर दबाव भी बढ़ गया है. इस युद्ध ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी रूप से बाधित कर दिया है. यह एक ऐसा रणनीतिक मार्ग है, जहां से दुनिया के कुल तेल और लिक्विड नैचुरल गैस (LNG) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा होकर गुजरता है.
वॉशिंगटन ने बुधवार को जोन्स एक्ट में अस्थायी छूट की घोषणा की है. यह फैसला विदेशी झंडे वाले जहाजों को 60 दिनों की अवधि के लिए अमेरिकी बंदरगाहों के बीच महत्वपूर्ण सामानों के परिवहन करने की अनुमति देता है. यह छूट अन्य बड़े नीतिगत बदलावों के साथ आई है, जिसमें वेनेजुएला के तेल निर्यात पर प्रतिबंधों में ढील देना और अमेरिकी रणनीतिक भंडार से भारी मात्रा में तेल जारी करना शामिल है.
जोन्स ऐक्ट क्या है और यह कैसे काम करता है?
जोन्स एक्ट असल में मर्चेंट मरीन ऐक्ट 1920 का एक मुख्य प्रावधान है, जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद बनाया गया एक फेडेरल कानून है. यह ‘कैबोटेज’ यानी घरेलू बंदरगाहों के बीच माल के ट्रांसपोर्ट को कंट्रोल करता है और इस व्यापार में लगे जहाजों के लिए कड़े नियम भी निर्धारित करता है. इस कानून के तहत अमेरिका के अंदर किन्हीं भी 2 जगहों के बीच माल ले जाने वाले जहाज को चार मुख्य शर्तें पूरी करनी होती हैं.
- जहाज का निर्माण अमेरिकी शिपयार्ड में होना चाहिए.
- वह अमेरिकी झंडे के तहत रजिस्टर्ड होना चाहिए.
- जहाज का स्वामित्व ऐसी कंपनी के पास होना चाहिए, जिसमें कम से कम 75 प्रतिशत हिस्सेदारी अमेरिकी नागरिकों की हो.
- जहाज पर काम करने वाला स्टाफ मुख्य रूप से अमेरिकी नागरिक या स्थायी निवासी होना चाहिए.
ये प्रावधान घरेलू समुद्री परिवहन को केवल अमेरिकी जहाजों के एक छोटे बेड़े तक सीमित कर देते हैं, जिससे विदेशी निर्मित या विदेशी संचालित जहाज इस व्यापार से बाहर हो जाते हैं.
प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह कानून क्यों लाया गया?
दुनिया में 1914 से लेकर 1918 के दौरान हुए पहले विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी नीति निर्माता यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि भविष्य के युद्धों में देश किसी भी विदेशी शिपिंग पर निर्भर ना रहे. तत्कालीन अमेरिकी सीनेटर वेस्ली जोन्स ने इस कानून की वकालत की थी, जिससे देश के समुद्री बेड़े को फिर से खड़ा किया जा सके. इसका मकसद युद्ध के समय सैन्य अभियानों और आपूर्ति सीरीज के लिए जहाजों और प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता की गारंटी देना था.
ट्रंप ने जोन्स ऐक्ट में छूट क्यों दी?
पश्चिम एशिया के संघर्ष का दुनिया के ऊर्जा मार्केट पर तत्काल और गहरा प्रभाव पड़ा है. एक बड़ा मोड़ तब आया जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से होने वाले समुद्री यातायात को रोक दिया, जिससे फारस की खाड़ी से तेल और गैस की आपूर्ति का महत्वपूर्ण मार्ग कट गया. अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में उत्पादन का नुकसान 70 लाख से 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन तक हो सकता है, जो वैश्विक स्तर पर होने वाली मांग का लगभग 10 प्रतिशत है.
60 दिनों की छूट में क्या-क्या शामिल है?
इसके कारण दुनिया भर में ईंधन की लागत बढ़ गई है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें कुछ ही हफ्तों में 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई हैं. इसी दबाव को कम करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने घरेलू शिपिंग के लिए उपलब्ध जहाजों के दायरे को बढ़ाने का फैसला किया है. प्रशासन की तरफ से जारी यह अस्थायी छूट ‘राष्ट्रीय रक्षा के हित’ में दी गई है. 60 दिनों तक विदेशी जहाज अमेरिकी बंदरगाहों के बीच कुछ जरूरी वस्तुएं ले जा सकेंगे.
- कच्चा तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद. जैसे- पेट्रोल, डीजल, जेट ईंधन.
- प्राकृतिक गैस और उसके डेरिवेटिव.
- फर्टिलाइजर, जो वर्तमान कृषि सीजन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.
- कोयला और अन्य ऊर्जा से संबंधित सामग्री.
ऊर्जा की कीमतों को कम करने के लिए और क्या किया जा रहा है?
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि यह छूट ‘ईरान युद्ध के दौरान तेल मार्केट में अल्पकालिक बाधाओं को कम करने’ में मदद करेगी. जोन्स एक्ट में छूट के अलावा ट्रंप प्रशासन ने कई और कदम उठाए हैं. इसमें सबसे पहले नंबर पर रणनीतिक भंडार है. ‘स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ से 17.2 करोड़ बैरल तेल जारी किया गया है.
वेनेजुएला पर ढील: अमेरिका ने वेनेजुएला पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है, जिससे अमेरिकी कंपनियां वहां की सरकारी तेल कंपनी (PDVSA) के साथ सीमित लेनदेन कर सकेंगी. हालांकि इसके साथ सख्त शर्तें जुड़ी हैं कि भुगतान सीधे स्वीकृत संस्थाओं को नहीं किया जा सकता है. पर्यावरण के नियम भी अहम हैं. उत्पादन बढ़ाने के लिए ग्रीष्मकालीन ग्रेड के पेट्रोल पर पर्यावरणीय नियमों में अस्थायी ढील दी गई है.
अब आगे क्या?
इतने सारे हस्तक्षेपों के बावजूद, ऊर्जा बाजारों में भारी अस्थिरता बनी हुई है. आपूर्ति में व्यवधान के कारण तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और फ्यूचर मार्केट में अनिश्चितता का माहौल है. हालांकि इराक और लीबिया जैसे देशों से तेल की आपूर्ति बहाल करने के कुछ प्रयास सफल रहे हैं, लेकिन वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की केंद्रीय भूमिका के कारण, खाड़ी में पैदा हुए रुकावट की पूरी तरह भरपाई करना फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है.





