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इस साल की शुरुआत तक अमेरिकी अदालतों ने ट्रंप शासन की तरफ से जारी फैसलों में से 149 पर रोक लगाया है. अगर इसमें सुप्रीम कोर्ट की तरफ से हालिया टैरिफ रद्द किए जाने के फैसले को शामिल किया जाए तो आंकड़ा 150 का हो जाता है. ट्रंप के दोबारा सत्ता में लौटने के एक साल के भीतर अगर इस आंकड़े पर गौर किया जाए तो करीब हर दूसरे दिन ट्रंप को अदालत से झटका ही लगा है.
अमेरिका अदालत डोनाल्ड ट्रंप फैसला
दुनिया भर के देशों के साथ टैरिफ-टैरिफ खेल रहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका की सुप्रीम अदालत से करारा झटका लगा, जब ने टैरिफ को रद्द करने का फैसला सुनाया. हालांकि अपनी चिर-परिचित आदत से मजबूर ट्रंप ने इस फैसले को शर्मनाक करार दिया और गुस्सा जाहिर करते हुए वैश्विक स्तर पर 10 प्रतिशत का नया टैरिफ लगाने का ऐलान कर डाला. हालांकि टैरिफ पर जंग अभी जारी है लेकिन ट्रंप राज में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव जबर्दस्त हुई है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल की शुरुआत तक अमेरिकी अदालतों ने ट्रंप शासन की तरफ से जारी फैसलों में से 149 पर रोक लगाया है. अगर इसमें सुप्रीम कोर्ट की तरफ से हालिया टैरिफ रद्द किए जाने के फैसले को शामिल किया जाए तो आंकड़ा 150 का हो जाता है. ट्रंप के दोबारा सत्ता में लौटने के एक साल के भीतर अगर इस आंकड़े पर गौर किया जाए तो करीब हर दूसरे दिन ट्रंप को अदालत से झटका लगा है.
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने के फैसले को रद्द कर दिया. कोर्ट 6-3 के अंतर से इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया. अदालत का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर टैक्स लगाने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस के पास ही है. इससे पहले निचली अदालत ने भी टैरिफ के फैसले को गैरकानूनी करार दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से सही करार दिया.
ट्रंप प्रशासन ने 2025 में दुनिया के तमाम देशों से आयात पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए थे, जिसमें चीन पर 34 प्रतिशत तक और अन्य देशों पर 10 प्रतिशत बेसलाइन टैरिफ शामिल थे. इसके अलावा कनाडा, मैक्सिको, चीन से कुछ सामानों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ फेंटानिल रोकथाम के नाम पर लगाए गए थे. अदालत ने इनमें से अधिकांश को अवैध ठहराया. हालांकि स्टील, एल्यूमिनियम जैसे कुछ टैरिफ अभी बने रहेंगे. हालांकि ट्रंप ने इसके बाद 10 फीसदी का टैरिफ ग्लोबल लेवल पर लगाने का ऐलान कर डाला.
इससे पहले भी अमेरिका की विभिन्न अदालतों की तरफ से जन्मजात नागरिकता, चुनावी रिफॉर्म्स, फेडरल फंड, ट्रांसजेंडर्स, लॉ फर्म्स को निशाना बनाया जाना, नेशनल गार्ड्स का फेडरलाइजेशन शामिल है. इन मामलों में अमेरिकी न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की शक्तियां असीमित नहीं हैं और उन्हें संविधान और कांग्रेस की तरफ से निर्धारित कानूनी ढांचे के अंदर ही रहकर काम करना होगा. ये फैसले कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन की अमेरिकी व्यवस्था को दिखाते हैं.
- जन्मसिद्ध नागरिकता के विवादित फैसले को भी अदालत ने ब्लॉक किया. एग्जिक्यूटिव ऑर्डर 14160, जिसका उद्देश्य अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को नागरिकता से वंचित करना था. निचली संघीय अदालतों ने लगभग तुरंत ही रोक दिया. यह आदेश अभी भी गहन कानूनी लड़ाई का विषय है और अंतिम फैसला लंबित है.
- वोटिंग से जुड़े कार्यकारी आदेश पर रोक भी शामिल है. अक्टूबर 2025 और जनवरी 2026 में संघीय अदालतों ने ट्रंप की तरफ से मार्च 2025 के उस कार्यकारी आदेश के प्रमुख हिस्सों को स्थायी रूप से ब्लॉक कर दिया है. इसमें मतदाताओं के लिए पासपोर्ट या नागरिकता के अन्य दस्तावेज दिखाना अनिवार्य करने की कोशिश की गई थी. अदालत ने माना कि राष्ट्रपति के पास चुनाव प्रक्रियाओं को एकतरफा बदलने का अधिकार नहीं है. यह शक्ति कांग्रेस और राज्यों के पास है.
- निर्वासन कार्रवाई के फैसले पर भी अदालत रोक लगा चुका है. A.A.R.P. v. Trump में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को एलियन एनमी ऐक्ट 1798 का उपयोग करके लोगों को एल सल्वाडोर की एक अधिकतम सुरक्षा जेल में भेजने से रोक दिया. अदालत ने कहा कि इस पुराने कानून का इस्तेमाल इस तरह की कार्रवाई के लिए उचित नहीं ठहराया जा सकता है.
- नैशनल गार्ड का संघीयकरण (Federalizing) का फैसला भी रोक दिया गया. दिसंबर 2025 में ट्रंप बनाम इलिनियोस में सुप्रीम कोर्ट ने 6–3 से फैसला दिया कि राष्ट्रपति बिना आवश्यक वैधानिक शर्तें पूरी किए इलिनोइस के नेशनल गार्ड को संघीय नियंत्रण में नहीं ले सकते हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि संघीयकरण के लिए तय कानूनी मानदंडों का पालन अनिवार्य है.
- कानूनी फर्मों को निशाना बनाए जाने के फैसले को भी अदालत ने अवैध घोषित कर दिया. कई संघीय अदालतों ने उन कार्यकारी आदेशों को अवैध और शून्य घोषित किया, जिनमें विशेष लॉ फर्मों जैसे Perkins Coie और WilmerHale को निशाना बनाया गया था. अदालतों ने माना कि ऐसे आदेश संविधान की तरफ से दिए गए अधिकारों और निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के सिद्धांतों के विपरीत हैं.
- इसके साथ ही सैन्य तैनाती से जुड़े फैसले पर रोक भी शामिल है. शिकागो जैसे शहरों में नेशनल गार्ड की तैनाती की योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई. DEI प्रोग्राम और फंडिंग पर कोर्ट की रोक लगी. टीचर्स की ट्रेनिंग और मेडिकल रिसर्च के लिए ग्रांट, विश्वविद्यालयों (जैसे कोलंबिया यूनिवर्सिटी) और लॉ फर्म्स के खिलाफ की गई दंडात्मक कार्रवाइयों और फंडिंग रोकने के आदेशों को अदालतों ने असंवैधानिक बताया. विदेशी सहायता का फैसला भी शामिल है, जिसमें कुछ मामलों में कोर्ट ने छूट दी, लेकिन 4 बिलियन डॉलर की विदेशी सहायता रोकने के फैसले पर कानूनी विवाद जारी रहा.
कुछ अन्य अहम आदेश पर ऐक्शन
ट्रंप सरकार की तरफ से कार्यकारी आदेश 13771 के अनुसार, किसी भी कार्यकारी विभाग या एजेंसी को, जो कोई नया नियम सार्वजनिक रूप से घोषित करने की योजना बना रही थी, कम से कम दो निरस्त किए जाने वाले नियमों का प्रस्ताव देना आवश्यक था. इन नए नियमों के कार्यान्वयन की लागत 0 डॉलर से कम या उसके बराबर होनी थी.
कार्यकारी आदेश 13988, जिसका आधिकारिक शीर्षक ‘लिंग पहचान या यौन अभिविन्यास के आधार पर भेदभाव की रोकथाम और मुकाबला’ है, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की तरफ से 20 जनवरी, 2021 को हस्ताक्षरित चौथा कार्यकारी आदेश था. इसे डोनाल्ड ट्रम्प ने 20 जनवरी, 2025 को पदभार ग्रहण करने के कुछ ही घंटों के भीतर रद्द कर दिया था.
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ऐश्वर्य कुमार राय नेटवर्क 18 ग्रुप में जर्नलिस्ट हैं. वह यहां डेप्युटी न्यूज एडिटर के तौर पर देश और दुनिया के घटनाक्रमों पर विस्तृत रिपोर्ट्स कवर करते हैं. वह पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए फैक्ट्स और र…और पढ़ें





