France US Relations | क्या टूट जाएगी 250 साल पुरानी दोस्ती? फ्रांस और अमेरिका में ‘कोल्ड वॉर’, पेरिस में ट्रंप के राजदूत की एंट्री पर रोक!


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क्या टूट जाएगी 250 साल पुरानी दोस्ती? फ्रांस ने क्यों कतरे ट्रंप के दूत के पर?

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फ्रांस और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है. फ्रांसीसी सरकार ने अमेरिकी राजदूत चार्ल्स कुश्नर की सीधी पहुंच पर पाबंदी लगाने का फैसला किया है. यह कदम तब उठाया गया जब कुश्नर ने एक दक्षिणपंथी कार्यकर्ता की हत्या पर अमेरिकी बयानबाजी के बाद बुलाई गई बैठक में आने से इनकार कर दिया.

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फ्रांस में अमेरिकी राजदूत चार्ल्स कुश्नर अब नहीं मिल पाएंगे मंत्रियों से, जानें क्या है विवाद? (File Photo : AP)

पेरिस: यूरोप और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रिश्तों में एक बड़ा भूचाल आ गया है. फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राजदूत चार्ल्स कुश्नर के पर कतर दिए हैं. सोमवार को फ्रांस के शीर्ष राजनयिक ने अनुरोध किया कि राजदूत कुश्नर को अब फ्रांसीसी सरकार के सदस्यों तक सीधी पहुंच (Direct Access) न दी जाए. यह कदम उस समय उठाया गया जब कुश्नर ने एक महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होने से मना कर दिया. दरअसल, फ्रांस की सरकार ने उन्हें एक दक्षिणपंथी कार्यकर्ता की हत्या पर ट्रंप प्रशासन द्वारा की गई टिप्पणियों पर चर्चा करने के लिए तलब किया था. लेकिन कुश्नर के न पहुंचने से पेरिस काफी नाराज नजर आ रहा है.

राजदूत की गैरमौजूदगी ने कैसे बिगाड़े हालात?

फ्रांसीसी अधिकारियों ने सोमवार शाम को कुश्नर को ‘क्वाई डी’ओर्से’ (Quai d’Orsay) में बुलाया था, जहां फ्रांस का विदेश मंत्रालय स्थित है. राजनयिक सूत्रों के अनुसार, बुलावा भेजे जाने के बावजूद अमेरिकी राजदूत वहां नहीं पहुंचे. इस व्यवहार पर कड़ी आपत्ति जताते हुए विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कुश्नर की पहुंच को सीमित करने का कदम उठाया. बैरोट ने कहा कि राजदूत को अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का सम्मान मिलता है, लेकिन शायद वह एक राजदूत के मिशन की बुनियादी उम्मीदों को समझने में चूक गए हैं. हालांकि, मंत्रालय ने बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं. उन्होंने कहा कि राजदूत अभी भी अपनी ड्यूटी कर सकते हैं और आपसी मतभेदों को सुलझाने के लिए मंत्रालय आ सकते हैं.

आखिर किस विवाद ने बढ़ाई दोनों देशों में दूरियां?

इस पूरे विवाद की जड़ में दक्षिणपंथी कार्यकर्ता क्वेंटिन डेरेंक की मौत है. डेरेंक की इस महीने ल्योन शहर में मारपीट के दौरान सिर में गंभीर चोट लगने से मौत हो गई थी. यह घटना एक छात्र सभा के दौरान हुई थी, जहां एक वामपंथी सांसद मुख्य वक्ता थे. इस घटना के बाद अमेरिकी विदेश विभाग के आतंकवाद विरोधी ब्यूरो ने सोशल मीडिया पर एक बयान पोस्ट किया. इसमें कहा गया कि डेरेंक की हत्या वामपंथी उग्रवादियों ने की है, जो चिंता का विषय है. अमेरिकी दूतावास ने भी इस बयान को सोशल मीडिया पर शेयर किया. फ्रांस को अमेरिका का इस तरह आंतरिक मामलों में दखल देना और टिप्पणी करना रास नहीं आया.

फ्रांस ने अमेरिका को क्यों दी सख्त चेतावनी?

फ्रांसीसी विदेश मंत्री बैरोट ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक फ्रांसीसी परिवार के शोक और इस त्रासदी का राजनीतिक इस्तेमाल उन्हें मंजूर नहीं है. उन्होंने कहा, ‘हमें किसी से सबक सीखने की जरूरत नहीं है, खासकर हिंसा के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियावादी आंदोलन से तो बिल्कुल नहीं.’ फ्रांस अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले गहरे राजनीतिक तनाव के दौर से गुजर रहा है. ऐसे में अमेरिका का ‘वामपंथी उग्रवाद’ पर बयान देना फ्रांस को अपनी सुरक्षा और संप्रभुता पर हमला लग रहा है. अमेरिका ने अपने बयान में कहा था कि वह स्थिति पर नजर रखेगा और अपराधियों को न्याय के कटघरे में देखना चाहता है.

यह पहली बार नहीं है जब चार्ल्स कुश्नर और फ्रांस के बीच अनबन हुई हो. इससे पहले अगस्त में भी कुश्नर को तब तलब किया गया था, जब उन्होंने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को एक पत्र लिखा था. उस पत्र में आरोप लगाया गया था कि फ्रांस यहूदी विरोधी भावनाओं (Antisemitism) से निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है. उस समय भी राजदूत खुद बैठक में नहीं आए थे और उन्होंने अपने एक प्रतिनिधि को भेजा था. बार-बार की इस बेरुखी ने फ्रांस को अब सख्त कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है.

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Deepak Verma

दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्‍य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़…और पढ़ें



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