नई दिल्ली: अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के रिसर्चर्स ने ऐसा रोबोट बनाया है जो पक्षियों की तरह काम करता है. यह रोबोट पानी के भीतर गहराई तक तैर सकता है. इसके बाद यह अपनी फड़फड़ाती हुई विंग्स के सहारे सीधे हवा में उड़ान भर सकता है. इससे पहले इतने छोटे आकार की किसी मशीन ने बिना प्रोपेलर के यह कामयाबी हासिल नहीं की थी. बिना किसी खास लॉन्च सिस्टम के पानी से हवा में जाना बहुत मुश्किल होता है. यह डिजाइन समंदर की निगरानी का एक बहुत सस्ता तरीका बन सकता है. यह उन खतरनाक जगहों पर आसानी से जा सकता है जहां इंसान या नाव का जाना मुश्किल है. यह पानी के अंदर से सैंपल ले सकता है और उड़कर वापस आ सकता है.
यह नया रोबोट जीव विज्ञानियों के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है. यह उन्हें इस बात का एक वर्किंग मॉडल देता है कि पानी के नीचे शिकार करने वाले पक्षी कैसे काम करते हैं. ये पक्षी दो अलग-अलग फ्लूइड्स में खुद को बड़ी आसानी से ढाल लेते हैं. इन दोनों फ्लूइड्स का व्यवहार एक दूसरे से बिल्कुल अलग होता है. अब इस रोबोट की मदद से वैज्ञानिक इन रहस्यों को और गहराई से समझ पाएंगे.
आखिर पानी और हवा दोनों में एक साथ कैसे काम करेगा यह नया रोबोट?
हवा और पानी के बीच नेविगेट करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. पानी हवा की तुलना में करीब एक हजार गुना अधिक डेंस या घना होता है. इन दोनों में आगे बढ़ने के लिए बिल्कुल अलग तरह के मैकेनिक्स की जरूरत होती है. इस लॉजिक के हिसाब से हवा के लिए बने विंग्स को पानी में बहुत संघर्ष करना चाहिए. लेकिन प्रकृति में गोता लगाने वाले पक्षी इस लॉजिक को पूरी तरह गलत साबित कर देते हैं.
लून्स, गल्स और पेट्रेल जैसे पक्षी पानी में गोता लगाते हैं. दुनिया भर में ऐसे करीब सौ अन्य पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं. ये मछलियों का शिकार करने के लिए पानी के नीचे जाते हैं. शिकार को पकड़ने के बाद वे तेजी से सतह को चीरते हुए वापस हवा में उड़ जाते हैं. एमआईटी के प्रोफेसर राफेल जुफेरी ने इस खास ट्रिक को समझने में दो साल का लंबा समय बिताया.
वह अपनी एमआईटी लैब में जानवरों की गति के आधार पर छोटी मशीनें डिजाइन करने का काम करते हैं. राफेल को शुरू से ही पक्षियों की इस अद्भुत क्षमता ने बहुत प्रभावित किया था. इसलिए उन्होंने इसे एक मशीन में बदलने का फैसला किया. इस प्रोजेक्ट में स्विट्जरलैंड के ईपीएफएल (EPFL) के रिसर्चर्स ने भी उनका साथ दिया. इसके अलावा वाशिंगटन के एक ट्राइबल कॉलेज ने भी इस टीम की बहुत मदद की. पानी और हवा का यह तालमेल वाकई में साइंस का एक बड़ा चमत्कार है.
समंदर की गहराई से आसमान तक मचेगा तहलका. (Image Credit: Raphael Zufferey/MIT)
पक्षियों की उड़ान से प्रेरित होकर कैसे सुलझी इस अनोखे रोबोट की गुत्थी?
यह जानने के लिए कि पक्षी यह कारनामा कैसे करते हैं टीम ने काफी लंबी रिसर्च की. उन्होंने पफिन और किंगफिशर जैसे पक्षियों के पब्लिश्ड डेटा को जमा किया और उसका गहराई से एनालिसिस किया. उन्होंने इन पक्षियों के मोशन के पैटर्न को समझने की कोशिश की. इसके बाद जो नंबर सामने आए वे काफी हैरान करने वाले थे.
- छोटे गोताखोर पक्षी हवा में एक सेकंड में करीब दस बार अपने पंख फड़फड़ाते हैं. वहीं पानी के नीचे वे एक सेकंड में केवल चार बार अपने पंख फड़फड़ाते हैं. टीम ने बिल्कुल इसी रिदम को अपने हार्डवेयर में कॉपी करने का लक्ष्य रखा. लेकिन इस पूरे आइडिया पर शुरू से ही एक बड़ा सवाल खड़ा था. बड़े विंग्स या पंख हवा में उड़ने में बहुत मदद करते हैं.
- पानी हवा की तुलना में काफी ज्यादा रुकावट या ड्रैग पैदा करता है. इसलिए उन्हीं बड़े विंग्स को पानी के अंदर काफी दिक्कत का सामना करना चाहिए था. अर्थ डॉट कॉम ने राफेल जुफेरी से पूछा कि टीम को इस दौरान किस बात ने सबसे ज्यादा हैरान किया. जुफेरी ने कहा, ‘पानी के नीचे बड़े विंग्स एफिशिएंसी को कम नहीं करते हैं’.
- उन्होंने आगे बताया कि कोई भी यही सोचेगा कि बड़े विंग्स को पानी में अधिक ड्रैग फोर्स से लड़ना होगा. लेकिन हकीकत में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. इस शानदार नतीजे ने टीम की एक बड़ी चिंता को हमेशा के लिए दूर कर दिया. अब वे ड्रैग को कम करने के लिए छोटे विंग्स चुनने को मजबूर नहीं थे. उन्होंने अपनी उड़ान के लिए जरूरी बड़े विंग्स को ही चुना.
समंदर में गोता लगाने और हवा में उड़ने वाला अनोखा रोबोट हुआ तैयार. (Image Credit: Raphael Zufferey/MIT)
इस अनोखी मशीन को बनाने में वैज्ञानिकों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
इस रोबोट का मॉडल पूरी तरह से एक पक्षी के शरीर के बेसिक स्ट्रक्चर पर आधारित है. इसका वजन आधे पाउंड से भी काफी कम रखा गया है. इसके एक पतले सेंट्रल फ्रेम में एक छोटी बैटरी लगाई गई है. इसमें एक वाटरप्रूफ मोटर भी शामिल है जो क्रैंकशाफ्ट को घुमाने का काम करती है. यह पूरा सिस्टम एक तय गति से विंग्स को फड़फड़ाने में मदद करता है.
- इस मशीन को चलाने वाला ड्राइव सिस्टम ही सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा था. राफेल जुफेरी ने बताया कि सबसे मुश्किल काम एक ऐसी पावरफुल मोटर को फिट करना था. यह मोटर पानी के नीचे धीरे-धीरे और हवा में तेजी से पंख फड़फड़ाने में सक्षम है.
- इस मोटर को पानी से बचाने के लिए पूरी तरह से सील करना भी बहुत जरूरी था. रोबोट में एक छोटी मोटर वाली टेल भी है जो उसके झुकाव को कंट्रोल करती है. यह टेल चढ़ाई के लिए नोज को ऊपर और गोता लगाने के लिए नीचे की ओर करती है.
- इसके विंग्स बहुत ही पतली झिल्लियों से बने हैं. इन विंग्स पर पानी को पीछे धकेलने वाले खास पार्टिकल्स की कोटिंग की गई है. यह कोटिंग रोबोट के उड़ान भरते ही सतह से सारा पानी हटाने में बहुत मदद करती है.
- इंजीनियरों ने इलेक्ट्रॉनिक्स को भारी वाटरप्रूफ शेल में सील करने के बजाय एक खास ट्रिक अपनाई. उन्होंने हर एक पार्ट पर सिलिकॉन की एक बहुत पतली परत चढ़ा दी. इस वजह से यह मशीन काफी हल्की बनी रही.
- वाटरप्रूफिंग से इसका वजन केवल आधा औंस ही बढ़ा जो इसके कुल वजन का करीब पांच प्रतिशत है. इससे रोबोट का बैलेंस पानी में बहुत अच्छे से बना रहा. वह न तो पानी के ऊपर तैरता रहा और न ही गहराई में डूब गया.
पानी की सतह को चीरकर हवा में उड़ने के लिए यह रोबोट आखिर क्या ट्रिक अपनाता है?
- इस रोबोट के विंग्स को बहुत ही आसानी से निकाला और बदला जा सकता है. टीम ने दो से तीन फीट या 0.6 से 0.9 मीटर तक के तीन अलग-अलग सेट बनाए हैं. इस रोबोट की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग विंग्स के फड़फड़ाने और उनकी कठोरता पर निर्भर थी. बहुत ज्यादा लचीला विंग रोबोट को हवा में ऊपर नहीं रख सकता था. वहीं बहुत ज्यादा कठोर विंग पानी में तेजी से काम नहीं कर सकता था.
- टेस्टिंग के लिए एक तय रूटीन का सख्ती से पालन किया गया. टीम ने रोबोट को पानी के नीचे करीब डेढ़ फुट या 0.5 मीटर से स्टार्ट किया. उन्होंने विंग्स को एक खास रिदम पर और टेल को एक खास एंगल पर फिक्स किया. उन्होंने गहराई से देखा कि क्या यह सतह को तोड़कर सीधे हवा में उड़ सकता है. उन्होंने सबसे पहले एक टैंक में इसका ट्रायल किया. इसके बाद स्विट्जरलैंड की लेक जिनेवा में भी इसका सफल परीक्षण किया गया.
- सतह के ठीक नीचे रोबोट एक सेकंड में करीब तीन फीट या 0.9 मीटर की स्पीड से तैरा. इस दौरान उसने एक सेकंड में करीब पांच बार अपने पंख फड़फड़ाए. हवा में यह एक समान बीट पर 20 फीट या 6.1 मीटर प्रति सेकंड की स्पीड तक पहुंच गया. पानी की सतह को चीरने के लिए रोबोट को अपनी बीट दोगुनी करनी पड़ी.
- उसे एक सेकंड में करीब दस बार पंख फड़फड़ाने पड़े. इसके साथ ही उसे अपने शरीर को 70 डिग्री के एंगल पर सीधा रखना पड़ा. इस एंगल ने विंगटिप्स को पानी की सतह से टकराने से बचा लिया. सबसे हैरानी की बात यह थी कि रोबोट को उड़ने के लिए पैरों से किक नहीं मारनी पड़ी. पानी के अंदर समान विंग्स की गति दस सेकंड में एक बीट तक धीमी हो सकती है.
बिना किसी प्रोपेलर के पानी से हवा में उडेगा यह छोटा रोबोट. 70 डिग्री के एंगल पर करेगा समंदर की निगरानी. (Image Credit: Raphael Zufferey/MIT)
भविष्य में कैसे वरदान साबित होगा यह नया रोबोट?
- इससे पहले पानी से हवा में जाने वाले रोबोट्स में बहुत भारी हार्डवेयर का इस्तेमाल होता था. जुफेरी ने सालों पहले एक ऐसा खास डिजाइन बनाया था जो पानी के साथ रिएक्ट करके गैस बनाता था. वह गैस मशीन को उसके वजन से कई गुना अधिक फोर्स के साथ सतह से ऊपर उछालती थी. अन्य वैज्ञानिकों ने पानी और हवा के बीच की सीमा को पार करने के लिए प्रोपेलर या टिल्टिंग रोटर्स का भी सहारा लिया.
- लेकिन सिर्फ विंग्स के सहारे ऐसा करना बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण काम था. विंग्स काफी हल्के होते हैं और इनमें किसी भी तरह की भारी मशीनरी की जरूरत नहीं होती है. अब टीम विंग्स में कुछ बड़े बदलाव कर रही है ताकि वे ऊपर-नीचे होने के साथ मुड़ भी सकें. इससे रोबोट को असली पक्षी की तरह स्टीयर करने में काफी मदद मिलेगी. इसके आगे भी कई तरह के कड़े टेस्ट की तैयारी चल रही है.
- इसे शांत टैंक की बजाय तेज लहरों और हवा के झोंकों के बीच भी टेस्ट किया जाएगा. इस पूरे प्रोजेक्ट का लक्ष्य ओशन साइंस को सस्ता और आसान बनाना है. शिप और सेंसर बहुत महंगे होते हैं और उन्हें इधर-उधर ले जाना काफी धीमा प्रोसेस होता है. ऐसे में इन रोबोट्स का एक छोटा बेड़ा उन खतरनाक जगहों पर आसानी से पहुंच सकता है.




