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Astronaut Anil Menon on ISS: भारतीय मूल के नासा एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन इन दिनों इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर हैं. वहां उन्होंने जेसिका के साथ एक बड़ा एक्सपेरिमेंट शुरू किया है. वो पीने के पानी को मेडिकल ग्रेड आईवी फ्लूइड में बदल रहे हैं. यह प्रयोग भविष्य के मार्स मिशन के लिए बेहद जरूरी है. क्योंकि वहां मेडिकल सप्लाई भेजना काफी मुश्किल होगा. इस तकनीक से धरती पर भी आपदा के समय काफी मदद मिलेगी.
एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन स्पेस में बना रहे IV फ्लुइड. (Anil Menon/X)
नई दिल्ली: भारतीय मूल के नासा एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन इस समय अंतरिक्ष में एक खास प्रयोग कर रहे हैं. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) से उन्होंने एक्स पर लिखा कि एस्ट्रोनॉट जेसिका बहुत ही धैर्य के साथ उन्हें नया काम सिखा रही हैं. मेनन इस समय लाइफ साइंसेस ग्लवबॉक्स के अंदर एक खास मशीन पर काम कर रहे हैं. इस मशीन का नाम आईवीजेन मिनी है. यह सिस्टम स्पेस स्टेशन के पीने वाले पानी को मेडिकल ग्रेड आईवी फ्लूइड में बदल देता है. यह तकनीक भविष्य के डीप स्पेस मिशन के लिए बहुत काम आने वाली है.
अनिल मेनन एक इमरजेंसी मेडिसिन फिजिशियन रह चुके हैं. उन्होंने बताया कि मंगल ग्रह जैसे लंबे मिशन पर दवाइयां भेजना आसान नहीं होगा. ऐसे में यह प्रयोग बहुत बड़ी कामयाबी साबित हो सकता है. इस नई तकनीक का असर सिर्फ स्पेस में ही नहीं बल्कि धरती पर भी देखने को मिलेगा. इससे आपदा वाली जगहों पर आसानी से मेडिकल फ्लूइड बनाया जा सकेगा.
आखिर स्पेस में क्यों पड़ रही है आईवी फ्लूइड बनाने की जरुरत?
अनिल मेनन ने अपनी पोस्ट में इस प्रयोग की अहमियत समझाई है. उन्होंने बताया कि आम आईवी फ्लूइड बैग की एक्सपायरी डेट करीब 16 महीने होती है. वहीं मंगल ग्रह के किसी भी मिशन में कई साल लग सकते हैं. ऐसे में धरती से 100 लीटर से ज्यादा मेडिकल फ्लूइड अंतरिक्ष में भेजना संभव नहीं है. इतने वजन को लॉन्च करना बहुत मुश्किल और महंगा साबित होता है. इसीलिए नासा अब स्पेस में ही इसे बनाने की तकनीक विकसित कर रहा है.
स्पेस स्टेशन में एस्ट्रोनॉट पानी से बना रहे मेडिकल फ्लूइड. (Photo : Anil Menon/X)
अंतरिक्ष में पानी से मेडिकल फ्लूइड बनाने का क्या है पूरा प्रोसेस?
इस समस्या को सुलझाने के लिए वैज्ञानिक एक बहुत ही स्मार्ट तरीका अपना रहे हैं. वो धरती से तैयार सलाइन बैग ले जाने की बजाय सिर्फ फिल्टर और नमक अंतरिक्ष में ले जाते हैं. स्पेस स्टेशन के पीने वाले पानी को पहले मेडिकल ग्रेड तक शुद्ध किया जाता है. इसके बाद इसमें तय मात्रा में सोडियम क्लोराइड मिलाया जाता है. यह पूरा प्रोसेस एक खास मशीन में होता है. फिर यह मिश्रण एक नॉर्मल सलाइन के रूप में बाहर आता है.
Spent the day inside the Life Sciences Glovebox with @astro_jessica, who is patiently teaching the new guy. She’s running IVGEN Mini, our IV fluid generation experiment, and the idea is simple to say and hard to do: turn the station’s drinking water into sterile, medical-grade IV… pic.twitter.com/k8nDvqojEF




