वाशिंगटन: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से युद्ध छेड़कर जो दांव खेला है, खुद उसमें फंसते नजर आ रहे हैं. अमेरिका ने पहले इजरायल के साथ मिलकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान की नाकाबंदी तोड़नी चाही, लेकिन नाकाम रहे. अब वे यहां कब्जे के लिए एक ‘ब्यूटीफुल आर्माडा’ (शक्तिशाली जहाजी बेड़ा) तैनात करने का आह्वान कर रहे हैं. ट्रंप चाहते हैं कि ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और चीन जैसे देश भी अपनी नौसेना भेजें. उनका तर्क है कि ग्लोबल ऑयल सप्लाई को बचाना सबकी जिम्मेदारी है. लेकिन हकीकत यह है कि 13 मार्च को दिए गए उनके इस बयान पर दुनिया के बड़े देशों का रिस्पॉन्स बहुत ठंडा रहा है. होर्मुज की संकरी भौगोलिक बनावट ऐसी है कि वहां दुनिया की सबसे ताकतवर नेवी भी बेबस नजर आती है. यह भूगोल और ईरान की मारक क्षमता का ऐसा कॉकटेल है जिसे भेदना लगभग नामुमकिन है.
क्यों होर्मुज का भूगोल अमेरिका के लिए सबसे बड़ा दुश्मन है?
सबसे संकरी जगह पर यह सिर्फ 34 किलोमीटर चौड़ा है. जहाजों के आने-जाने के लिए बने लेन सिर्फ 4-4 किलोमीटर के हैं.
अमेरिकी नेवी के निमित्ज क्लास जैसे विशाल विमानवाहक पोत खुले समुद्र के राजा हैं. लेकिन होर्मुज के तंग पानी में उन्हें मुड़ने के लिए भी कई किलोमीटर का घेरा चाहिए होता है.
ऐसे में ये विशाल जहाज ईरानी ट्रक-माउंटेड ‘खलीज फारस’ बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए आसान निशाना बन जाते हैं. ईरान की पहाड़ियां इन मिसाइलों को नेचुरल कवर देती हैं, जिससे अमेरिकी रडार भी गच्चा खा जाते हैं.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (फाइल फोटो : रॉयटर्स)
क्या ईरान की ‘मधुमक्खी वाली रणनीति’ अमेरिकी नेवी को डुबो देगी?
- ईरान की मिलिट्री ने होर्मुज के लिए एक खास ‘A2/AD’ यानी एंट्री रोकने वाला नेटवर्क तैयार किया है. उनके पास 3,000 से ज्यादा एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें हैं.
- इसके अलावा ‘शाहेद-136’ जैसे हजारों ड्रोन का झुंड एक साथ हमला करने की ताकत रखता है. अमेरिका के पास बेहतरीन डिफेंस सिस्टम है, लेकिन वह एक साथ आए सैकड़ों मिसाइलों और हजारों ड्रोन्स को रोकने के लिए नहीं बना है.
- ईरान की ‘होरनेट नेस्ट’ (मधुमक्खियों का छत्ता) रणनीति के तहत 20,000 से ज्यादा छोटी और तेज रफ्तार नावें हमला करती हैं.
- ये नावें इतनी छोटी होती हैं कि रडार पर नहीं आतीं और इतनी तेज होती हैं कि बड़े युद्धपोतों के करीब पहुंचकर उन्हें तबाह कर सकती हैं.
- होर्मुज के उथले पानी में समुद्री सुरंगें (Naval Mines) सबसे सस्ता और घातक हथियार हैं. ईरान के पास ऐसी 6,000 से ज्यादा माइंस हैं. इन्हें छोटी नावों या ‘गदीर’ जैसी छोटी पनडुब्बियों से कहीं भी बिछाया जा सकता है.
- अमेरिका की वर्जीनिया क्लास सबमरीन गहरे समुद्र में शिकार करने के लिए बनी हैं. होर्मुज की 100 फीट की गहराई में ये बड़ी पनडुब्बियां ठीक से काम नहीं कर पातीं.
- वहीं दूसरी ओर, ईरान की किलो-क्लास और छोटी पनडुब्बियां शोरगुल वाले व्यापारिक जहाजों के नीचे छिपकर घात लगाने में माहिर हैं.
14 मार्च की घटनाओं ने साबित किया है कि अमेरिकी स्ट्राइक के बाद भी व्यापारिक जहाज वहां से बेखौफ होकर नहीं निकल पा रहे हैं.
क्या होर्मुज की लहरों में डूबेगा अमेरिका का गुरूर? (AI Photo)
क्यों ट्रंप के सहयोगी इस मिशन से पीछे हट रहे हैं?
ट्रंप का मिशन सिर्फ मिलिट्री नहीं बल्कि लॉजिस्टिक के मोर्चे पर भी कमजोर है. रोजाना 60 से ज्यादा तेल टैंकरों को सुरक्षा देना अमेरिकी नेवी की क्षमता से बाहर की बात है. इसके लिए उन्हें अपने 290 जहाजों के बेड़े का एक बड़ा हिस्सा यहीं झोंकना पड़ेगा. बहरीन में मौजूद अमेरिका का पांचवां बेड़ा खुद ईरानी मिसाइलों की रेंज में है.
सऊदी अरब और यूएई जैसे सहयोगी देश भी अब डरे हुए हैं. उन्हें डर है कि अगर ईरान ने जवाबी हमला किया तो उनके तेल कुएं तबाह हो जाएंगे.
यूरोपीय यूनियन की फॉरेन पॉलिसी चीफ काजा क्लास ने साफ कर दिया है कि कोई भी अपने सैनिकों को जोखिम में नहीं डालना चाहता. वे युद्ध के बजाय डिप्लोमेसी के जरिए एनर्जी संकट सुलझाना चाहते हैं.
क्या ‘ब्यूटीफुल आर्माडा’ केवल कागजों पर ताकतवर है?
विमानवाहक पोतों के डेक से एफ-35 लड़ाकू विमानों को उड़ान भरने के लिए जहाज को एक खास दिशा में रखना पड़ता है. इस दौरान वे मिसाइल हमलों के प्रति सबसे ज्यादा असुरक्षित होते हैं. ईरानी ‘नूर’ क्रूज मिसाइलें लहरों के बिल्कुल ऊपर से उड़ती हैं, जिससे रडार उन्हें आखिरी समय तक देख नहीं पाते.
होर्मुज की संकरी गलियों में सुसाइड मिशन साबित होगा ट्रंप का आर्माडा! (फाइल फोटो : रॉयटर्स)
जब तक अमेरिका ईरान की 1,600 मील लंबी तटरेखा पर पूरी तरह कब्जा नहीं करता, तब तक होर्मुज को पूरी तरह सुरक्षित नहीं किया जा सकता. और ऐसा करने के लिए हजारों उड़ानों और लाखों सैनिकों की जरूरत होगी, जो फिलहाल मुमकिन नहीं दिखता.





