अमेरिका की हालिया बमबारी, ईरान के जवाबी हमलों और इजरायल के साथ लगातार बढ़ते टकराव ने पश्चिम एशिया को युद्ध में झोंक रखा है. कुछ समय पहले तक ऐसा लग रहा था कि परमाणु समझौते और कूटनीतिक बातचीत से तनाव कम हो रहा है, लेकिन पिछले दो दिनों में होरमुज जलडमरूमध्य के किनारे बसे ईरानी शहरों बुशेहर, चाबहार, बंदर अब्बास और सीरिक में अमेरिकी हमलों से 14 लोगों की जान गई और 78 घायल हो गए. मौजूदा घटनाक्रम ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया यह मान बैठी थी कि एक समझौते से 1979 से चली आ रही दुश्मनी खत्म हो जाएगी? दरअसल, यह संघर्ष किसी एक घटना या एक सरकार का नहीं, बल्कि करीब आधी सदी पुराने अविश्वास, वैचारिक टकराव और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की कहानी है.
करीब आधी सदी पहले हुई 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति ने सिर्फ शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सत्ता का अंत नहीं किया, बल्कि कभी सबसे करीबी सहयोगी रहे अमेरिका और ईरान को कट्टर प्रतिद्वंद्वी बना दिया. इसके बाद आर्थिक प्रतिबंध, प्रॉक्सी युद्ध, परमाणु विवाद, दूतावास बंधक संकट और इजरायल को लेकर बढ़ता टकराव दोनों देशों के रिश्तों की नई पहचान बन गए. आज जब पश्चिम एशिया में लगभग हर बड़े संकट के केंद्र में अमेरिका, ईरान और इजरायल दिखाई देते हैं, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि इस दुश्मनी की शुरुआत आखिर कैसे हुई?
क्या हुआ था 1979 की ईरानी क्रांति में?
अमेरिका और ईरान के बीच आज दिखाई देने वाली गहरी दुश्मनी की सबसे बड़ी वजह 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति मानी जाती है. इससे पहले शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन में ईरान पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी था. दोनों देशों के राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक रिश्ते इतने मजबूत थे कि ईरान को “मध्य पूर्व में अमेरिका का एयरक्राफ्ट कैरियर” तक कहा जाता था.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इराक और सीरिया जैसे देश सोवियत संघ के करीब जाने लगे. ऐसे में अमेरिका ने विशाल भूभाग, मजबूत सेना और रणनीतिक स्थिति वाले ईरान को अपना प्रमुख साझेदार बनाया. तेल संसाधनों ने भी ईरान की अहमियत और बढ़ा दी.
1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक ने तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की. इसके बाद उनका (विदेशी ताक़तों द्वारा) तख्तापलट हुआ, उन्हें सत्ता से हटा दिया गया और शाह को दोबारा सत्ता में बैठा दिया गया. इस घटना ने अमेरिका-ईरान संबंधों को मजबूत किया, लेकिन विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ जनता का असंतोष भी बढ़ने लगा.
शाह ने देश को आधुनिक बनाने के लिए ‘व्हाइट रिवोल्यूशन’ शुरू किया, लेकिन धार्मिक और पारंपरिक वर्गों ने इसका विरोध किया. दूसरी ओर SAVAK की दमनकारी कार्रवाई ने विपक्ष और आम जनता में गुस्सा बढ़ा दिया. शहरों में उदारवादी और वामपंथी, जबकि ग्रामीण इलाकों में धार्मिक नेतृत्व के तहत विरोध तेज होता गया.
1979 में जनआंदोलन के बाद शाह देश छोड़कर चले गए और रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति सफल हुई. इसके साथ ही राजशाही खत्म हुई और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की स्थापना हुई. यहीं से अमेरिका और ईरान के रिश्ते दोस्ती से दुश्मनी में बदल गए और प्रतिबंध, परमाणु विवाद, प्रॉक्सी युद्ध तथा क्षेत्रीय तनाव दोनों देशों के संबंधों का स्थायी हिस्सा बन गए.
बंधक संकट ने हमेशा के लिए बदल दिए रिश्ते
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सबसे बड़ी दरार तब आई, जब ईरानी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकी राजनयिकों और कर्मचारियों को बंधक बना लिया. ईरान की मांग थी कि अमेरिका पूर्व शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को प्रत्यर्पित करे. हालांकि शाह की 1980 में मिस्र के काहिरा में मौत हो गई, लेकिन बंधकों को 444 दिन बाद जनवरी 1981 में रिहा किया गया. इस घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को लगभग पूरी तरह तोड़ दिया.
इस्लामी क्रांति का एक प्रमुख उद्देश्य विदेशी प्रभाव, खासकर अमेरिकी दखल, का विरोध था. ईरान के सर्वोच्च नेता रूहोल्लाह खुमैनी ने अमेरिका को “ग्रेट सैटन” और इजरायल को उसका सबसे करीबी सहयोगी बताते हुए उसके खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया. फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन और जियोनिज्म का विरोध नई ईरानी विदेश नीति का अहम आधार बन गया.
समय के साथ ईरान ने लेबनान के शिया संगठन हिजबुल्लाह समेत कई इजरायल विरोधी समूहों का समर्थन शुरू किया. यही वजह है कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार गहराता गया और यह संघर्ष आज भी पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौतियों में शामिल है.
क्रांति के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी ईरान-इजरायल की साझेदारी
आज भले ही ईरान और इजरायल एक-दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन माने जाते हों, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले दोनों देशों के बीच सैन्य, आर्थिक और खुफिया सहयोग बेहद मजबूत था. दिलचस्प बात यह है कि क्रांति के बाद सार्वजनिक तौर पर विरोध के बावजूद कुछ वर्षों तक पर्दे के पीछे दोनों देशों के बीच सहयोग जारी रहा.
इस रिश्ते की शुरुआत 1950 के दशक में इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन की ‘पेरीफेरी डॉक्ट्रिन’ से हुई. इसके तहत इजरायल ने गैर-अरब देशों के साथ रणनीतिक रिश्ते बनाए. ईरान, तुर्किये और इथियोपिया इसके प्रमुख साझेदार बने. हालांकि ईरान ने कभी आधिकारिक रूप से इजरायल को मान्यता नहीं दी, लेकिन 1950 में उसने अनौपचारिक रूप से उसे स्वीकार कर लिया.
1956 के स्वेज संकट और गमाल अब्देल नासिर के नेतृत्व में पैन-अरबवाद के उभार के बाद दोनों देशों की नजदीकियां और बढ़ीं. इजरायल और ईरान दोनों इराक को साझा खतरा मानते थे. 1960 के दशक में मोसाद और सवाक ने मिलकर इराकी कुर्द लड़ाकों की मदद की. 1958 में ईरान, इजरायल और तुर्किये ने ‘ट्राइडेंट’ नाम का गुप्त खुफिया गठबंधन भी बनाया.
शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का मानना था कि वॉशिंगटन में इजरायल का प्रभाव मजबूत है और उसके जरिए अमेरिका के साथ रिश्ते और बेहतर बनाए जा सकते हैं. इसी वजह से दोनों देशों के संबंध लगातार मजबूत होते गए.
सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में भी गहरी साझेदारी थी. ईरानी तेल इलात-अश्केलोन पाइपलाइन के जरिए इजरायल पहुंचता था. 1977 में दोनों देशों ने ‘प्रोजेक्ट फ्लावर’ के तहत करीब 1.2 अरब डॉलर की संयुक्त मिसाइल परियोजना भी शुरू की.
हालांकि 1979 की क्रांति के बाद ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, लेकिन ईरान-इराक युद्ध के दौरान दोनों देशों का साझा दुश्मन इराक था. ईरान को हथियारों की जरूरत थी और इजरायल नहीं चाहता था कि सद्दाम हुसैन क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत बने. इसी वजह से इजरायल ने गुप्त रूप से ईरान को हथियार और सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई.
1980 में इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाखेम बेगिन ने ईरान को लड़ाकू विमानों के टायर और हथियार भेजने की मंजूरी दी. बाद में सामने आए ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण ने यह भी उजागर किया कि अमेरिका ने इजरायल के जरिए ईरान को हथियार पहुंचाए. बदले में लेबनान में बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई और निकारागुआ के कॉन्ट्रा विद्रोहियों को सहायता देने की कोशिश की गई.
हालांकि ईरान सार्वजनिक मंचों से लगातार इजरायल का विरोध करता रहा, लेकिन पर्दे के पीछे रक्षा सहयोग जारी रहा. 1982 में इजरायल के लेबनान पर हमले के बाद ईरान ने हिजबुल्लाह के गठन को तेज किया. अंततः 1990 के दशक तक यह गुप्त सहयोग भी पूरी तरह खत्म हो गया और दोनों देशों की प्रतिद्वंद्विता पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी रणनीतिक टकराहट बन गई.
सोर्स: Rand / Israel and Iran A Dangerous Rivalry
1980 से शुरू हुआ असली टकराव
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद 1980 का दशक अमेरिका और ईरान के बीच खुले टकराव का दौर बन गया. बंधक संकट, बेरूत में अमेरिकी दूतावास और सैन्य ठिकानों पर हमले, ईरानी यात्री विमान को मार गिराने की घटना और ईरान-कॉन्ट्रा जैसे विवादों ने दोनों देशों के रिश्तों को और ज्यादा कटु बना दिया.
- 1983 में अमेरिका ने ईरान समर्थित हिजबुल्लाह पर बेरूत स्थित अमेरिकी दूतावास में हुए बम धमाके का आरोप लगाया.
- 1983 में 63 लोगों की मौत हुई. इसी वर्ष अमेरिकी सैन्य बैरक पर हुए विस्फोट में 241 अमेरिकी सैनिक मारे गए.
- 1988 में अमेरिकी नौसेना ने तेहरान से उड़ान भरने वाले एक ईरानी यात्री विमान को लड़ाकू विमान समझकर मार गिराया, जिसमें 290 लोगों की मौत हुई. अमेरिका ने इसे गलती बताया, जबकि ईरान ने इसे जानबूझकर किया गया हमला कहा.
- इसी दौर में ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण सामने आया. लेबनान में बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई के बदले अमेरिका ने गुप्त रूप से ईरान को हथियार बेचे. इन हथियारों की बिक्री से मिली रकम का इस्तेमाल निकारागुआ के कम्युनिस्ट विरोधी कॉन्ट्रा विद्रोहियों की मदद के लिए किया गया, जिससे यह मामला अमेरिका के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में शामिल हो गया.
क्या एक समझौता इस दुश्मनी को खत्म कर सकता है?
आज जब अमेरिका, ईरान और इजरायल फिर से आमने-सामने हैं और पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, तब इतिहास यही बताता है कि यह टकराव किसी एक समझौते, एक हमले या एक सरकार का नहीं है.
1979 में शुरू हुई वैचारिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक खाई समय के साथ और गहरी होती गई. यही वजह है कि हर नई वार्ता उम्मीद तो जगाती है, लेकिन हर नया संघर्ष यह याद दिला देता है कि करीब आधी सदी पुरानी इस दुश्मनी का अंत अभी भी दुनिया के सबसे कठिन सवालों में से एक बना हुआ है.




