Darjeeling Himalayan Railway Toy Train | 145 साल का सफर… 4 जुलाई 1881 को चली थी पहली टॉय ट्रेन, आज भी दुनिया करती है सलाम


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145 साल… 4 जुलाई 1881 को चली थी पहली टॉय ट्रेन, आज भी दुनिया करती है सलाम

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Darjeeling Himalayan Railway Toy Train: 4 जुलाई 1881 को सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच शुरू हुई टॉय ट्रेन आज भी दुनिया की सबसे खूबसूरत पर्वतीय रेल यात्राओं में गिनी जाती है. करीब 88 किलोमीटर लंबा यह सफर चाय बागानों, घने जंगलों, बादलों और पहाड़ों के बीच से गुजरता है. रास्ते में बतासिया लूप, घूम स्टेशन, कुर्सियांग और कई ऐतिहासिक पड़ाव आते हैं. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि भारत की इंजीनियरिंग, इतिहास और पर्यटन की अनमोल धरोहर है. जानिए यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा हासिल कर चुकी इस ट्रेन का पूरा सफर…

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4 जुलाई 1881 को शुरू हुई दार्जिलिंग टॉय ट्रेन का 145 साल बाद भी पहाड़ों के बीच सफर जारी है.

Darjeeling Himalayan Railway Toy Train: 4 जुलाई 1881… यही वह दिन था, जब सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच पहली बार दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की ‘टॉय ट्रेन’ पटरी पर दौड़ी थी. यह वह दौर था, जब पहाड़ों तक पहुंचना आसान नहीं था. घोड़े, पालकी या पैदल ही सफर पूरा करना होता था. ऐसे समय में ब्रिटिश इंजीनियरों ने पहाड़ों के बीच रास्‍ता बनाते हुए एक ऐसी छोटी रेल लाइन बनाई, जिसने पूरी यात्रा का अनुभव ही बदल दिया. करीब 88 किलोमीटर लंबा यह रेल मार्ग सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग का ऐसा कमाल बना, जिसे देखकर दुनिया हैरान रह गई. घुमावदार ट्रैक, जिग-जैक लूप और बादलों के बीच गुजरती यह ट्रेन धीरे-धीरे दार्जिलिंग की पहचान बन गई. समय बदला, तकनीक बदली, लेकिन टॉय ट्रेन की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई. आज 145 साल बाद भी यह दुनिया की सबसे खूबसूरत पर्वतीय रेल यात्राओं में गिनी जाती है. हर साल लाखों पर्यटक सिर्फ इससे सफर करने दार्जिलिंग पहुंचते हैं.

  1. 4 जुलाई 1881 को हुई एक नई शुरूआत
    4 जुलाई 1881 को सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की शुरुआत हुई थी. यह भारत की पहली सफल पर्वतीय रेल परियोजनाओं में शामिल थी. छोटी लाइन पर चलने वाली इस ट्रेन ने लोगों का सफर काफी आसान बना दिया. पहले जहां पहाड़ों तक पहुंचने में कई दिन लग जाते थे, वहीं ट्रेन ने यात्रा को तेज, सुरक्षित और आरामदायक बना दिया.
  2. पहाड़ों की लाइफलाइन बनी यह टॉय ट्रेन
    शुरुआत में टॉय ट्रेन सिर्फ घूमने के लिए नहीं थी. यह दार्जिलिंग के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई. चाय, सब्जियां, जरूरी सामान और डाक इसी ट्रेन से पहुंचाई जाती थी. स्कूल, अस्पताल और बाजार जाने वाले हजारों लोग भी इसी ट्रेन पर निर्भर थे. धीरे-धीरे यह पूरे इलाके की लाइफलाइन बन गई.
  3. इंजीनियरिंग का कमाल आज भी है मिसाल
    दार्जिलिंग तक सीधी रेल लाइन बिछाना आसान नहीं था. इंजीनियरों ने जिग-जैक रिवर्सल और लूप जैसी तकनीक अपना कर इस ट्रेन को सफल बनाया. ट्रेन कई जगह आगे-पीछे होकर ऊंचाई चढ़ती है. बिना बड़े पुलों और लंबी सुरंगों के पहाड़ों पर रेल पहुंचाना उस दौर की बड़ी उपलब्धि थी. आज भी इंजीनियर इस प्रोजेक्‍ट को अद्भुत मानते हैं.
  4. भाप के इंजन ने बनाई अलग पहचान
    टॉय ट्रेन की सबसे बड़ी पहचान उसका स्टीम इंजन है. इंजन की सीटी, धुएं के गुबार और धीमी रफ्तार आज भी लोगों को सौ साल पुरानी दुनिया का एहसास कराते हैं. समय के साथ डीजल इंजन भी आए, लेकिन खास मौकों और पर्यटन के लिए आज भी भाप वाले इंजन चलाए जाते हैं. यही इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है.
  5. दुनिया ने भी माना इसका लोहा
    दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की अनोखी इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए 1999 में इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दिया. इसके बाद इसकी पहचान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरी दुनिया में बढ़ गई. आज विदेशी पर्यटक भी इस ऐतिहासिक ट्रेन का सफर करने खास तौर पर दार्जिलिंग पहुंचते हैं.
  1. मुश्किलें आईं पर कभी नहीं रुका सफर
    145 साल के सफर में टॉय ट्रेन ने कई चुनौतियां देखीं. भूस्खलन, भारी बारिश, बाढ़ और कई बार ट्रैक को नुकसान पहुंचा. कुछ समय के लिए सेवाएं भी प्रभावित हुईं. इसके बावजूद रेलवे ने हर बार ट्रैक को दोबारा तैयार किया और ट्रेन फिर पटरी पर लौट आई.
  2. फिल्मों और पर्यटन की बनी स्टार
    टॉय ट्रेन ने सिर्फ यात्रियों का दिल नहीं जीता, बल्कि फिल्मों और टीवी की दुनिया में भी खास जगह बनाई. इसकी खूबसूरत वादियां, पहाड़ी रास्ते और स्टीम इंजन कई भारतीय और विदेशी फिल्मों में दिखाई दिते हैं. सोशल मीडिया के दौर में भी यह सबसे ज्यादा फोटो और वीडियो बनाई जाने वाली ट्रेनों में शामिल है.
  3. दार्जिलिंग की अर्थव्यवस्था को मिला सहारा
    टॉय ट्रेन ने दार्जिलिंग के पर्यटन उद्योग को नई पहचान दी. हर साल लाखों पर्यटक सिर्फ इस ट्रेन का सफर करने आते हैं. इससे होटल, टैक्सी, रेस्टोरेंट, चाय उद्योग और स्थानीय कारोबार को भी बड़ा फायदा होता है. यानी यह ट्रेन सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी का भी अहम जरिया है.
  4. आज भी वैसा ही रोमांच देता है सफर
    करीब 88 किलोमीटर की यात्रा में ट्रेन जंगलों, चाय बागानों, पहाड़ों और बादलों के बीच से गुजरती है. रास्ते में बतासिया लूप, घूम स्टेशन और कई खूबसूरत पड़ाव आते हैं. धीमी रफ्तार होने के बावजूद यही सफर इसकी सबसे बड़ी पहचान है. लोग मंजिल से ज्यादा रास्ते का आनंद लेने के लिए इसमें बैठते हैं.
  5. 145 साल बाद भी जिंदा है विरासत
    1881 में शुरू हुआ यह सफर आज 145 साल बाद भी पूरी शान से जारी है. नई ट्रेनें भले ही तेज हों, लेकिन टॉय ट्रेन का अनुभव बिल्कुल अलग है. यह सिर्फ एक रेल यात्रा नहीं, बल्कि भारत की विरासत, इंजीनियरिंग और इतिहास को करीब से महसूस करने का मौका है. शायद यही वजह है कि इसकी लोकप्रियता आज भी पहले जैसी बनी हुई है.

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन का सफर कहां से कहां तक होता है?
दार्जिलिंग टॉय ट्रेन का पूरा सफर न्यू जलपाईगुड़ी (NJP) से दार्जिलिंग तक करीब 87.48 किलोमीटर का है. यह ट्रेन मैदानों से निकलकर घने जंगलों, चाय बागानों और पहाड़ों के बीच से गुजरती है. रास्ते में कई घुमावदार ट्रैक, लूप और खूबसूरत घाटियां देखने को मिलती हैं. यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे खूबसूरत रेल यात्राओं में गिना जाता है.

टॉय ट्रेन किन-किन स्टेशनों से होकर गुजरती है?
यह ट्रेन न्यू जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी जंक्शन, सुकना, रंगटोंग, तीनधरिया, गयाबारी, महानदी, कुर्सियांग, टुंग, सोनादा, घूम और आखिर में दार्जिलिंग पहुंचती है. हर स्टेशन की अपनी अलग पहचान है. कहीं घने जंगल मिलते हैं तो कहीं चाय के बागान, बादल और पहाड़ यात्रियों का स्वागत करते हैं.

रास्ते में कौन-कौन से प्रमुख पर्यटन स्थल देखने को मिलते हैं?
टॉय ट्रेन के सफर में महानंदा वन्यजीव अभयारण्य, दार्जिलिंग के मशहूर चाय बागान, कुर्सियांग का पहाड़ी बाजार, बतासिया लूप, घूम रेलवे म्यूजियम और साफ मौसम में कंचनजंगा की बर्फीली चोटियां देखने को मिलती हैं. इन जगहों की वजह से यह सफर सिर्फ ट्रेन यात्रा नहीं, बल्कि एक शानदार पर्यटन अनुभव बन जाता है.

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन इतनी खास क्यों मानी जाती है?
दार्जिलिंग टॉय ट्रेन सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि 145 साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत है. 4 जुलाई 1881 को शुरू हुई इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत इसकी अनोखी इंजीनियरिंग है. पहाड़ों पर बने जिग-जैक ट्रैक, लूप, स्टीम इंजन और बादलों के बीच से गुजरने वाला सफर इसे दुनिया की सबसे अनोखी पर्वतीय रेल यात्राओं में शामिल करता है. इसी वजह से इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा भी मिला है.

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Anoop Kumar MishraAssistant Editor

Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें



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