नई दिल्ली: चांद की सतह पर एक ऐसी दुर्लभ गैस मौजूद है जो आने वाले समय में पूरी दुनिया की टेक्नोलॉजी को बदल सकती है. इस गैस का नाम हीलियम-3 है और इसकी कीमत आसमान छू रही है. इंटरनेशनल मार्केट में इसके एक लीटर की कीमत 2,000 डॉलर यानी करीब 1.89 लाख रुपये से ज्यादा हो चुकी है. हीलियम-3 की इस भारी कीमत और उपयोगिता के कारण पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और स्पेस स्टार्टअप्स के बीच इसे हासिल करने की रेस शुरू हो गई है. यह रेयर गैस क्वांटम कंप्यूटिंग और सुपरकूलिंग जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी के लिए बहुत जरूरी मानी जा रही है. भविष्य में बनने वाले न्यूक्लियर फ्यूजन प्लांट्स के लिए भी यह ईंधन का काम करेगी. पृथ्वी पर इसकी भारी कमी होने के कारण अब प्राइवेट कंपनियां इसे चांद से निकालने की प्लानिंग कर रही हैं. अमेरिकी स्पेस स्टार्टअप्स इसके लिए खास तरह की मशीनें और रोवर तैयार कर रहे हैं.
सामान्य हीलियम से कितनी अलग है हीलियम-3 गैस?
हीलियम-3 असल में हीलियम गैस का ही एक बहुत खास और रेयर आइसोटोप है. आम लोगों को इसके बारे में बहुत कम जानकारी है. सामान्य हीलियम के मुकाबले इसके एटॉमिक न्यूक्लियस में एक न्यूट्रॉन कम होता है. यही छोटी सी भिन्नता इसे बेहद खास और उपयोगी बनाती है.
आज की दुनिया में हीलियम-3 का ज्यादातर हिस्सा न्यूक्लियर वेपन्स के स्टॉकपाइल से मिलता है. वहां ट्रिटियम के डिके होने की न्यूक्लियर रिएक्शन से यह गैस बनती है. पृथ्वी पर इसकी मात्रा इतनी कम है कि डिमांड पूरी नहीं हो पाती है. इसी वजह से वैज्ञानिक इसके नए सोर्स तलाश रहे हैं.
क्वांटम कंप्यूटिंग में क्यों जरूरी है यह रेयर गैस?
- वैज्ञानिक अपनी रिसर्च में हीलियम-3 का बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं. इसकी यूनिक प्रॉपर्टीज के कारण यह एडवांस साइंस के लिए वरदान है.
- क्वांटम कंप्यूटर्स को काम करने के लिए बहुत ही कम तापमान की जरूरत होती है. हीलियम-3 इन कंप्यूटर्स को सुपरकूलिंग देने में सबसे कारगर साबित होती है.
- इसके अलावा डार्क मैटर की खोज और पार्टिकल फिजिक्स के एक्सपेरिमेंट में भी इसका यूज होता है. आने वाले समय में क्वांटम कंप्यूटिंग का चलन बहुत तेजी से बढ़ने वाला है.
- वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एक बड़े क्वांटम कंप्यूटर को चलाने के लिए हजारों लीटर हीलियम-3 की जरूरत होगी. वर्तमान प्रोडक्शन क्षमता इस डिमांड को पूरा करने में बिल्कुल असमर्थ है.
चांद की मिट्टी से कैसे होगी हीलियम-3 की माइनिंग?
पृथ्वी पर कमी के कारण अब वैज्ञानिकों की नजर चांद की सतह पर टिक गई है. नासा के अपोलो मिशन के दौरान लाए गए सैंपल्स से चौंकाने वाली बात सामने आई थी. चांद की सबसे ऊपरी परत को रेगोलिथ कहा जाता है. इसी मिट्टी में हीलियम-3 भारी मात्रा में मौजूद है.
अरबों सालों से सोलर विंड के पार्टिकल्स चांद की सतह से टकरा रहे हैं. इसी प्रोसेस के कारण हीलियम-3 वहां की मिट्टी में जमा हो गई है. हालांकि चांद से इसे निकालना कोई आसान काम नहीं है. रिसर्च के मुताबिक हीलियम-3 वहां बहुत ही कम कंसंट्रेशन में मौजूद है. एक किलोग्राम हीलियम-3 पाने के लिए लाखों टन चांद की मिट्टी को प्रोसेस करना पड़ सकता है.
कौन सी कंपनियां लगा रही हैं अरबों डॉलर का दांव?
- इस रेयर गैस को लाने के लिए कुछ बड़ी प्राइवेट कंपनियां चांद पर माइनिंग की तैयारी में जुट गई हैं. सिएटल की इंटरल्यून कंपनी इस रेस में सबसे आगे चल रही है. इस कंपनी को अपोलो 17 के एस्ट्रोनॉट हैरिसन श्मिट और ब्लू ओरिजिन के पूर्व प्रेसिडेंट ने मिलकर शुरू किया है. यह कंपनी चांद की मिट्टी से हीलियम-3 निकालने के लिए स्पेशल इक्विपमेंट्स बना रही है.
- इंटरल्यून चांद पर ऑटोनॉमस एक्सकेवेटर यानी खुद चलने वाली खुदाई मशीनें भेजने का प्लान कर रही है. यह मशीनें वहां की मिट्टी को इकट्ठा करके गर्म करेंगी जिससे उसमें फंसी हीलियम-3 गैस बाहर निकल आएगी. कंपनी ने दावा किया है कि ‘वे 2027 तक इस टेक्नोलॉजी का टेस्ट करने के लिए चांद पर मिशन भेज सकते हैं’.
- इसके अलावा एस्ट्रोटेक कॉर्पोरेशन भी स्पेस एक्स के स्टारशिप मिशन के जरिए वहां माइनिंग इक्विपमेंट भेजने की तैयारी कर रही है. इंटरल्यून ने एक क्वांटम कंप्यूटिंग कंपनी के साथ अगले दस साल के लिए 300 मिलियन डॉलर की सप्लाई का एग्रीमेंट भी साइन कर लिया है.
क्या पृथ्वी पर ही मिल सकता है इसका कोई विकल्प?
चांद से माइनिंग करने और उसे पृथ्वी पर लाने में बहुत बड़ा इन्वेस्टमेंट और भारी इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए. कुछ क्रिटिक्स का मानना है कि चांद पर जाने के बजाय पृथ्वी पर ही इसके सोर्स ढूंढना ज्यादा समझदारी होगी. पुर्तगाल की पल्सर हीलियम नाम की कंपनी अमेरिका के मिनेसोटा में हीलियम-3 के डिपॉजिट्स की जांच कर रही है.
रिसर्चर्स का कहना है कि ट्रेडिशनल ड्रिलिंग टेकनीक से भी पृथ्वी के अंदर से इस आइसोटोप को निकाला जा सकता है. इसके लिए चांद पर जाने की कोई जरूरत नहीं होगी. दूसरी तरफ कुछ वैज्ञानिक ऐसी अल्टरनेटिव कूलिंग टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहे हैं जिसमें हीलियम-3 की जरूरत ही न पड़े.
हालांकि इन सब के बावजूद चांद की हीलियम-3 में लोगों का इंटरेस्ट लगातार बढ़ रहा है. क्लीन एनर्जी और एडवांस कंप्यूटिंग के दौर में यह गैस स्पेस इंडस्ट्री का सबसे बड़ा खजाना बनती जा रही है.




