Donald Trump Iran Deal | Donald Trump News: ट्रंप बनाम ओबामा: क्या ईरान पर नई डील JCPOA की वापसी है? जानिए पूरा मामला


Donald Trump News: अमेरिकी राजनीति में शायद ही कोई मुद्दा ऐसा रहा हो जिस पर डोनाल्ड ट्रंप ने बराक ओबामा की उतनी तीखी आलोचना की हो, जितनी 2015 की ईरान परमाणु डील को लेकर की थी. ट्रंप ने उस समय जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) को ‘अमेरिका के इतिहास की सबसे खराब डील’ बताया था. 2018 में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इसी समझौते से अमेरिका को बाहर निकालकर अपनी सबसे बड़ी विदेश नीति उपलब्धियों में शामिल किया था. लेकिन अब हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि ईरान के साथ नए समझौते की कोशिशों में ट्रंप को उसी मॉडल का सहारा लेना पड़ सकता है, जिसे उन्होंने कभी पूरी दुनिया के सामने नाकाम और खतरनाक करार दिया था. यही वजह है कि अमेरिका में राजनीतिक बहस तेज हो गई है. सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप वास्तव में नई और मजबूत डील बना रहे हैं या फिर सिर्फ पुराने समझौते को नए पैकेज में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार दिलचस्प बात यह है कि ईरान के साथ चल रही मौजूदा बातचीत के कई बिंदु सीधे तौर पर JCPOA की याद दिलाते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्तावित समझौते में युद्धविराम बढ़ाने, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नई वार्ता शुरू करने जैसी शर्तें शामिल हैं. ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान अगले 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन न करे और कभी परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी दे. हालांकि तेहरान अब भी इस मांग को खारिज कर रहा है. ऐसे में ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ईरान नहीं, बल्कि अपने ही पुराने बयानों से पैदा हुई राजनीतिक मुश्किलें भी हैं.

सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि ट्रंप की संभावित डील ओबामा के JCPOA से बेहतर है. (Reuters File)

पहले ओबामा की डील पर हमला, अब उसी रास्ते पर वापसी?

  • डोनाल्ड ट्रंप जब पहली बार राष्ट्रपति बने थे, तब उन्होंने दावा किया था कि ओबामा प्रशासन ने ईरान के सामने घुटने टेक दिए हैं. उनका कहना था कि 2015 की डील ने तेहरान को अरबों डॉलर दिए और बदले में अमेरिका को कुछ खास हासिल नहीं हुआ. इसी सोच के तहत उन्होंने 2018 में अमेरिका को JCPOA से बाहर निकाल लिया.
  • लेकिन उस फैसले के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को और तेज कर दिया. 2015 की डील के तहत ईरान केवल 3.67 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन कर सकता था और उसके भंडार की सीमा 300 किलोग्राम तय थी. आज ईरान 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम जमा कर चुका है, जो हथियार-ग्रेड स्तर के काफी करीब माना जाता है.

क्या था ओबामा का JCPOA समझौता?

2015 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन ने ईरान के साथ JCPOA पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना था.

डील के तहत ईरान ने अपने अधिकांश सेंट्रीफ्यूज हटाने, यूरेनियम संवर्धन सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को व्यापक निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई थी. इसके बदले अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र ने कई आर्थिक प्रतिबंध हटा दिए थे.

ट्रंप की नई डील कितनी अलग है?

रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप प्रशासन जिस नए समझौते पर काम कर रहा है, उसमें 60 दिन का अतिरिक्त युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से बातचीत शामिल है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा ढांचा काफी हद तक JCPOA से मिलता-जुलता है. लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंड्रयू मोरन ने कहा, ‘ट्रंप इस बात को लेकर बेहद चिंतित होंगे कि उनकी डील की तुलना ओबामा की डील से की जाएगी, क्योंकि JCPOA को खत्म करना उनके पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान थी.’

विशेषज्ञ क्यों कह रहे हैं- कहानी फिर वहीं पहुंच गई?

यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के एसोसिएट प्रोफेसर मार्क शनाहन का मानना है कि वर्तमान वार्ता का पूरा ढांचा ओबामा युग की डील पर आधारित नजर आता है. उन्होंने कहा, ‘ट्रंप की डील काफी हद तक JCPOA जैसी दिख रही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की बात हो रही है.’ उनका कहना है कि अगर नई डील में ईरान को प्रतिबंधों से राहत और जमे हुए अरबों डॉलर तक पहुंच मिलती है, तो ट्रंप के लिए यह समझाना मुश्किल होगा कि यह समझौता पुराने समझौते से कैसे बेहतर है.

दोनों समझौतों का मूल उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करना है.

होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?

  • दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और ऊर्जा आपूर्ति का रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. हालिया तनाव के बाद ईरान ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है.
  • विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान इस समुद्री मार्ग पर अतिरिक्त नियंत्रण हासिल कर लेता है, तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर उसका प्रभाव बढ़ सकता है. इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया में महंगाई और ईंधन कीमतों पर दिखाई दे सकता है.

ट्रंप को अपने ही समर्थकों का विरोध

नई डील को लेकर ट्रंप को केवल डेमोक्रेट्स ही नहीं, बल्कि अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. अमेरिकी सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि यदि ईरान को अरबों डॉलर मिलते हैं, यूरेनियम संवर्धन जारी रहता है और वह होर्मुज पर प्रभाव बनाए रखता है, तो यह ‘विनाशकारी गलती’ होगी.

यही वजह है कि ट्रंप पर दबाव है कि वह ऐसी डील पेश करें जो कम से कम राजनीतिक रूप से JCPOA से ज्यादा मजबूत दिखाई दे.

अब्राहम एकॉर्ड्स से क्या हासिल करना चाहते हैं ट्रंप?

  • ट्रंप ने ईरान वार्ता को अब्राहम एकॉर्ड्स के विस्तार से भी जोड़ने की कोशिश की है. उन्होंने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन, बहरीन, तुर्किये और यूएई जैसे देशों से इस ढांचे में शामिल होने की अपील की.
  • ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘मैंने इन देशों के नेताओं से कहा कि अमेरिका ने इस जटिल पहेली को सुलझाने के लिए जो काम किया है, उसके बाद कम से कम इन सभी देशों को एक साथ अब्राहम एकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करना चाहिए.’
  • हालांकि क्षेत्रीय देशों की ओर से इस प्रस्ताव को ज्यादा समर्थन नहीं मिला है. पाकिस्तान ने तो कथित तौर पर इस विचार को सीधे खारिज कर दिया.

JCPOA क्या था?

JCPOA यानी जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन 2015 में ईरान और छह विश्व शक्तियों के बीच हुआ परमाणु समझौता था. इसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना और बदले में आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देना था.

ट्रंप ने इस डील का विरोध क्यों किया था?

ट्रंप का मानना था कि यह समझौता ईरान के लिए बहुत नरम था. उनका आरोप था कि इससे ईरान को अरबों डॉलर मिले, जबकि उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर स्थायी रोक नहीं लगी.

नई डील और JCPOA में क्या समानता है?

दोनों समझौतों का मूल उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करना है. प्रतिबंधों में राहत, परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय निगरानी जैसे कई तत्व दोनों में समान दिखाई देते हैं.

होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

दुनिया की बड़ी ऊर्जा आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है. यहां किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक तेल कीमतों और व्यापार पर सीधा असर डाल सकता है.

ट्रंप के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती क्या है?

सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि उनकी संभावित डील ओबामा के JCPOA से बेहतर है. अगर दोनों समझौतों में ज्यादा समानता दिखती है तो ट्रंप को अपने पुराने बयानों के कारण आलोचना का सामना करना पड़ सकता है.



Source link

Latest articles

spot_imgspot_img

Related articles

spot_imgspot_img