‘अगर मैं किंग से अलग से बात करूँ, तो मैं शायद उन्हें कोहिनूर हीरा वापस करने के लिए के उत्साहित करुंगा.” न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के बयान भारत समेत पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है. यह बयान न्यूयॉर्क में 9/11 मेमोरियल में होने वाले समारोह को लेकर दिया है. ममदानी से पूछा गया था कि वह किंग चार्ल्स को क्या संदेश देंगे.
ब्रिटेन के किंग चार्ल्स III और क्वीन कैमिला न्यूयॉर्क में हैं. उनको बुधवार को वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जाने का कार्यक्रम है. वे यहां 11 सितंबर, 2001 के हमलों की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर पहुंचे हैं. इस हमले में लगभग 3 हजार लोगों की जान चली गई थी. इनमें 67 ब्रिटिश नागरिक भी शामिल थे.
कोहिनूर भारत से ब्रिटेन ले गए थे अंग्रेज
साल 1849 में हुए दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के बाद संधि हुई थी. इसमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हीरे पर कब्जा कर लिया था. इस पर महाराजा दलीप सिंह ने हस्ताक्षर किए थे. उस समय उनकी उम्र केवल 10 साल थी. उस समय ये हीरा 186 कैरेट का था. आज 105.6 कैरेट का यह हीरा ‘क्वीन एलिजाबेथ द क्वीन मदर’ के क्राउन का हिस्सा है. इसे टावर ऑफ लंदन में रखा गया है.
कोहिनूर हीरा कहां से निकाला गया इसे लेकर सटीक जानकारी नहीं है. अलग-अलग स्त्रोत बताते हैं कि इसे भारत के दक्षिणी भाग गोलकुंडा या कोल्लूर की खानों से निकाला गया. इसके शुरुआती इतिहास को लेकर कुछ मिथक हैं. मुगल काल से इसके दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध हैं.
मुगलों के पास भी रहा कोहिनूर
सोलहवीं शताब्दी में बाबर ने दिल्ली और आगरा की जीक लिया था. इसके बाद इस ग्वालियर के राजाओं ने इसे उन्हें भेंट किया. बाबर के बाद ये हुमायूं के पास चला गया. बाद में ये मुगल सम्राटों जैसे अकबर, जहांगीर और शाहजहां के खजाने में रहा. शाहजहां के मोर सिंहासन पर ये मुख्य रत्न के रूप में सजाया गया था.
समय बदला, 17वीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में मुगल साम्राज्य के कमजोर हो गया. साल 1739 में फारसी आक्रमणकारी नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया. मुगल खजाने को लूट लिया. इसमें मोर सिंहासन से कोहिनूर भी शामिल था. नादिर शाह ने इसे अपनी पगड़ी में लगाया. नादिर शाह की हत्या के बाद यह उसके उत्तराधिकारियों के पास गया. अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली के हाथ लगा. अफगानिस्तान में भी यह अलग-अलग शासकों के पास रहा. अफगानी शासक शाह शुजा दुर्रानी के बाद पहुंच गया जो अफगान शासक था.
रणजीत सिंह के लिए खास था कोहिनूर
शाह शुजा ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की शरण ली. बदले में उन्हें कोहिनूर हीरा दे दिया. महाराजा रणजीत सिंह ने खास महत्व दिया. इसे अपनी बाजू पर बंधे आभूषण में पहना. रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य में उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई. इसी बीच उनके नाबालिग बेटे महाराजा दलीप सिंह सिंहासन पर बैठे. साल 1839 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को पंजाब में कड़ी टक्कर मिली. साल 1849 की संधि में ये ब्रिटेन के पास चला गया और तब से उन्हीं के पास है.
इसे भारत को लौटाने की पहली चर्चा नहीं है. इससे पहले भी समय-समय पर इसे लौटाने को लेकर बातें होती रही है. वहीं इसी पर ब्रिटेन का कहना है कि यह लूट या जबरन छीना नहीं गया है.यह युद्ध के बाद की शांति संधि के तहत उनके पास आया है.
ब्रिटेन के क्या हैं तर्क
ब्रिटेन की तरफ से यह भी तर्क दिया जाता है है कि कोहिनूर का इतिहास काफी विवादित है. कई देश जैसे भारत, पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान इसके मालिक होने का दावा करते हैं. इसलिए इसे किसी एक देश को लौटाना अन्य दावेदारों के साथ अन्याय होगा.
ब्रिटिश अधिकारी कहते हैं कि कोहिनूर अब ब्रिटिश इतिहास और साम्राज्य की विरासत का हिस्सा बन चुका है. टावर ऑफ लंदन में प्रदर्शित होकर लाखों पर्यटकों को लुभाता है. इसे वापस किया गया तो इससे क्राउन ज्वेल्स और अन्य ऐतिहासिक वस्तुओं की वापसी के लिए खतरनाक मिसाल कायम होगी जो सैकड़ों सालों से ब्रिटेन में हैं.
ममदानी इसे भारत को देने के पक्ष में क्यों
ममदानी के दक्षिण एशिया और अफ्रीका के साथ संबंध हैं. ममदानी की मां मीरा नायर भारत में पैदा हुई थीं. बाद में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चली गईं. उन्होंने अपने जीवन का एक हिस्सा पिता महमूद ममदानी के साथ युगांडा में भी बिताया.





