ईरान से पंगा पड़ा भारी: ट्रंप के चलते अपने ही घर की राख समेटने में जुटा अमेरिका
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ईरान के साथ युद्ध की जिद अमेरिका पर ही भारी पड़ रही है. आसमान छूती तेल की कीमतों और ‘डिमांड डिस्ट्रक्शन’ ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है. जानिए कैसे दूसरों का घर जलाने चला अमेरिका अब खुद तबाही की कगार पर है.”
‘डिमांड डिस्ट्रक्शन’ ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है. (Image – AI)
ईरान के खिलाफ युद्ध का जो चक्रव्यूह अमेरिका ने रचा था, अब उसकी आग खुद व्हाइट हाउस तक पहुंच गई है. दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं को घुटनों पर लाने की चाहत में अमेरिका ने अपनी ही जनता की कमर तोड़ दी है. डिमांड डिस्ट्रक्शन (Demand Destruction) के जिस दौर से आज अमेरिका गुजर रहा है, वह संकेत है कि अगर यह टकराव जल्द खत्म नहीं हुआ, तो सुपरपावर की तबाही पर आखिरी मुहर लगनी तय है.
सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में जबरदस्त ‘डिमांड डिस्ट्रक्शन’ (Demand Destruction) उभरकर सामने आ रहा है. यह सिर्फ एक इकॉनमिक टर्म नहीं है, बल्कि अमेरिकी पतन की आहट है. पेट्रोल और गैस की कीमतें इतनी बेकाबू हो चुकी हैं कि अमेरिकी नागरिकों ने अब हार मानकर अपनी जरूरतों का गला घोंटना शुरू कर दिया है. जब लोग महंगाई से तंग आकर ईंधन का इस्तेमाल ही बंद कर दें, तो समझ लीजिए कि उस देश का आर्थिक इंजन सीज होने वाला है. देखा जाए तो अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए जो युद्ध थोपा, यह उसका ही एक घातक परिणाम है.
आम अमेरिकी की मेहनत की कमाई और टैक्स की बचत अब विकास के काम नहीं आ रही, बल्कि तेल के भारी-भरकम बिलों की भेंट चढ़ रही है. स्थिति यह है कि जिनके पास बचत कम बची है, और उनके घरों में अब चूल्हा जलना भी दूभर हो गया है.
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज: अमेरिका की दुखती रग
ईरान के साथ तनाव बढ़ाकर अमेरिका ने खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में तेल के टैंकरों का फंसना सीधे तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नब्ज रुकने जैसा है. आरएसएम यूएस (RSM US) के मुख्य अर्थशास्त्री जो ब्रुसेला ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पास अब समय बहुत कम बचा है. अगर ईरान के साथ युद्ध की जिद जारी रही, तो समुद्री रास्तों की बंदी अमेरिका को पूरी तरह ठप कर देगी.
तबाही का चक्र: महंगाई से बेरोजगारी तक
अमेरिका ने जो युद्ध शुरू किया, वह अब एक खौफनाक ‘चेन रिएक्शन’ बन चुका है-
- अतिरिक्त टैक्स की मार: ईंधन की बढ़ती कीमतें हर अमेरिकी परिवार के लिए एक अनचाहे ‘वॉर टैक्स’ की तरह हैं.
- बाजार में सन्नाटा: जब पैसा तेल में जा रहा है, तो लोग फ्रिज, कार और मकान जैसी चीजों से मुंह मोड़ रहे हैं. इससे कंपनियों का मुनाफा गिर रहा है.
- छंटनी का दौर: बिक्री घटने और माल ढुलाई महंगी होने के कारण अमेरिकी कंपनियां अब बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को निकाल रही हैं.
- ब्याज दरों का बोझ: फेडरल रिजर्व महंगाई काबू करने के नाम पर ब्याज दरें बढ़ा सकता है. यदि ऐसा हुआ तो कर्ज लेना आम आदमी और बिजनेसमैन की पहुंच से बाहर हो जाएगा.
क्या यही है ट्रंप साम्राज्य का अंत?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की इस युद्ध वाली नीति ने लोगों के जीने का ढंग बदल दिया है. लोग अब मजबूरन पेट्रोल गाड़ियां छोड़ रहे हैं और घरों में कैद होकर ‘वर्क फ्रॉम होम’ तलाश रहे हैं. ऑक्सफोर्ड इकॉनमिक्स की नैन्सी वैंडेन हाउटन के अनुसार, सारा दारोमदार इस बात पर है कि ईरान विवाद कब सुलझता है. यदि समुद्री रास्ते नहीं खुले, तो तबाही को कोई नहीं रोक पाएगा.
मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड ओर्टेगा ने एक और डरावनी चेतावनी दी है. तेल के साथ-साथ खाद (Fertilizer) की कमी अब अमेरिका के खेतों को सुखाएगी, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम इतने बढ़ेंगे कि आम आदमी के पास ‘सरवाइव’ करने का भी रास्ता नहीं बचेगा.
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मलखान सिंह पिछले 17 वर्षों से ख़बरों और कॉन्टेंट की दुनिया में हैं. प्रिंट मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई नामी संस्थानों का नाम प्रोफाइल में जुड़ा है. लगभग 4 साल से News18Hindi के साथ काम कर रहे …और पढ़ें





