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Rajasthan Villages Water Crisis; India Pakistan Border Area | Barmer | राजस्थान के वो गांव,जहां पानी का हिसाब भी बही-खातों में: 250 साल पुराने कुओं से बुझ रही प्यास, लोग कहते हैं- घी-सोने से भी कीमती है पानी – Jaipur News

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सीमा पर यूं तो सबसे बड़ा खतरा दुश्मन से जंग का रहता है, लेकिन देश के सबसे गर्म इलाकों में सैकड़ों गांवों की असली जंग पानी के लिए है। यहां पड़ोसी को इंसान पर लोग घी देने को तैयार हैं, लेकिन पानी की एक बूंद नहीं। पानी यहाँ राँची के

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भास्कर रिपोर्टर भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के उन गांवों तक पहुंचे, जहां पड़ोसी कभी पानी की मटका उधार मांगता तो उसका मिसलीया बही खाते में लिखा जाता था। यहां लोग 250 साल पुराने सबसे अनोखे और छोटे कुओं (राजस्थान में कहे गए बेरी) के पानी से अपनी प्यास बुझा रहे हैं। सूरज उगने पर इन कुओं का पानी पाताल में चला जाता है।

पानी चोरी का खतरा ऐसा है कि घर के लोग रातभर जागकर पहरेदार रहते थे। अब बड़े-बड़े पर्चे छपाए गए हैं। गांव के किसी घर में बेटी पैदा होती है, तो बड़ी होती ही उसे इन कुओं से पानी निकालने की खास ट्रेनिंग दी जाती है।

भारत-पाक बॉर्डर से सटे उन गांवों से पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट- जहां एक-एक बूंद अनमोल है…

ये गांव बाड़मेर जिले में पाकिस्तान सीमा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही हैं।

ये गांव बाड़मेर जिले में पाकिस्तान सीमा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही हैं।

बेडरूम से मुनाबाव की तरफ जाते हैं तो रामसर, देरासर, पादरिया, रोहिड़ी, गरडिया, सेलु, हिंडिया, सज्जन का पर, आभे का पर जैसे सैकड़ों छोटे-छोटे गांव आते हैं। बंटवारे के समय पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये लोग यहां डेरा जमाया था। इन गांवों की सीमा कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। हम सबसे पहले रामसर गांव में रिहा हुए जहां शर्मिल से हमारी बात हुई। उनके हाथ और पैर की अंगुलियाँ कटी हुई थीं। वे पूरी दास्तां पर…

चलती ट्रेन से पानी भरते थे, किसी का हाथ कटा कोई मर गया

60 वर्षीय शर्मल जैन ने बताया कि 1970 के दशक में पानी से भरी ट्रेन होती थी। ट्रेन महज पांच मिनट के लिए रुकी थी। आस-पास के गांवों के 100 से ज्यादा लोग मटकियां लेकर ट्रेन का इंतजार करते थे।

शेरमल जैन को पानी के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी।

शेरमल जैन को पानी के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी।

मैं उस समय 18 साल का था। एक बार चेचेरे भाई और थकान के साथ ट्रेन से पानी भर गया था। ट्रेन की गति धीमी होती ही मैं बोगी के ऊपर चढ़ती और मटकों में पानी भरकर नीचे खड़ी चादर को पकड़ता रहा था। कई दूसरे यूट्यूबर भी ट्रेन पर चढ़े हुए थे। वहां रहने की जगह नहीं थी। अचानक ट्रेन चल पड़ी और मेरा बैलेंस बिगड़ गया।

पटरी पर गिरते ही ट्रेन का पहिया मेरे हाथ और पैर के ऊपर से निकल गया। मेरा पूरा शरीर फिर से ट्रेन के पहाड़ में फंस गया, उससे पहले ही मेरी पीठ और भाई ने मुझे खींचकर बाहर निकाल दिया। जान तो बच गई, लेकिन डॉक्टर को मेरे एक हाथ और पैर की अंगुलियाँ काटनी पड़ीं। पानी के लिए मैंने कई लोगों की मौत भी देखी है। शर्मल ने बताया कि आप गांव के अंदर जाकर पानी की एक बूंद की कीमत आपको याद होगी।

गांव रामसर में 250 साल पुराने इन छोटे कुओं को बेरी कहा जाता है।  गांव में उनकी संख्या 100 के करीब है।

गांव रामसर में 250 साल पुराने इन छोटे कुओं को बेरी कहा जाता है। गांव में उनकी संख्या 100 के करीब है।

250 साल पुराने मीठे पानी के छोटे सोडियम

हम रामसर गांव में आगे बढ़ेंगे तो सरपंच गिरीश खत्री हमें पानी के छोटे-छोटे नमक डालेगे। उन्होंने बताया कि ये 250 साल पुरानी बेरियां (कुएं) हैं। यह एक छोटी सी नमकीन जैसी होती है, जिसे हम बोलचाल की भाषा में कहते हैं। ये बेरीयां किसी वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है। पृष्ठ पहले अनुदान ने मीठे पाने के लिए इनकी खोज की थी। ये वाटर हार्वेस्टिंग यानी बारिश के पानी को छूने का अनोखा तरीका है।

हमारे गांव में ऐसी 100 से ज्यादा बेरीयां बनी हुई हैं। आगे जायेंगे तो लगभग हर गांव में ऐसी ही बेरीयां देखेंगे। ये बेरियां जमीन के अंदर नालियों के मार्गों में जुड़ी हुई हैं। करीब 60 से 70 फीट गहरी बेरियों में बारिश का पानी जमा हो जाता है। इनमें से जो पानी भरा है, उसी से आस-पास के 30 से 40 गांव-ढाणी के लोगों की प्यास बुझती है।

सौंफ से पानी भरने के लिए बड़ी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं, कई बार पान खत्म हो जाता है।

सौंफ से पानी भरने के लिए बड़ी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं, कई बार पान खत्म हो जाता है।

खास बात यह है कि जहां बेरियां बनी होती हैं, वहीं जमीन के अंदर मीठा पानी मिलता है। बेरियों से महज 10 फीट दूर जाने पर भी खुदाई में खारा पानी प्रयोग किया जाता है।

पानी की निगरानी करते थे, अब ताले लगाये गये हैं

बेरीयां वैसे तो सरकारी जमीन पर बनी हैं, लेकिन गांव में रहने वाले हर परिवार ने अपनी-अपनी बेरी पर हक जता रखा है। जो लोग सक्षम होते हैं उन परिवारों की अपनी निजी एक बेरी है। इस बेरी पर वे अपने दादा-परदादा यशस्वी के नाम लिखवाते हैं।

कोई पानी चुराकर नहीं ले जाता इसलिए बेरीज को ताला लगाकर रखा जाता है।

कोई पानी चुराकर नहीं ले जाता इसलिए बेरीज को ताला लगाकर रखा जाता है।

ग्रामीण देवाराम ने बताया कि पहले लोग बेरियों की चौकीदारी करते थे ताकि रात में कोई पानी चुरा न ले जाए। गलती से चौकीदारी करने वाले की नींद लग जाती थी तो उसे खाट समेत वहां से निकले हुए लोग बेरी से पानी चुरा ले जाते थे। अब लोग ट्यूप पहनकर पानी की रखवाली करते हैं।

उधार पानी का ग़लत अर्थ लगाया गया

देवाराम ने बताया कि गांव में अगर किसी के घर पर मेहमान आते थे तो पानी खत्म होने पर पड़ोसी से कर्ज लेकर जाते थे। सारे घड़े पानी उधार ले लिया जाता था और उसे वापस चुकाना पड़ता था। पानी के आटे का ‘मिसाल बाकायदा बही-खातों’ में भी लिखा जाता था।

किसी परिवार ने 5 मटके पानी उधार लिया है तो उसे बहुत ही खाते में कलमबद्ध करते थे। किसी परिवार की बेरी से पानी खत्म हो जाता था तो वह दूसरे परिवार से उधार मांगकर काम करता था। लेकिन पानी को हर कीमत पर चुकाना ही पड़ता था।

सूरज ऊपर आते ही पानी नीचे उतरता

गांव के देवराम ने बताया कि महिलाएं सुबह चार बजे उठकर बेरीयों से पानी भरना शुरू कर देती हैं। क्योंकि सूरज उगने के बाद गर्मी ही इन जामुनों का पानी गायब होकर गहराई में चला जाता है। शाम होने के बाद जब वापस थोड़ी ठंडक होती है तो पानी फिर से ऊपर आने लगता है। ऐसे में सुबह के बाद शाम के समय फिर से महिलाएं पानी से भरी आती हैं।

सूरज जैसे-जैसे ऊपर आता है, पानी का स्तर नीचे होता जाता है।

सूरज जैसे-जैसे ऊपर आता है, पानी का स्तर नीचे होता जाता है।

गांव में पानी पीने के अनोखे तरीके

1.मिट्टी से करते हैं बर्तन साफ

पानी की सबसे ज्यादा कमी है। यहां पीने का पानी पाना मुश्किल है। ऐसे में गांव के लोग बर्तन बालू मिट्टी से साफ करते हैं। मिट्टी से बर्तन साफ ​​करने के बाद उन्हें वापस काम में ले लिया जाता है।

2. जिस पानी से नहाए, उसी से कपड़ा साफ

बच्चों को खाट पर कुत्ते के नीचे रखा जाता है। नहलाने के बाद पानी को टब में इकट्ठा कर लेते हैं। फिर उसी पानी से कपड़े धोते हैं।

3. कपड़े धोने के पानी को साफ कर पिलाते हैं कुत्ते को

कपड़े धोने के बाद पानी को फेंकते नहीं है। वह पानी में फटकरीहा साफ करते हैं। साफ पानी के साथ आधा मीठा पानी और आधा खारा पानी मिक्स करके पिलाते हैं।

रामसर गांव में मौजूद बेरियों से पानी भरने के लिए मीलों लंबा सफर महिलाओं को तय करना पड़ता है।

रामसर गांव में मौजूद बेरियों से पानी भरने के लिए मीलों लंबा सफर महिलाओं को तय करना पड़ता है।

महिलाओं के लिए पानी लाते समय गर्भपात, बच्चियों की हाइट रह जाती है छोटी

65 वर्षीय संजू देवी ने बताया कि पीने, छत, पेड़ के लिए पानी लाने की जिम्मेदारी महिलाओं की होती है। पूरे परिवार के लिए बेरीयों से पानी लाने में कई चक्कर लग जाते हैं। जिस परिवार में गर्भवती महिलाएं होती हैं, उन्हें भी 7 महीने तक पानी लाना पड़ता है।

उन्होंने बताया कि करीब 10 साल पहले सीता के नाम पर एक गर्भवती महिला के शरीर में पानी भर जाने से गर्भपात हो गया था। एक महिला दिनभर में 15 से 20 मटके पानी डालती है। ऐसा लगता है कि उनके सिर, घुटने, कमर में दर्द की बीमारी है। छोटी लड़कियों के सिर पर वजन उठाने से हाईट कम रहती है।

बेटी पैदा होते ही सबसे पहले पानी निकालने की कला सिखाते हैं

एक महिला ने बताया कि बेरियों से पानी भरना काफी जोखिम भरा काम है। मटकियों को रस्सी से बांधकर ढेर सारे बेरी के अंदर बड़ी सावधानी से खड़े होकर पानी निकालना पड़ता है। जरा सा पैर फुलाना तो बाहर जाना मुश्किल है। पहले ऐसे कई हादसे हुए थे, जिनमें महिलाएं बेरी में गिरकर मर गईं।

शादी के बाद बेटी को अपने ससुराल में भी बेरीज से पानी भरना होता है। इसलिए पढ़ाई और घर के काम से पहले बेटियों को पानी भरना सिखाते हैं। महिलाएं पानी से भरी होती हैं तो अपनी बेटियों को साथ लेकर आती हैं ताकि वो हमें देखकर सीख जाएं।

रामसर गांव के सरपंच गिरीश खत्री ने बताया- गर्मियों में पानी की किल्लत और भी बढ़ जाती है, एक-एक बूंद छिड़कती है।

रामसर गांव के सरपंच गिरीश खत्री ने बताया- गर्मियों में पानी की किल्लत और भी बढ़ जाती है, एक-एक बूंद छिड़कती है।

ग्रामीण बोले- यहां घी से भी महंगा पानी

रामसर निवासी 45 वर्षीय धन्ना देवी कहती हैं- पड़ोसी घी मांगता है तो उसे घी दे देंगे लेकिन पानी मांग लिया तो देने में निश्चिंत होते हैं। पानी का बड़ा टैंकर 5 हजार और छोटा टैंकर 1 हजार में आता है। हर महीने 10 हजार से ज्यादा रुपए पानी पर खर्च हो जाते हैं। हम मजदूरी करके केवल कमाते हैं, उसका आधा पैसा पानी लाने में खर्च हो जाता है। बेरी से सिर्फ पीने का पानी मिल जाता है लेकिन गर्मी धोने के लिए, पेड़ के लिए पानी खरीदकर लाना पड़ता है।

सरकारी राशन में प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी देती है

रामसर गांव के सरपंच गिरीश खत्री ने बताया कि बेरियों से जो पानी निकाला जाता है, उससे काम नहीं चल पाता। सरकारी पानी के टैंकरों से महीने में एक बार पानी चलता रहता है। यहां प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी देती है, लेकिन इतना पानी एक परिवार के लिए काफी नहीं होता है।

नर्मदा नहर के पानी से कई गांवों को राहत मिली है। जल जीवन मिशन के तहत पाइप लाइन से 15 दिन में एक बार आने लगा है। इसमें भी पानी कुछ स्थान तक ही दबाव से आता है बाकी स्थान तक ही नहीं मिलता है।

पथरिया गांव में पानी के टैंकर का इंतजार करते ग्रामीण बच्चे एवं ग्रामीण।

पथरिया गांव में पानी के टैंकर का इंतजार करते ग्रामीण बच्चे एवं ग्रामीण।

डीएनपी के कई गांवों में आज भी बिजली, पानी, नेटवर्क नहीं

डीएनपी (डेसर्ट नेशनल पार्क) के कई गांवों में आज भी पानी, बिजली और मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंच पाया है। यह अधिकतर गांव की सीमा के पास हैं। डीएनपी के तीसरे गांव में बिजली, पानी, नेटवर्क आज तक नहीं पहुंचा है। यहां एक रेत का बड़ा टीला है। इस टीले को पार करके लोगों को पानी बेरी से लाना पड़ता है। इतने बड़े टीले को पार करना ही मुश्किल होता है लेकिन आस-पास के गांव के लोग इसे पार करके पानी लाते हैं।



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