1979 की इस्लामी क्रांति ने ईरान को एक धर्मनिरपेक्ष राजशाही से इस्लामी गणराज्य में बदल दिया. शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता उखड़ने के बाद आयतुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आए, जिन्होंने अमेरिका को “ग्रेट सैटन” यानि महान शैतान और इजरायल को “लिटिल सैटन” यानि छोटा शैतान घोषित कर दिया. इसके बाद से ईरान लगातार इन दोनों देशों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता आया है.
ये बदलाव ऐतिहासिक, आइडियोलॉजिकल और भू-राजनीतिक कारणों से हुआ, जिसने क्रांति से पहले के गठबंधनों को उलट दिया. क्रांति से पहले ईरान अमेरिका का प्रमुख सहयोगी था, लेकिन शाह के पतन ने पुरानी कटुता को जन्म दियाअब हम जानेंगे कि किन वजहों से ईरान लगातार अमेरिका और इजरायल को अपना दुश्मन नंबर एक कहता रहा है.
1. ईरान में लगातार दखलंदाजी करने की वजह से
1953 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाने का “ऑपरेशन अजाक्स” चलाया, ताकि तेल उद्योग पर पश्चिमी नियंत्रण बना रहे. मोसद्देक ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. इससे शाह को सत्ता में लाया गया, जिसे अमेरिका ने हथियारों, सैन्य सहायता और खुफिया सहयोग से मजबूत किया. ईरानियों के लिए यह साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का प्रतीक था, जिसने इस्लामी क्रांति के बाद “ग्रेट सैटन” की छवि को मजबूत किया. ये कारण आइडियोलॉजिकल टकराव से जुड़े थे, जहां खुमैनी ने अमेरिका को इस्लामी शासन के खिलाफ पश्चिमी साम्राज्यवाद का प्रतीक माना.
2. शाह को लगातार समर्थन देने की वजह से
1970 के दशक में शाह की आधुनिकीकरण नीतियों ने धार्मिक और ग्रामीण असंतोष बढ़ाया. खुमैनी ने निर्वासन से ही अमेरिका को शाह का समर्थक बताकर विद्रोह भड़काया. अमेरिकी खुफिया ने आंदोलनों को कम आंका. शाह को बचाने में असफल रहा, जिससे ईरानियों में अमेरिका को लेकर विश्वासघात का भाव पैदा हुआ. तब से ये लगातार बना हुआ है.
3. अमेरिकी दूतावास बंधक संकट
क्रांति के तुरंत बाद नवंबर 1979 में ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाया. ऐसा अमेरिका के उस कदम के विरोध में किया गया था, जिसमें अमेरिका ने शाह को वहां चिकित्सा के लिए आने की अनुमति दे दी थी. जब शाह इलाज के लिए अमेरिका पहुंचे तो खुमैनी ने इसे “अमेरिका विरोधी सप्ताह” घोषित किया, जिसने दुश्मनी को स्थायी बना दिया.
4. इजरायल को दुश्मन मानने के कारण
शाह के समय ईरान और इजरायल के बीच गुप्त गठबंधन था. ईरान ने 1948 में इजरायल को मान्यता दी थी लेकिन क्रांति ने इसे पूरी तरह उलट दिया. खुमैनी ने क्रांति को इस्लामी नेतृत्व का आधार बनाया, जिसमें फिलिस्तीनी मुक्ति को इस्लामी संघर्ष का हिस्सा माना। इजरायल को “लिटिल सैटन” कहकर सभी संबंध तोड़ दिए – इजरायली दूतावास को फिलिस्तीनी दूतावास में बदल दिया और रमजान के आखिरी शुक्रवार को “कुद्स डे” (जेरूसलम दिवस) घोषित किया, जो फिलिस्तीन के समर्थन का प्रतीक बना. यह अरब राष्ट्रवाद से अलग, इस्लामी एकजुटता का हिस्सा था, जो अमेरिका-समर्थित अरब शासकों को चुनौती देता था.
5. इजरायल को नाजायज देश मानता है
ईरानी नेतृत्व इजरायल को एक नाजायज देश मानता है जो मुस्लिम भूमि (फिलिस्तीन) पर कब्जा करके बनाया गया है. शाह के तहत इजरायल ने “पेरिफेरी डॉक्ट्रिन” के तहत ईरान से तेल खरीदा और गुप्त सैन्य सहयोग किया लेकिन क्रांति ने इसे “साम्राज्यवादी साजिश” माना. ईरान का मानना है कि इजरायल इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों का एक “सैन्य अड्डा” है, जिसका मकसद मुस्लिम देशों को कमजोर रखना है.
क्रांति के बाद ईरान ने “प्रतिरोध की धुरी” खड़ी की, जिसमें ईरान ने हिजबुल्लाह और हमास को तैयार किया, ताकि वो इजरायल को हमेशा परेशान करते रहें. यह दुश्मनी आज भी जारी है, लेकिन इसके मूल 1979 की क्रांति में ही हैं.
इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए ईरान का सामना सीधे तौर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों इजरायल और सऊदी अरब से होता है. ईरान चाहता है कि अमेरिकी सेना इस क्षेत्र से पूरी तरह बाहर निकल जाए. इराक, सीरिया, यमन और लेबनान में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका और इजरायल लगातार सैन्य और कूटनीतिक प्रयास करते रहते हैं, जिससे यह टकराव और गहरा हो जाता है.





