Donald Trump News: ईरान जंग में अभी अमेरिका को जीत नहीं मिली है. इजरायल और अमेरिका के खिलाफ ईरान मजबूती से डटा है. उसके हर हमले का करारा जवाब दे रहा है. अमेरिकी-इजरायली अटैक का जवाब ईरान अपनी मिसाइलों और सस्ते ड्रोन से दे रहा है. ईरान जंग तो अभी दूर तक जाती दिख रही है. उससे पहले ही डोनाल्ड ट्रंप अपने देश अमेरिका में हारते नजर आ रहे हैं. जी हां, डोनाल्ड ट्रंप ईरान जंग पर बुरी तरह फंस गए हैं. उनके फैसलों से अमेरिकी जनता में काफी नाराजगी है. हाल की याद में कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जितने कम जन समर्थन के साथ ईरान के खिलाफ युद्ध में नहीं गया है. यहां तक कि बराक ओबामा की लीबिया में दखलअंदाजी 2011 में 60 फीसदी अमेरिकियों के समर्थन के साथ शुरू हुई थी. इतने के बाद भी ओबामा की आलोचना हुई थी. ईरान युद्ध के लिए किसी भी सर्वे में अमेरिकी जनता का बहुमत समर्थन में नहीं दिखा, बल्कि कई सर्वे में साफ बहुमत इसके खिलाफ है. आमतौर पर युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, उनका समर्थन और कम होता जाता है.
अमेरिकियों की सोच सामने आई
इस बाबत राजनीतिक वैज्ञानिक ब्रूस जेंटलसन का कहना है कि अमेरिका में युद्ध का समर्थन सिर्फ उसकी प्रगति पर नहीं, बल्कि जनता के नजरिए पर भी निर्भर करता है. अमेरिकी आमतौर पर उन युद्धों का समर्थन करते हैं जो आक्रामक ताकतों को रोकने के लिए होते हैं, न कि दूसरे देशों में राजनीतिक बदलाव लाने के लिए. यही वजह है कि बुश प्रशासन ने इराक के पास विनाश के हथियार होने और 9/11 से जुड़े होने का दावा किया, जबकि असल मकसद सत्ता परिवर्तन था. ईरान युद्ध का मकसद भी सत्ता परिवर्तन ही है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप कई महीनों से कह रहे हैं. ट्रंप और उनकी टीम ने ईरान को ‘तत्काल खतरा’ बताया, लेकिन यह तर्क ज्यादा लोगों को नहीं जमा.
ट्रंप की दलीलों का फायदा नहीं
ट्रंप खुद दावा कर चुके थे कि उन्होंने पिछले साल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ‘पूरी तरह खत्म’ कर दिया है. हमलों के बाद जारी वीडियो में ट्रंप ने 1979 की तेहरान बंधक संकट, 1983 में बेरूत में अमेरिकी मरीन पर हमला और 2000 में यूएसएस कोल पर बमबारी का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा कि ईरान शायद शामिल था. विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने यह जटिल तर्क दिया कि अमेरिका ने आत्मरक्षा में हमला किया, क्योंकि उसे पता था कि इजरायल ईरान पर हमला करेगा और ईरान बदला लेगा. यह तर्क भी अमेरिका में ज्यादा लोगों को पसंद नहीं आया, खासकर तब जब इजरायल को लेकर लोगों की राय बदल रही है.
अमेरिकियों को क्या बात अच्छी नहीं लगी
यह बात अमेरिका को अच्छी नहीं लगी कि वह इज़राइल को लेकर ज़्यादा से अधिक सावधान होता जा रहा है. युद्ध शुरू होने से ठीक पहले जारी एक गैलप पोल से पता चला कि इस सदी में पहली बार अमेरिकियों ने कहा कि उनकी सहानुभूति इजरायलियों के बजाय फिलिस्तीनियों के साथ है. हाल ही में इजरायल के लिए समर्थन में सबसे बड़ी गिरावट राजनीतिक रूप से स्वतंत्र लोगों (इंडिपेंडेंट्स) के बीच देखी गई है, जिनके विचार गाज़ा युद्ध के दौरान काफी बदल गए हैं. ईरान युद्ध के दक्षिणपंथी खेमे में सबसे मुखर आलोचक टकर कार्लसन ने तुरंत इसे ‘इज़राइल का युद्ध’ करार दिया. जो रोगन डोनाल्ड ट्रंप के 2024 के समर्थन आधार में शामिल निराश युवा पुरुषों के बीच एक प्रभावशाली हस्ती हैं. उन्होंने भी कहा कि उन्हें इस ईरान युद्ध से ‘धोखा’ महसूस हुआ.
डोनाल्ड ट्रंप ईरान जंग पर अपने ही घर यानी अमेरिका में घिरते जा रहे हैं. (पीटीआई)
रक्षा सचिव पीट की छवि को लगा बट्टा
इस बीच रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने ईरान जंग में हो रही मौत, तबाही और डर का बखान करके अमेरिकियों को इस युद्ध के लिए राजी करने की कोशिश की है. भले ही जांचों से पता चलता है कि एक स्कूल पर बमबारी के लिए अमेरिकी सेना जिम्मेदार थी, जिसमें सौ से ज़्यादा बच्चे मारे गए थे. फिर भी वह सैन्य कार्रवाई के नियमों को बेवकूफी कहकर खारिज कर देते हैं. सबसे हालिया क्विनिपियाक पोल में हेगसेथ की अप्रूवल रेटिंग 37% दिखाई गई. कार्लसन और मार्जोरी टेलर ग्रीन जैसे बड़े आलोचकों के बावजूद ट्रंप के साथ अभी भी अधिक MAGA समर्थक बने हुए हैं. वे असल में कभी भी विदेशी युद्धों के खिलाफ नहीं थे. उन्हें जिस बात से नफ़रत थी, वह थी विदेशी युद्धों में हारना, और ट्रंप उन्हें ईरान में जल्द जीत का वादा कर रहे हैं.
युद्ध की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी?
लेकिन ट्रंप ने उन्हें या किसी और को यहां तक कि अपने मंत्रिमंडल को भी इस बात के लिए तैयार नहीं किया है कि इस युद्ध की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी. खासकर वैश्विक तेल बाज़ारों में होने वाली उथल-पुथल के लिए. इसे अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी इतिहास की सबसे बड़ी उथल-पुथल बता रही है और इससे यात्रा से लेकर भोजन तक, हर चीज़ की कीमतें बढ़ जाएंगी. युद्ध की कीमत के बारे में ट्रंप की बयानबाज़ी शायद ही कभी चर्चिल जैसी रही है. एक रात उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि तेल की कीमतों में थोड़े समय के लिए होने वाली बढ़ोतरी अमेरिका और दुनिया की सुरक्षा और शांति के लिए चुकाई जाने वाली बहुत छोटी कीमत है. केवल बेवकूफ़ ही अलग सोचेंगे.’ लेकिन अगले ही दिन उन्हें यह दावा करके बाजारों को शांत करना पड़ा कि युद्ध लगभग खत्म हो चुका है.
ईरान का क्या मकसद?
ईरानी शासन का मुख्य मकसद अपना अस्तित्व बचाए रखना है. अमेरिका और उसके मध्य-पूर्वी सहयोगियों की राजनीतिक और आर्थिक कमजोरियों से ईरान अच्छी तरह वाकिफ़ है. ऐसा लगता है कि वह इन्हीं को निशाना बना रहा है. युद्ध की शुरुआत में खाड़ी देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, दूतावासों और होटलों पर ईरान के जो हमले देखने में बिखरे हुए लग रहे थे, वे कुछ अमेरिकी कमेंटेटरों के लिए मज़ाक का विषय थे. लेकिन आखिरकार ये हमले ऊर्जा उत्पादन और शिपिंग के बड़े हिस्सों को ठप करने और ट्रंप या उनके समर्थकों की उम्मीद से कहीं ज़्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए काफी मददगार साबित हुए.
अमेरिका के लोग किस बात पर अधिक निराश?
ट्रंप पहले से ही उसी घरेलू समस्या का सामना कर रहे थे, जिसका सामना जो बाइडेन ने किया था. आप अमेरिकियों को पॉजिटिव जीडीपी, शेयर बाज़ार और रोज़गार के आंकड़ों के बारे में कितना भी क्यों न बताएं; अगर वे जीवन-यापन की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं, तो अर्थव्यवस्था और राष्ट्रपति, दोनों के बारे में उनका नज़रिया निराशाजनक ही रहेगा. तेल की कीमतों को लेकर ट्रंप की बेपरवाह टिप्पणियां, महामारी की शुरुआत में उनके द्वारा दिए गए हवाई आश्वासनों जैसी ही लग रही हैं. कांग्रेस में बहुत कम रिपब्लिकन ऐसे हैं जो युद्ध के मुद्दे पर ट्रंप के सामने खड़े होने को तैयार हैं. लेकिन जैसे-जैसे मध्यावधि चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, उनमें से कई लोग मन ही मन यह दुआ कर रहे होंगे कि ट्रंप को जल्द से जल्द इस युद्ध को खत्म करने का कोई बहाना मिल जाए.





