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How Iran War Affected US Military: अमेरिका सुपरपावर है और उसके पास हथियारों का जखीरा मौजूद है, बावजूद इसके हालात ये बने हुए हैं कि वो इस युद्ध से जल्द से जल्द अपने पांव खींचना चाहता है. अब तो उसे होर्मुज की भी चिंता नहीं है. चलिए जानते हैं कि आखिर ये युद्ध अब तक अमेरिका को कितनी चोट दे चुका है और इससे चीन का क्या फायदा है.
अमेरिका के हथियार तबाह, चीन खुश.
Iran-US War Harms American Military: पिछले 32 दिनों ईरान और अमेरिका का युद्ध चल रहा है. इसमें नुकसान सिर्फ इजरायल और ईरान का ही नहीं हुआ है, सुपरपावर अमेरिका भी खासा प्रभावित हुआ है. अब तक अमेरिका ने अपने डिफेंस सिस्टम से 2400 पैट्रियट इंटरसेप्टर दाग दिए. ये वो मिसाइलें हैं, जो दुश्मन की मिसाइलों को हवा में मार गिराती हैं. मजे की बात ये है कि अमेरिका हर साल सिर्फ 650 पैट्रियट ही बना पाता है. इसका सीधा मतलब है कि जितने इंटरसेप्टर उसने 31 दिनों में खर्च कर दिए, उन्हें दोबारा बनाने में साढ़े तीन साल लग जाएंगे.
इतना ही नहीं, अमेरिका ने अपनी THAAD मिसाइलों का भी 40 प्रतिशत स्टॉक दुनिया भर से खर्च कर दिया है. THAAD भी दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने वाली बहुत जरूरी सिस्टम है. अमेरिका का ये सिस्टमबेहद एडवांस हैं और इसे एयर डिफेंस के क्षेत्र में अव्वल माना जाता है. अमेरिका हर साल 100 से भी कम THAAD इंटरसेप्टर बनाता है. ऐसे में पूरा स्टॉक दोबारा भरने में चार से पांच साल लगेंगे.
लुट रहा अमेरिका, मुस्कुराया चीन
दरअसल हर पैट्रियट और THAAD इंटरसेप्टर में नीओडिमियम और समैरियम-कोबाल्ट नाम के मैग्नेट लगे होते हैं. ये मैग्नेट सिर्फ रेयर अर्थ से बनते हैं. हम सभी जानते हैं कि रेयर अर्थ की सारी सप्लाई चीन के कंट्रोल में है. ऐसे में चीन इस बात से खुश हो रहा है कि अमेरिका के पास डिफेंस के लिए रेयर अर्थ का स्टॉक सिर्फ दो महीने का बचा हैय ऐसे में अगर चीन ने सप्लाई बंद कर दी तो अमेरिका नई मिसाइलें बना ही नहीं पाएगा.
अमेरिका को युद्ध में कितना नुकसान हुआ?
- अगले 3-5 साल तक अमेरिका के पास पर्याप्त पैट्रियट और THAAD नहीं रहेंगे. फर्ज कीजिए अगर कोई देश उस पर हमला करे तो अमेरिका को अपनी सेना, शहरों और सहयोगी देशों की रक्षा करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. ये चीन और उत्तर कोरिया की आईसीबीएम मिसाइलों की जद में आता है.
- युद्ध के समय मिसाइलें जल्दी खत्म हो रही हैं, लेकिन बनने में सालों लग रहे हैं. मतलब एक छोटे युद्ध में ही अमेरिका की डिफेंस लाइन कमजोर पड़ जाएगी. वहीं ईरान इस काम के लिए सस्ते ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है.
- रेयर अर्थ की सप्लाई चीन के हाथ में है, यानि चीन चाहे तो अमेरिका की नई मिसाइलें बनने से रोक सकता है. ये उसकी रणनीतिक कमजोरी है.
- इतना ही नहीं अमेरिका को स्टॉक भरने में अरबों डॉलर खर्च होंगे और सालों लगेंगे. इस बीच अमेरिका को या तो पुरानी मिसाइलें इस्तेमाल करनी पड़ेंगी या फिर दुश्मन के हमले का खतरा उठाना पड़ेगा.
कुल मिलाकर 31 दिनों के युद्ध में ही अमेरिका ने अपनी मिसाइल डिफेंस का बड़ा हिस्सा गंवा दिया. अब उसे दोबारा तैयार होने में साढ़े तीन से पांच साल लगेंगे. इस दौरान वो दुश्मनों के हमले के सामने कमजोर हो गया है. चीन पर निर्भरता ने स्थिति और खतरनाक बना दी है. ये सिर्फ स्टॉक की कमी नहीं, बल्कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का बड़ा झटका है. शायद यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते हैं.
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News18 में इंटरनेशनल डेस्क पर कार्यरत हैं. टीवी पत्रकारिता का भी अनुभव है और इससे पहले Zee Media Ltd. में कार्य किया. डिजिटल वीडियो प्रोडक्शन की जानकारी है. टीवी पत्रकारिता के दौरान कला-साहित्य के साथ-साथ अंतरर…और पढ़ें





