अच्छा तो हम चलते हैं’ गाने की पूरी कहानी भी बेहद दिलचस्प है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ जब गाना नहीं बन पा रहा था, तभी यह आइडिया आया। आनंद बक्शी ने संगीतकारों की कई पीढ़ियों के साथ काम किया, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, चित्रगुप्त, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, राजेश रोशन, अनु मलिक और विजू शाह तक। ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘आदमी मुसाफिर है’, ‘एक दूजे के लिए’ जैसे सैकड़ों गीत उन्होंने लिखे।
वे खुद भी कुछ गाने गा चुके थे, जैसे ‘बालिका वधू’ का “जगत मुसाफिर खाना…।” उनके बेटे राकेश बख्शी बताते हैं कि पिता के रूप में वे बहुत प्यारे थे। रात को देर से आने पर भी बच्चों को थपथपा कर देखते थे। खाने की बर्बादी न करने की सीख उन्होंने बच्चों को मां के त्याग की कहानी सुनाकर दी। आनंद बक्शी फिल्मफेयर पुरस्कार समेत कई सम्मानों से नवाजे गए। उन्होंने गीतों के जरिए प्यार, दर्द, खुशी और जिंदगी का पूरा दर्शन दिया।





