वॉशिंगटन: क्या आप 6-7 हजार किमी की दूरी को सिर्फ 25 मिनट में तय करने की कल्पना कर सकते हैं? आज के दौर में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन सच तो यह है कि अमेरिका ने यह कारनामा आज से 22 साल पहले ही कर दिखाया था. साल 2004 में NASA के X-43A विमान ने 7,346 मील प्रति घंटे (Mach 9.6) की हैरतअंगेज रफ्तार छूकर दुनिया को दंग कर दिया था. लेकिन अफसोस, जिस तकनीक को आज कई देश हासिल करने के लिए होड़ लगा रहे हैं और अरबों डॉलर बहा रहे हैं, उसे 2004 में ही ‘कबाड़’ समझकर बंद कर दिया था.
जब NASA ने रचा इतिहास: क्या था X-43A?
X-43A कोई साधारण विमान नहीं था, बल्कि ये NASA के ‘हाइपर-एक्स’ प्रोग्राम का हिस्सा था. इसका एकमात्र मकसद ये साबित करना था कि क्या स्कैमजेट इंजन लैब से निकलकर असली आसमान में काम कर सकते हैं.
हवा से सांस लेने वाला इंजन: रॉकेट के उलट, ये इंजन अपने साथ भारी ऑक्सीजन टैंक लेकर नहीं चलता. ये उड़ते समय वातावरण से ही ऑक्सीजन सोखता है और उसे ईंधन के साथ जलाता है. इससे विमान हल्का होता है और इसकी रफ्तार किसी कल्पना से भी परे निकल जाती है.
नवंबर 2004 में, इसने ध्वनि की गति से लगभग 10 गुना तेज उड़कर इतिहास रच दिया. ये दुनिया का सबसे तेज ‘एयर-ब्रीदिंग’ एयरक्राफ्ट बन गया. मात्र 10 सेकंड की उस छोटी सी उड़ान ने वो डेटा दे दिया, जिसे जुटाने में आज दुनिया की महाशक्तियां दिन-रात एक कर रही हैं.
सफलता के बाद क्यों कबाड़ समझा गया US प्रोग्राम?
X-43A की अपार सफलता के बावजूद, उसी साल इस प्रोग्राम को अचानक बंद कर दिया गया. इसके पीछे कोई तकनीकी हार नहीं, बल्कि राजनीति और बदली हुई प्राथमिकताएं थीं.
चांद-मंगल का मोह: 2004 में अमेरिकी सरकार ने ‘विजन फॉर स्पेस एक्सप्लोरेशन’ का ऐलान किया. NASA का सारा बजट हाइपरसोनिक उड़ानों से छीनकर इंसानों को फिर से चाँद और मंगल पर भेजने की ओर मोड़ दिया गया.
इराक-अफगानिस्तान का युद्ध: उस वक्त अमेरिका का रक्षा मंत्रालय जमीनी युद्धों में उलझा था. उन्हें लगा कि भविष्य के इन सुपर-फास्ट हथियारों से ज्यादा जरूरी अभी के युद्ध जीतना है.
ईंधन की पेचीदगी: X-43A हाइड्रोजन पर चलता था, जिसे स्टोर करना और संभालना बहुत मुश्किल था. सेना को ऐसे ईंधन की तलाश थी जो टैंकों में आसानी से भरा जा सके, और रिसर्च वहीं थम गई.
अमेरिका की गलती, चीन-रूस की चांदी
जब अमेरिका ने अपने सबसे सफल प्रोग्राम को ठंडे बस्ते में डाला, तब चीन और रूस ने इसे एक सुनहरे मौके की तरह देखा. अमेरिका ने अपनी बढ़त खो दी और प्रतिद्वंद्वियों ने उस पर काम जारी रखा.
- रूस ने ‘एवनगार्ड’ जैसे घातक हथियार तैयार कर लिए.
- चीन ने अपनी मिसाइलों को इतना तेज बना लिया कि वे अमेरिकी डिफेंस सिस्टम को चीर सकती हैं.
नतीजा यह हुआ कि जो तकनीक अमेरिका के पास 22 साल पहले थी, आज वो उसे दोबारा पाने के लिए स्ट्रगल कर रहा है.
2026: पुरानी ताकत पाने के लिए 32,000 करोड़ का दांव
आज हालात यह हैं कि अमेरिका अपने उसी पुराने हथियार को पाने के लिए 2026 के बजट में 3.9 बिलियन डॉलर यानी करीब 32,000 करोड़ रुपये खर्च करने जा रहा है. ये भारी-भरकम रकम सिर्फ इसलिए खर्च हो रही है ताकि उन हाइपरसोनिक हथियारों को बनाया जा सके, जिन्हें NASA ने 2004 में ही मुमकिन साबित कर दिया था.





