सुपरपावर की सुरक्षा में बड़ा छेद! रूस और चीन की हाइपरसोनिक चाल ने उड़ा दी पेंटागन के अफसरों की नींद


वाशिंगटन: पेंटागन के टॉप अधिकारियों ने एक ऐसी सच्चाई स्वीकार की है जिससे अमेरिकी जनता का डरना तय है. अधिकारियों ने सीनेट की सुनवाई के दौरान कहा कि अमेरिका के पास फिलहाल चीन और रूस की आधुनिक हाइपरसोनिक मिसाइलों से बचने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है. अब तक अमेरिका जिस डिफेंस सिस्टम के भरोसे बैठा था, वह केवल छोटे लेवल के हमलों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया था. आज के दौर में जब चीन और उत्तर कोरिया जैसे देश बेहद एडवांस हथियार बना रहे हैं, तब अमेरिका की मौजूदा सुरक्षा प्रणाली काफी पीछे नजर आ रही है. इसी खतरे को देखते हुए ट्रंप सरकार अब ‘गोल्डन डोम’ नाम का एक मल्टी-लेयर्ड डिफेंस शील्ड तैयार करने पर जोर दे रही है. इस प्रोजेक्ट का मकसद अमेरिका की धरती को हर तरह के मिसाइल हमले से पूरी तरह सुरक्षित बनाना है.

क्या अमेरिका वाकई हाइपरसोनिक मिसाइलों के सामने बेबस है?

सीनेट की सुनवाई में स्पेस पॉलिसी के असिस्टेंट सेक्रेटरी मार्क जे बरकोविट्ज़ ने बहुत ही चौंकाने वाली बात कही है. उन्होंने कहा कि हमारा मौजूदा ग्राउंड-बेस्ड डिफेंस सिस्टम सिर्फ एक लेयर वाला है. इसे सालों पहले बहुत ही छोटे और सामान्य हमलों को ध्यान में रखकर बनाया गया था. आज के माहौल में यह सिस्टम पूरी तरह फेल साबित हो सकता है.

बरकोविट्ज़ के मुताबिक अमेरिका के पास क्रूज मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों के खिलाफ आज की तारीख में कोई डिफेंस नहीं है. यह बयान इसलिए भी डराने वाला है क्योंकि चीन और रूस लगातार ऐसी मिसाइलों का टेस्ट कर रहे हैं जो आवाज की रफ्तार से कई गुना तेज चलती हैं. इन मिसाइलों को ट्रैक करना और बीच रास्ते में मार गिराना मौजूदा तकनीक के लिए लगभग नामुमकिन सा हो गया है.

(इंफोग्राफिक्स : Generative AI)

ट्रंप का ‘गोल्डन डोम’ प्रोजेक्ट क्या है और यह कैसे काम करेगा?

  1. डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेगसेथ अब पेंटागन के लिए 1.5 ट्रिलियन डॉलर के बजट की मांग कर रहे हैं. इस भारी-भरकम बजट का एक बड़ा हिस्सा ‘गोल्डन डोम’ डिफेंस सिस्टम बनाने में इस्तेमाल होगा.
  2. अनुमान है कि इस सिस्टम को तैयार करने में करीब 175 से 185 बिलियन डॉलर का खर्च आएगा.
  3. यह कोई मामूली मिसाइल रोकने वाली मशीन नहीं होगी, बल्कि इसमें स्पेस-बेस्ड सेंसर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ग्राउंड इंटरसेप्टर्स का एक जाल होगा.
  4. इसके अलावा इसमें डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स यानी लेजर हथियारों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यह सिस्टम ड्रोन से लेकर खतरनाक हाइपरसोनिक मिसाइलों तक को भांप लेने और उन्हें नष्ट करने की ताकत रखेगा.
  5. एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह अमेरिका के लिए सुरक्षा की एक ऐसी दीवार होगी जिसे भेदना किसी भी दुश्मन के लिए असंभव होगा.

चीन और रूस की बढ़ती ताकत ने अमेरिका को क्यों डराया?

पेंटागन के अधिकारियों ने चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा कंपटीटर बताया है. चीन अपनी मिसाइल टेक्नोलॉजी को बहुत तेजी से अपग्रेड कर रहा है. इसके साथ ही वह साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी महारत हासिल कर चुका है.

अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका की सुरक्षा की मार्जिन अब पूरी तरह खत्म हो गई है. आज अमेरिका की मुख्य भूमि दुश्मनों के लिए एक्सपोज हो चुकी है.

यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के युद्धों ने यह साबित कर दिया है कि अगर हमला बड़े पैमाने पर हो, तो पुराने एयर डिफेंस सिस्टम घुटने टेक देते हैं. रूस और चीन की जुगलबंदी ने अमेरिका को अपनी डिफेंस स्ट्रैटेजी पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है.

(इंफोग्राफिक्स : Generative AI)

बजट और फंडिंग को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

गोल्डन डोम प्रोजेक्ट जितना शानदार सुनने में लगता है, इसकी लागत उतनी ही ज्यादा है. सीनेट में कुछ सांसद इस भारी खर्च को लेकर सवाल उठा रहे हैं.

गस किंग जैसे नेताओं का कहना है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए बजट का रास्ता साफ करना आसान नहीं है. क्या कांग्रेस बिना सोचे-समझे इतने अरबों डॉलर का चेक साइन कर देगी? इसके अलावा अमेरिका की इंडस्ट्रीज की क्षमता पर भी सवाल हैं.

सालों से निवेश की कमी की वजह से मिसाइल बनाने की स्पीड धीमी पड़ गई है. अगर आज युद्ध छिड़ जाए, तो अमेरिका के पास पर्याप्त संख्या में इंटरसेप्टर्स भी मौजूद नहीं हैं. सप्लाई चेन को मजबूत करने में अभी काफी समय लगने वाला है, जो अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है.

क्या गोल्डन डोम से दुनिया में शांति आएगी या तनाव बढ़ेगा?

मार्क जे बरकोविट्ज़ का तर्क है कि गोल्डन डोम सिस्टम युद्ध को रोकने का काम करेगा. जब दुश्मन को पता होगा कि उसके हमले का अमेरिका पर कोई असर नहीं होगा, तो वह हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा. यह सिस्टम न सिर्फ लोगों की जान बचाएगा बल्कि देश की अखंडता की भी रक्षा करेगा.

हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि इससे हथियारों की नई रेस शुरू हो सकती है. फिलहाल अमेरिका अपने पुराने सिस्टम जैसे थाड (THAAD) और पैट्रियट मिसाइल बैटरीज को भी अपडेट कर रहा है. इसके साथ ही नेवी के डिस्ट्रॉयर्स को भी नए कॉम्बैट सिस्टम से लैस किया जा रहा है. अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप का यह ‘गोल्डन डोम’ सच में हकीकत बन पाता है या यह सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा.



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