दुर्गा पूजा के पंडाल क्यों होते हैं इतने खास? देवी पूजा कुलीन घरों के आंगन से कैसे आई सड़कों तक, लंबी दिलचस्प है कहानी


why Durga Puja pandals are special : दुर्गा पूजा यानी मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा, रोशनी से जगमगाती सड़कें, खूबसूरत सजावट और रातभर घूमते मौज मस्‍ती करनते लोगों की अथह भीड़. खासकर कोलकाता में दुर्गा पूजा के पंडाल सिर्फ पूजा करने की जगह नहीं, बल्कि कला, संस्कृति, इतिहास और लोगों की भावनाओं का ऐसा संगम हैं, जिसे देखने के लिए देश विदेश से लोग पहुंचते हैं. कहीं मंदिर जैसा भव्य पंडाल नजर आता है, तो कहीं किसी ऐतिहासिक इमारत, गांव, जंगल या सामाजिक मुद्दे से प्रेरित अनोखी सजावट लोगों को हैरान कर देती है.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दुर्गा पूजा में पंडाल बनाने की परंपरा शुरू कैसे हुई? मां दुर्गा की पूजा घरों से निकलकर विशाल सार्वजनिक आयोजनों तक कैसे पहुंची? और आखिर इन पंडालों को देखने के लिए हर साल लाखों लोग क्यों उमड़ पड़ते हैं? इसके पीछे धार्मिक आस्था के साथ बंगाल का इतिहास, सामुदायिक भागीदारी, कलाकारों की मेहनत और इंसान के मन को आकर्षित करने वाली कई दिलचस्प वजहें छिपी हैं. आइए, इसे समझते हैं.

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दुर्गा पूजा के पंडालों की शुरुआत कैसे हुई? जानें इतिहास

कभी राजबाड़ियों और जमींदारों की थी निजी पूजा (16वीं से 18वीं शताब्दी)-
शुरुआत में दुर्गा पूजा आम जनता का त्योहार नहीं थी, बल्कि यह राजाओं, समृद्ध जमींदारों और कुलीन ‘बाबू’ वर्ग के घरों के ‘ठाकुरदालान’ तक ही सीमित थी. इस निजी आयोजन में आम लोगों की पहुंच बेहद सीमित होती थी और वे केवल दर्शक के रूप में ही शामिल हो सकते थे.

इतिहासविदों और शोध लेखों के अनुसार, 16वीं और 17th शताब्दी के दौरान तहरपुर के राजा कांग्सनारायण (Raja Kangsanarayan) या नदिया के जमींदार भवनानंद मजूमदार (Bhabananda Majumdar) जैसे भूस्वामियों ने बड़े आयोजनों के रूप में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. इसके अलावा, कोलकाता क्षेत्र में सबर्ण राय चौधरी परिवार (Sabarna Roy Choudhury family) द्वारा 1610 से अपने पैतृक आवास (बारीसा) में लगातार दुर्गा पूजा मनाए जाने के ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद हैं.

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ब्रिटिश काल और उससे पहले के अभिलेखों से यह प्रमाणित होता है कि बंगाल के कुलीन जमींदार और रईस परिवार (जैसे शोभावजार राजबाड़ी) अपने प्रभाव, सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक हैसियत को प्रदर्शित करने के लिए अपने घरों के ‘ठाकुरदालान’ (आंगन) में भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन करते थे.

‘बारोयारी’ पूजा और पंडालों की नींव (1790)-
वर्ष 1790 में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के गुप्तपाड़ा में एक जमींदार द्वारा स्थानीय युवाओं को प्रवेश से रोके जाने पर बड़ा बदलाव आया. अपमानित महसूस करने वाले 12 दोस्तों ने चंदा इकट्ठा करके खुद की दुर्गा पूजा की शुरुआत की, जिसे ‘बारोयारी पूजा’ (12 दोस्तों की पूजा) कहा गया और यहीं से अस्थायी पंडालों का सिलसिला शुरू हुआ.

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इस इतिहास का उल्लेख बंगाली प्रकाशनों (जैसे आनंदबाजार पत्रिका के लेख और क्षेत्रीय शोध) के साथ-साथ सुदेशना बनर्जी की पुस्तक “Durga Celebrating the Goddess: Then and Now” और सुकांत चौधरी द्वारा संपादित प्रसिद्ध पुस्तक “Calcutta: The Living City” (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) के अध्यायों में मिलता है.

जब उन युवाओं को अपमानित कर बाहर कर दिया गया, तो उन्होंने समाज के आम लोगों के साथ मिलकर खुद की दुर्गा पूजा करने का निर्णय लिया. इस पूजा के लिए उन्होंने घर-घर जाकर और आम जनता से स्वैच्छिक चंदा (Subscriptions/Donations) इकट्ठा किया. यही वह बिंदु था जहाँ से बंगाल में सामूहिक चंदे से सार्वजनिक उत्सव मनाने की परंपरा यानी ‘सार्वजनिक’ या ‘बारोयारी’ संस्कृति की औपचारिक शुरुआत हुई.

‘सर्वजनिन पूजा’ का विस्तार (1910)-
समय के साथ इस परंपरा का दायरा बढ़ा और वर्ष 1910 में कोलकाता के भवानीपुर क्षेत्र में ‘सनातन धर्मोत्साहिनी सभा’ (Sanatan Dharmotsahini Sabha) द्वारा पहली बार बड़े पैमाने पर सार्वजनिक (सर्वजनिन) दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया.  इसका मुख्य उद्देश्य जाति, वर्ग और धर्म के बंधनों को तोड़कर समाज के हर वर्ग को जोड़ना था, जिसके लिए बड़े पैमाने पर सड़कों व मैदानों में बांस और कपड़े के पंडाल बनने लगे.इस तरह 20वीं सदी की शुरुआत में बारोयारी पूजा का दायरा बढ़कर ‘सर्वजनिन’ (सबकी पूजा) रूप में कोलकाता शहर में स्थापित हुआ.

स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केंद्र-
ब्रिटिश शासन के दौरान ये सार्वजनिक पंडाल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के मिलने, गुप्त बैठकों और राष्ट्रप्रेम की अलख जगाने का प्रमुख केंद्र बन गए. इन पंडालों के जरिए स्वदेशी आंदोलन और सामाजिक एकता के संदेश घर-घर तक पहुँचाए जाते थे.

आधुनिक ‘थीम आधारित’ कला और वैश्विक पहचान-

आज के दौर में ये पंडाल विशुद्ध धार्मिक आयोजनों से आगे बढ़कर ‘थीम बेस्ड’ कला, संस्कृति और सामाजिक संदेशों का अनूठा मंच बन चुके हैं. इसी भव्यता, सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक महत्व के चलते यूनेस्को (UNESCO) ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा दिया है.

पंडाल सिर्फ पूजा की जगह नहीं, कला की खुली प्रदर्शनी

आपने देखा होगा कि दुर्गा पूजा के पंडालों में कहीं प्राचीन मंदिरों की झलक मिलती है, तो कहीं राजमहल, ग्रामीण बंगाल, लोककला या किसी दूसरे देश की वास्तुकला से प्रेरित सजावट दिखाई देती है. यही इनकी सबसे बड़ी खासियत है. हर पंडाल के पीछे एक विचार, एक डिजाइन और उसे हकीकत में बदलने वाले कलाकारों की मेहनत होती है.

आज कई पूजा समितियां प्रसिद्ध कलाकारों, शिल्पकारों, डिजाइनरों और रोशनी के विशेषज्ञों की मदद से पंडाल तैयार करवाती हैं. बांस, कपड़े, मिट्टी, लकड़ी, कागज और दूसरे सजावटी सामानों का इस्तेमाल करके अस्थायी ढांचे को एक अनोखा रूप दिया जाता है.
कुछ पंडाल पारंपरिक बंगाली कला को सामने लाते हैं, जबकि कुछ आधुनिक तकनीक और रोशनी के जरिए दर्शकों को बिल्कुल अलग अनुभव देते हैं. इसीलिए पंडाल घूमना केवल मां दुर्गा के दर्शन करना नहीं रह गया है, बल्कि यह कला को करीब से देखने का भी मौका बन गया है. भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी दुर्गा पूजा को भक्ति और कला के अनूठे संगम के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

कुम्हारों और कारीगरों की मेहनत से जीवंत होती है मां दुर्गा की प्रतिमा

पंडाल की खूबसूरती की बात हो और मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों का जिक्र न आए, ऐसा कैसे हो सकता है? कोलकाता का कुम्हारटोली यानी कुमोरटुली इलाका दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण के लिए खास पहचान रखता है. यहां कलाकार मिट्टी, भूसे और दूसरे पारंपरिक साधनों की मदद से प्रतिमाएं तैयार करते हैं.

यह काम पूजा से काफी पहले शुरू हो जाता है. प्रतिमा का ढांचा तैयार करना, मिट्टी की परतें चढ़ाना, आकृति को बारीकी से गढ़ना, रंग भरना और आभूषणों व वस्त्रों से सजाना, हर चरण में धैर्य और हुनर की जरूरत होती है.

यूनेस्को के अनुसार, दुर्गा पूजा से कई महीने पहले ही कारीगर मां दुर्गा और उनके परिवार की प्रतिमाएं बनाने लगते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में पारंपरिक शिल्प पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है.

इसलिए जब आप किसी पंडाल में सुंदर प्रतिमा देखते हैं, तो उसके पीछे सिर्फ धार्मिक भावना नहीं, बल्कि कई कलाकारों का अनुभव, मेहनत और उनकी आजीविका भी होती है.

पंडाल घूमना बंगाल में इतना बड़ा उत्सव क्यों?

बंगाल में दुर्गा पूजा का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि परिवार, दोस्तों और पूरे समुदाय के साथ खुशियां बांटना भी है. लोग नए कपड़े पहनते हैं, अलग-अलग पंडालों में जाते हैं, दोस्तों से मिलते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम देखते हैं और तरह-तरह के पकवानों का आनंद लेते हैं.

पंडाल घूमने की इस परंपरा को आम तौर पर ‘पंडाल हॉपिंग’ कहा जाता है. कई लोग एक ही रात में कई पंडाल देखने का कार्यक्रम बनाते हैं. इसके पीछे नए डिजाइन देखने की उत्सुकता के साथ त्योहार का सामूहिक आनंद भी है.

सामाजिक नजरिए से देखें तो ऐसे आयोजन लोगों को आपस में जुड़ने का अवसर देते हैं. मोहल्ले के लोग चंदा जुटाने, सजावट करने, व्यवस्था संभालने और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने में साथ आते हैं. इस तरह पंडाल समुदाय की साझा मेहनत और पहचान का प्रतीक भी बन जाता है.

यूनेस्को ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को 2021 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था. इसके पीछे उत्सव की कला, पारंपरिक शिल्प, सामुदायिक भागीदारी और समावेशी स्वरूप जैसी विशेषताएं अहम हैं.

दुर्गा पूजा के पंडालों को यूनेस्को ने क्यों दी पहचान?

दुर्गा पूजा की खासियत केवल इसकी भव्यता नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक विरासत भी है, जो पीढ़ियों से आगे बढ़ रही है. यूनेस्को ने दिसंबर 2021 में ‘दुर्गा पूजा इन कोलकाता’ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था.

इस पहचान का महत्व इसलिए भी है क्योंकि दुर्गा पूजा किसी एक कलाकार या पूजा समिति का आयोजन नहीं है. इसमें मूर्तिकार, कारीगर, सजावट करने वाले लोग, ढाक बजाने वाले कलाकार, आयोजक, स्थानीय निवासी और दर्शक सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं.

यह विरासत हमें बताती है कि किसी त्योहार की असली ताकत केवल उसकी चमक-दमक में नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने, पारंपरिक हुनर को जीवित रखने और सामूहिक खुशी का अवसर देने में भी होती है.

अगली बार जब आप किसी दुर्गा पूजा पंडाल में जाएं, तो केवल उसकी सजावट देखकर आगे न बढ़ें. एक पल रुककर यह भी सोचें कि इसके पीछे कितने लोगों की मेहनत, कितनी पुरानी परंपराएं और कितनी अनकही कहानियां छिपी हैं. क्योंकि दुर्गा पूजा का पंडाल आखिरकार सिर्फ बांस, कपड़े और रोशनी से बना ढांचा नहीं, बल्कि आस्था, कला और इंसानी जुड़ाव का जीवंत उत्सव है.



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