वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से दुनिया भर के बाजारों में खलबली मचा दी है. उन्होंने हिंट दी है कि वो रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर भारी-भरकम टैरिफ थोपने की तैयारी कर रहे हैं, इस लिस्ट में भारत भी शामिल है. ट्रंप ने इस बार सीधे 100 परसेंट तक का टैक्स लगाने की बात कर रहे हैं. हालांकि, हालांकि, अभी कोई फैसला नहीं आया है. ट्रंप फिलहाल इस पर विचार कर रहे हैं लेकिन इसके जिक्र भर से मार्केट में दहशत फैल गई है. दिलचस्प बात ये भी है कि ट्रंप ने इस पूरे आइडिया का क्रेडिट अपने करीबी रहे दिवंगत लिंडसे ग्राहम को दिया है.
100 परसेंट टैरिफ थोपने वाले बिल पर क्या बोले ट्रंप?
ट्रप ने रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर गाज गिराने की तैयारी शुरू कर दी है. उन्होंने खुलेआम एक ऐसे खतरनाक विधेयक का समर्थन कर दिया है, जो रूस से तेल खरीदने वाले देशों की कमर तोड़ सकता है. इस बिल के तहत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर सीधे 100 परसेंट तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने का प्रावधान है.
ट्रंप ने कहा कि ‘ये बिल सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में है. ये पूरी तरह से उनका ही विचार था. वो इसे किसी भी दूसरी चीज से ज्यादा चाहते थे. अब इसकी मंजूरी मिलने की बहुत अच्छी संभावना दिखाई दे रही है. इतना ही नहीं, हम आने वाले समय में इसमें ईरान को भी जोड़ सकते हैं’.
ट्रंप के इस बयान का सीधा मतलब ये है कि अगर ये विधेयक अमेरिकी संसद में पारित हो जाता है तो जो भी देश रूस से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल खरीदेगा, उसे अमेरिका से व्यापार करते समय 100% तक का अतिरिक्त टैरिफ भुगतना पड़ेगा. साथ ही, ट्रंप ने इस दायरे में ईरान को भी लाने का संकेत देकर ये साफ कर दिया है कि वो प्रतिबंधों के मामले में किसी को भी बख्शने के मूड में नहीं हैं. चाहे उससे कितनी भी सेंसेटिव बात चल रही हो.
क्या है अमेरिका के 100% टैरिफ का पूरा गणित?
रूस की आर्थिक रीढ़ तोड़ना: यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन इसके बावजूद रूस ने भारत और चीन जैसे देशों को भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल बेचना जारी रखा. इससे रूस की अर्थव्यवस्था चलती रही. अमेरिका अब इस बिल के जरिए रूस की इस कमाई के रास्ते को पूरी तरह से बंद करना चाहता है.
ईरान पर भी कसता शिकंजा: ट्रंप ने इस बिल में ईरान का नाम जोड़कर अपनी मंशा साफ कर दी है. ईरान भी लंबे समय से प्रतिबंधों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई करने के रास्ते तलाशता रहा है. ट्रंप इस बिल के दायरे को बड़ा करके रूस और ईरान दोनों को एक साथ घेरना चाहते हैं.
ग्लोबल ट्रेड वॉर का नया दौर: अगर ये बिल कानून बन जाता है, तो यह वैश्विक व्यापार में एक बहुत बड़ा भूचाल लाएगा. दुनिया भर की सप्लाई चेन और तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे वैश्विक बाजार में एक नया ट्रेड वॉर शुरू हो सकता है.
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है टेंशन?
इस बिल के पास होने का सबसे सीधा और बड़ा असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत इस समय रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में से एक है.
- रूस पर भारत की निर्भरता: यूक्रेन संकट शुरू होने के बाद से भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था और जनता को महंगी तेल कीमतों से बचाने के लिए रूस से भारी मात्रा में डिस्काउंटेड तेल खरीदा है. आज की तारीख में रूस, भारत के टॉप तेल सप्लायर्स में शामिल है.
- भारतीय निर्यात को तगड़ा झटका: भारत अमेरिका को अरबों डॉलर का सामान एक्सपोर्ट करता है, जिसमें आईटी सर्विसेज, टेक्सटाइल, रत्न और आभूषण शामिल हैं. अगर अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के बदले भारतीय सामानों पर 100% टैरिफ लगा दिया, तो अमेरिका में भारतीय सामान दोगुने महंगे हो जाएंगे और भारत का एक्सपोर्ट बिजनेस पूरी तरह ठप हो सकता है.
- कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा: भारत हमेशा से ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का पालन करता आया है, जहां वह अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत रख रहा है और रूस के साथ अपने पुराने और भरोसेमंद रिश्तों को भी निभा रहा है. ट्रंप का यह नया दांव भारत की इसी कूटनीतिक संतुलन की नीति के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है.
क्या वाकई कानून बनेगा ये बिल?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ट्रंप के समर्थन के बाद ये बिल वाकई कानून का रूप ले पाएगा? अमेरिकी कूटनीति के जानकारों और फैक्ट्स पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस तरह के बयानों का इस्तेमाल अक्सर दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए करते हैं.
हालांकि, इस बिल को अभी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पास होना होगा, जहां भारत के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्तों की वकालत करने वाले लॉबिस्ट भी इस पर अपनी बात रखेंगे. लेकिन ट्रंप का ये बयान यह साफ संकेत देता है कि आने वाले दिनों में रूस से तेल खरीदने वाले देशों को अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को बचाए रखने के लिए बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे. अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिकी संसद इस कड़े प्रस्ताव पर क्या फैसला लेती है.




